वसुंधरा सरकार के खिलाफ सख्त हुआ राजस्थान पत्रिका, किया ये 'बड़ा' फैसला वसुंधरा सरकार के खिलाफ सख्त हुआ राजस्थान पत्रिका, किया ये 'बड़ा' फैसला

वसुंधरा सरकार के खिलाफ सख्त हुआ राजस्थान पत्रिका, किया ये 'बड़ा' फैसला

Wednesday, 01 November, 2017

राजस्थान की बीजेपी सरकार एक ऐसा कानून बनाने पर जोर दे रही है जिसे विशेषज्ञ भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाला और सुशासन का ताबूत करार दे रहे हैं। इस विवादित बिल को लेकर प्रदेश सरकार को काफी विरोध का सामना करना पड़ा। बीजेपी सरकार के इस बिल का विपक्ष ही नहीं बल्कि उसकी पार्टी के नेता भी विरोध कर रहे हैं। दरअसल इसी संदर्भ में पत्रिका ग्रुप के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ गुलाब कोठारी ने भी इस बिल का विरोध किया। उन्होंने हिंदी दैनिक राजस्थान पत्रिका में छपे अपने एक आलेख के जरिए बताया कि राजस्थान पत्रिका के निदेशक मण्डल ने यह निर्णय लिया है कि जब तक मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे इस काले कानून को वापस नहीं ले लेतीं, तब तक राजस्थान पत्रिका उनके और उनसे सम्बन्धित समाचारों का प्रकाशन नहीं करेगा। इस पूरे आलेख को आप यहां पढ़ सकते हैं:

जब तक काला : तब तक ताला

राजस्थान सरकार ने अपने काले कानून के साए से आपातकाल को भी पीछे छोड़ दिया। देशभर में थू-थू हो गई, लेकिन सरकार ने कानून वापस नहीं लिया। क्या दु:साहस है सत्ता के बहुमत का। कहने को तो प्रवर समिति को सौंप दिया, किन्तु कानून आज भी लागू है। चाहे तो कोई पत्रकार टेस्ट कर सकता है। किसी भ्रष्ट अधिकारी का नाम प्रकाशित कर दे। दो साल के लिए अन्दर हो जाएगा। तब क्या सरकार का निर्णय जनता की आंखों में धूल झोंकने वाला नहीं है?

विधानसभा के सत्र की शुरुआत 23 अक्टूबर को हुई। श्रद्धांजलि की रस्म के बाद हुई कार्य सलाहकार समिति (बी.ए.सी.) की बैठक में तय हुआ कि दोनों विधेयक 1. राज. दण्ड विधियां संशोधन विधेयक, 2017 (भादंस), 2. सी.आर.पी.सी. की दण्ड प्रक्रिया संहिता, 2017. 26 अक्टूबर को सदन के विचारार्थ लिए जाएंगे। अगले दिन 24 अक्टूबर को ही सत्र शुरू होने पर पहले प्रश्नकाल, फिर शून्यकाल तथा बाद में विधायी कार्य का क्रम होना था। इससे पहले बीएसी की रिपोर्ट सदन में स्वीकार की जानी थी लेकिन अचानक प्रश्नकाल में ही गृहमंत्री गुलाब चन्द कटारिया ने वक्तव्य देना शुरू कर दिया। नियम यह है कि पहले विधेयक का परिचय दिया जाए, फिर उसे विचारार्थ रखा जाए और फिर उस पर बहस हो। उसके बाद ही कमेटी को सौंपा जाए। किन्तु प्रश्नकाल में ही हंगामे के बीच ध्वनिमत से प्रस्ताव पास करके विधेयक प्रवर समिति को सौंप दिया गया।

यहां नियमानुसार कोई भी विधायक इस विधेयक को निरस्त करने के लिए परिनियत संकल्प लगा सकता है, जो कि भाजपा विधायक घनश्याम तिवारी लगा चुके थे और आसन द्वारा स्वीकृत भी हो चुका था। उसे भी दरकिनार कर दिया गया। विधेयक 26 के बजाए 24 अक्टूबर को ही प्रवर समिति को दे दिया गया। सारी परम्पराएं ध्वस्त कर दी गईं।

कानून का मजाक देखिए! विधानसभा में दोनों अध्यादेश एक साथ रखे गए। नियम यह भी है कि एक ही केन्द्रीय कानून में राज्य संशोधन करता है तो दो अध्यादेश एक साथ नहीं आ सकते। एक के पास होने पर ही दूसरा आ सकता है, ऐसी पूर्व के विधानसभा अध्यक्षों की व्यवस्थाएं हैं। एक विधेयक जब कानून बन जाए तब दूसरे की बात आगे बढ़ती है। यहां दोनों विधेयकों को एक साथ पटल पर रख दिया गया। यहां भी माननीय कटारिया जी अति उत्साह में पहले दूसरे विधेयक (दण्ड प्रक्रिया संहिता, 2017) की घोषणा कर गए। वो प्रवर समिति को चला गया। अब दूसरा कैसे जाए? तब सदन को दो घंटे स्थगित करना पड़ा। फिर उसके साथ पहले घोषित बिल भी 26 अक्टूबर के बजाए 25 अक्टूबर को ही समिति के हवाले कर दिया गया। बिना किसी चर्चा के-बिना बहस के।

देखो तो! कानून भी काला, पास भी नियमों व परम्पराओं की अवहेलना करते हुए किया गया। और जनता को जताया ऐसे मानो कानून सदा के लिए ठण्डे बस्ते में आ गया। ऐसा हुआ नहीं। नींद की गोलियां बस दे रखी हैं। जागते ही दुलत्ती झाडऩे लगेगा। और लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हत्या हो जाएगी। कानून क्या रास्ता लेगा, यह समय के गर्भ में है। आज तो वहां भी कई प्रश्नचिह्न लगते हैं। जब एक राज्य सरकार सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को जेब में रखकर अपने भ्रष्ट सपूतों की रक्षा के लिए कानून बनाती है, तब चर्चा कानून की पहले होनी चाहिए अथवा अवमानना की? जब तक तारीखें पड़ती रहेंगी, अध्यादेश तो कण्ठ पकड़ेगा ही।

क्या उपाय है इस बला से पिण्ड छुड़ाने का। राजस्थान पत्रिका राजस्थान का समाचार-पत्र है। सरकार ने तो हमारे चेहरे पर कालिख पोतने में कसर नहीं छोड़ी। क्या जनता मन मारकर इस काले कानून को पी जाए? क्या हिटलरशाही को लोकतंत्र पर हावी हो जाने दे? अभी चुनाव दूर हैं। पूरा एक साल है। लम्बी अवधि है। बहुत कुछ नुकसान हो सकता है। राजस्थान पत्रिका ऐसा बीज है जिसके फल जनता को ही समर्पित हैं। अत: हमारे सम्पादकीय मण्डल की सलाह को स्वीकार करते हुए निदेशक मण्डल ने यह निर्णय लिया है कि जब तक मुख्यमंत्री श्रीमती वसुन्धरा राजे इस काले कानून को वापस नहीं ले लेतीं, तब तक राजस्थान पत्रिका उनके एवं उनसे सम्बन्धित समाचारों का प्रकाशन नहीं करेगा। यह लोकतंत्र की, अभिव्यक्ति की, जनता के मत की आन-बान-शान का प्रश्न है। आशा करता हूं कि जनता का आशीर्वाद सदैव की भांति बना रहेगा। जय भारत! जय लोकतंत्र!

 

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