आलोक मेहता ने यूं बताया- महज रबड़ स्टैंप नहीं होते हैं राष्ट्रपति... आलोक मेहता ने यूं बताया- महज रबड़ स्टैंप नहीं होते हैं राष्ट्रपति...

आलोक मेहता ने यूं बताया- महज रबड़ स्टैंप नहीं होते हैं राष्ट्रपति...

Tuesday, 01 August, 2017

आलोक मेहता

वरिष्ठ पत्रकार ।।

महामहिम की छाया जरूरी

इक्कीस तोपों की सलामी और सैन्य बिगुल की गूंज के साथ नए राष्ट्रपति महामहिम रामनाथ कोविन्द ने शपथ ग्रहण की। कुछ घंटे बाद ही डिजिटल मीडिया के एक वर्ग की ओर से यह मुद्दा उठा कि वर्तमान संसदीय और प्रधानमंत्रित्व व्यवस्था में इंग्लैंड की महारानी की तरह केवल शोभाजनक राष्ट्रपति पद की कितनी आवश्यकता है? बहस बहुत नई नहीं कही जा सकती, लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण भी है।

पांच साल पहले प्रणब मुखर्जी साहब ने उद्बोधन के लिए उन्हें महामहिमपुकारे जाने से मना कर दिया था। वह भी एक छोटे गांव और सामान्य परिवार तथा प्राध्यापक के प्रारंभिक कार्यकाल से राजनीति के सर्वोच्च पद पर पहुंचे थे। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, के. आर. नारायणन, डॉ. शंकरदयाल शर्मा, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जैसे महान राष्ट्रपति भी बहुत सामान्य पारिवारिक पृष्ठभूमि के बावजूद अपनी असाधारण बौद्धिक क्षमता, ईमानदारी एवं सामाजिक-राजनीतिक सेवा के कारण शिखर पर पहुंचे। माननीय रामनाथ कोविन्द ने भी शपथ के तत्काल बाद सत्ता-व्यवस्था और सर्वोच्च पद के साथ प्रत्येक नागरिक की भूमिका को लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण निरुपित किया। निश्चित रूप से लोकतांत्रिक चुनावी प्रक्रिया रहने से भारत के राष्ट्रपति की तुलना इंग्लैंड की महारानी या प्रिंस से नहीं की जा सकती। ब्रिटेन अपनी परंपरा की औपचारिकता निभा रहा है। लेकिन हमारे महान संविधान निर्माताओं ने दुनिया के विभिन्न देशों की सत्ता-व्यवस्था के गहरे अध्ययन, मंथन और फिर वर्षों तक चर्चा के बाद संविधान बनाया और संपूर्ण सत्ता-व्यवस्था में संतुलन बनाया। इसके अंतर्गत राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, भारतीय सेना के प्रमुख सर्वशक्तिमान होते हुए भी पराकाष्ठा वाली कोई मनमानी नहीं कर सकते। पारस्परिक समन्वय के साथ परिस्थिति आने पर ब्रेका काम कर सकते हैं, ताकि लोकतांत्रिक गाड़ी किसी खाई की तरफ नहीं मुड़ जाए।

नए राष्ट्रपति के चुनाव प्रक्रिया से लेकर शपथ ग्रहण तक पारिवारिक-सामाजिक चर्चाओं में ही नहीं कुछ टी.वी. समाचार चैनलों तक पर यह बात सुनने को मिली कि बेचारे' राष्ट्रपति स्वयं तो कोई निर्णय नहीं कर सकते। सब कुछ प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल की राय-सलाह और संसद-विधानसभाओं में पारित विधेयकों-प्रस्तावों पर मुहर भर लगाते हैं। फिर इस स्वीकृति को रबर स्टैम्पही कहा जा सकता है।यह तर्क भी दिया गया कि इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, नरेन्द्र मोदी जैसे राजनीतिक शक्ति संपन्न एवं स्पष्ट बहुमत वाली सरकार रहने पर अनुकूल राष्ट्रपति चुनवाने एवं अनुकूल निर्णय प्राप्त करना सबसे आसान बात है।लेकिन ये दोनों धारणाएं गलत हैं।

भारत के राष्ट्रपतिशीर्षक से हिन्दी में एक बड़ी पुस्तक लिखते समय मुझे इस पद पर विराजमान राष्ट्राध्यक्षों के कार्यकाल में रही असहमतियों, मतभेदों, टकराव अथवा पूर्ण सहमतियों-स्वीकृतियों के अध्ययन का अवसर मिला है। इस दृष्टि से अपने समाज के एक वर्ग को यह याद दिलाना आवश्यक है कि डॉ. राजेन्द्र प्रसाद से लेकर प्रणब मुखर्जी तक राष्ट्रपति ने समय-समय पर सरकार के निर्णयों पर अपनी असहमति और आवश्यक सलाह दी है। पिछले दिनों सेवानिवृत्त होने से पहले श्री मुखर्जी ने एडिटर्स गिल्ड के सदस्य संपादकों के साथ लंबी बातचीत के दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा कि प्रधानमंत्री और सरकार के साथ रही सहमति या असहमतियों को वह अभी सार्वजनिक नहीं करेंगे।लेकिन सरकार और राष्ट्रपति के बीच हुए विधेयकों-प्रस्तावों के अधिकृत रिकॉर्ड के अनुसार श्री मुखर्जी ने अपने कार्यकाल में राज्य सरकारों से आए 18 विधेयकों पर ब्रेक लगाया। सबसे दिलचस्प तथ्य यह है कि श्री मुखर्जी ने जनवरी 2017 में भी बिहार विधानसभा द्वारा पारित एवं तत्कालीन राज्यपाल रामनाथ कोविन्द द्वारा अनुमोदित विधेयक भी रोककर वापस भेज दिया था। अब राष्ट्रपति के रूप में श्री कोविन्द इस विधेयक को पुनः सामने आने पर देर सबेर स्वीकृत कर सकते हैं। सामान्यतः माना जाता है कि संसद और मंत्रिमंडल यदि दोबारा वही प्रस्ताव या विधेयक भेज दें तो संवैधानिक नियमों के कारण राष्ट्रपति उन्हें स्वीकारने के लिए बाध्य हैं। लेकिन यहीं एक पेंच लोग भूल जाते हैं। वास्तव में राष्ट्रपति ऐसे किसी भी विवादास्पद प्रस्ताव या विधेयक को महीनों-वर्षों अपने कार्यकाल पूरा होने तक विचाराधीनश्रेणी में रोके रख सकते हैं।

इसी तरह लोक सभा में बहुमत प्राप्त दल या अल्पमत वाले दल को समर्थन देकर बहुमत का दावा करने वाले नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाता है और उसकी सिफारिश पर मंत्रियों की नियुक्ति की जाती है। मज़ेदार बात यह है कि मंत्री की नियुक्ति के साथ अनुकंपाशब्द जुड़ा होता है। किसी मंत्री के गंभीर व्यवहार अथवा काम से क्षुब्ध होने पर राष्ट्रपति पहले प्रधानमंत्री को उसे हटाने की सलाह दे सकते हैं और ऐसा न होने पर स्वयं मंत्री को बर्खास्त कर सकते हैं। राज्यपालों को भी इसी तरह हटाया जा सकता है। मुझे याद है कि राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने केन्द्रीय मंत्री के.के. तिवारी को नहीं हटाए जाने पर स्वयं बर्खास्त करने की चेतावनी दे दी। के.के. तिवारी राष्ट्रपति भवन की राजनीतिक तथा अन्य गतिविधियों को लेकर सार्वजनिक रूप से टिप्पणियां कर रहे थे। यही नहीं जैल सिंह स्वयं राजीव गांधी से बेहद नाराज थे और कांग्रेस के ही असंतुष्ट नेताओं को यह भी कह रहे थे कि वह राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद से बर्खास्त कर देंगे। एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता को तो उन्होंने यहां तक कह दिया था कि तुम पहले केवल 50 सांसदों के दस्तखत समर्थन के लिए इकट्ठा करके बहुमत की तैयारी रखो और राजीव की बर्खास्तगी पर तुम्हें ही शपथ दिला दी जाएगी।टकराव की ऐसी असाधारण स्थिति कभी नहीं आई। बहरहाल, न किसी अन्य का बहुमत आया और न ही राजीव गांधी की बर्खास्तगी हुई। लेकिन वी.पी. सिंह, अरुण नेहरू और विद्याचरण शुक्ल के विद्रोह एवं राजीव गांधी का बहुमत नहीं रहने पर वी.पी. सिंह प्रधानमंत्री बन ही गए।

पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के बीच स्वतंत्रता संघर्ष से लेकर बाद तक निजी संबंध और सम्मान की भावना रही, लेकिन कई राष्ट्रीय मुद्दों पर राजनीतिक मतभिन्नता रही। उनके बीच रहे विवादों के कई पत्र सार्वजनिक रूप से प्रकाशित हो चुके हैं। राष्ट्रपति के. आर. नारायणन ने बिहार विधानसभा भंग किए जाने संबंधी तत्कालीन राज्यपाल और केन्द्र सरकार की सिफारिश अस्वीकृत कर दी। अप्रैल 1999 में जयललिता की अन्नाद्रमुक पार्टी द्वारा समर्थन वापस लिए जाने पर अटल बिहारी बाजपेयी की गठबंधन सरकार अल्पमत से सदन में केवल एक वोट से गिर गई। कुछ दिन बाल लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा के एक शिष्टमंडल ने राष्ट्रपति नारायणन से भेंट कर 272 सांसदों के समर्थन का दावा कर भाजपा को ही सरकार बनाने के लिए आमंत्रण देने का अनुरोध किया। लेकिन श्री नारायणन संतुष्ट नहीं हुए और अंततोगत्वा चुनाव की ही घोषणा करवा दी। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में अनुसूचित जाति-जनजाति (दलित आदिवासी) को भी न्यायाधीश नियुक्त किए जाने पर बड़ा दबाव बनाया, वहीं संविधान संशोधन आयोग की नियुक्ति एवं संविधान में व्यापक बदलाव पर अपनी कड़ी आपत्ति सार्वजनिक रूप से व्यक्त की। ऐसी पच्चीसों घटनाएं, असहमतियां हमारे लोकतंत्र के गौरवशाली इतिहास के पन्ने हैं। उन्हें स्मरण करते हुए राष्ट्रपति पद के महत्व, गरिमा और गंभीर राष्ट्रीय परिस्थितियों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को समझा जाना चाहिए।

दूसरी तरफ उप राष्ट्रपति पद को केवल राज्य सभा के सभापति की भूमिका तक सीमित समझना गलत है। असल में राष्ट्रपति के साथ उप राष्ट्रपति भी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में सरकार के साथ समय-समय पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यों वे भारत सरकार की ही नीति को ही आधार बनाते हैं, लेकिन दुनिया के राष्ट्राध्यक्षों-नेताओं इत्यादि से भेंट के दौरान उनकी भूमिका अहम होती है। सरकार की सलाह के अनुसार वे विदेश यात्राएं करके उन देशों के नेताओं से मिलते और समझौते करते हैं। वास्तव में भारतीय लोकतंत्र के हर स्तंभ की शक्ति और भूमिका भविष्य का निर्माण कर रही है।

 

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