जब आज की पीढ़ी से माथुरजी के बारे में बात की, तो ये जानकर मुझे सदमा लगा, बोले वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल

Sunday, 09 April, 2017

राजेश बादल

एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर, राज्यसभा टीवी ।।

rajesh-badalवह राजेंद्र माथुर का पहला तार था। छतरपुर जैसे छोटे से कस्बे में किसी नौजवान पत्रकार को नईदुनिया के प्रधान संपादक का तार। साइकिल उठाकर पूरे शहर के परिचितों को दिखाता फिरा। वो 1977 के चुनाव के दिन थे। नईदुनिया ने एक लेख मांगा था। मेरे जैसे कस्बाई पत्रकार के लिए यकीनन गर्व की बात थी। उन दिनों की नईदुनिया देश की हिंदी पत्रकारिता का सर्वश्रेष्ठ नाम था। आलेख भेजा। छपा। नईदुनिया और राजेंद्र माथुर से रिश्ते की शुरुआत। मैं लिखता। माथुर साहब हर दूसरे तीसरे आलेख पर अपनी राय देते। वे पत्र खुद लिखा करते थे। इन पत्रों ने लगातार मेरा हौसला बढ़ाया। आम पत्रकारों की तरह मैं भी नईदुनिया का संवाददाता बनना चाहता था। लेकिन नईदुनिया की नीति हर जिले में संवाददाता बनाने की नहीं थी। मैं आग्रह करता रहा। नईदुनिया ठुकराती रही। अलबत्ता आलेख जरूर छपते रहे। मेरे लिए यही बहुत था। एक दिन माथुर साहब का तार  मिला। इंदौर मिलने आइए। आने जाने का किराया दे देंगे। मैं उस अलौकिक अखबार के दफ्तर में था, जिस अखबार का संवाददाता न बन सका। उसका उप-संपादक बनने का प्रस्ताव। लॉटरी खुल गई। राजेंद्र माथुर से रिश्ते का एक नया रूप।

पत्रकार के तौर पर बुंदेलखंड जैसे पिछड़े इलाके से अंग्रेजी में लिखने का अवसर कम ही आता था। यू.एन.आई और पी.टी.आई के साथ लोकल खबरें ही भेजीं थीं। माथुरजी ने जॉइन करते ही संपादकीय पन्ने के लिए एक आलेख अनुवाद के लिए दिया। अगर मुझे याद है तो वो आलेख कुलदीप नैय्यर का था। शायद वे मेरी अंग्रेजी जांचना चाहते थे। जाहिर था -मैं उनकी अपेक्षा पर खरा नहीं उतरा। इसके बाद उनका आदेश था- रोज सुबह घर आओ। मैं अंग्रेजी अनुवाद सिखाऊंगा। अगले दिन सुबह से किराए पर साइकिल लेकर पांच किलोमीटर दूर उनके घर जाता और वे मुझे अंग्रेजी पढ़ाते| राजेंद्र माथुर का एक और नया रूप मेरे सामने था। दिन गुजरते रहे। वे अखबार की हर विधा में मुझे पारंगत देखना चाहते थे। शायद मैं कुछ कर भी पाया। इसी बीच वे नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक बन कर दिल्ली जा पहुंचे। मैं उनके पैरों की धूल भी न था मगर कुछ साल बाद नईदुनिया प्रबंधन ने मुझ पर भरोसा किया। मैं उसी कुर्सी पर बैठकर काम कर रहा था, जिस पर माथुर साहब बैठते थे।

सिलसिला चलता रहा। माथुर साहब जब इंदौर आते, मैं उनसे मिलने पहुंच जाता। वे बड़े उत्साह से नवभारत टाइम्स में हो रहे बदलावों का जिक्र किया करते थे। एक दिन (शायद 28 जुलाई 1985) दिल्ली से उनका फोन नईदुनिया के दफ्तर आया। मैं उन दिनों तक अखबार की अनेक जिम्मेदारियां संभाल रहा था। माथुर जी ने कहा- एक सप्ताह के भीतर जयपुर पहुंचो। नवभारत टाइम्स जयपुर संस्करण शुरू करने जा रहा था। माथुर साहब एक नए अंदाज और अवतार में थे। मैंने मुख्य उप संपादक के रूप में जयपुर जॉइन किया। इसके बाद अगले पांच-छह साल उनके मार्गदर्शन में काम किया। राजेन्द्र माथुर और सुरेन्द्र प्रताप सिंह की जोड़ी ने देश की हिंदी पत्रकारिता को ऐसे सुनहरे दिन दिखाए, जो उस दौर के हिन्दुस्तान में लोगों को चमत्कृत कर रही थी। आज तो सिर्फ उन दिनों की यादों की तड़प बाकी है।

राजेंद्र माथुर के साथ काम करने का अनुभव अनमोल मोती की तरह मेरे पास है। वे जितने अच्छे पत्रकार थे, उससे अच्छे लेखक। जितने अच्छे लेखक थे, उससे अच्छे संपादक। जितने अच्छे संपादक थे, उससे अच्छे इंसान। किसी भी देश को ऐसे देवदूत बार बार नहीं मिलते।

कुछ साल पहले मैं एक पत्रकारिता संस्थान में गया। छात्रों से बातचीत के दौरान मैने उनसे राजेंद्र माथुर के बारे में पूछा। अफसोस... कम छात्र ही थे जो राजेंद्र माथुर के बारे में ठीक-ठाक जानकारी रखते थे। मेरे लिए यह एक सदमें से कम नहीं था। कहीं न कहीं बड़ी गलती हुई है। नई पीढ़ी अगर माथुर साहब का लिखा नहीं पढ़ रही है, उन्हें नहीं जान रही है तो शायद हम लोग भी कम जिम्मेदार नहीं हैं।

एक तो उनके लेखन को सामने लाने में देरी हुई। दूसरे पत्रकारिता के पाठ्यक्रमों में राजेंद्र माथुर को जो जगह मिलनी चाहिए, वह नहीं मिल पाई। तीसरे टेलिविजन पत्रकारिता ने माथुर साहब को कहीं गुम कर दिया।  यह गलती अब भी ठीक की जा सकती है। यह सोचकर मैंने तय किया कि अगर नई पीढ़ी के पत्रकार माथुर जी को नहीं पढना चाहते तो कम से कम उनके बारे में न्यूनतम जानकारी तो रखें|

मैंने राजेंद्र माथुर पर वृतचित्र (डॉक्यूमेंट्री) बनाने का फैसला किया। फैसला तो कर लिया, लेकिन जो हमारे बीच से करीब दो दशक पहले जा चुका हो, उस पर फिल्म बनाना आसान नहीं था। बहुत कुछ सामग्री मेरे पास थी, लेकिन उनकी आवाज, उनके विजुअल्स खोजना आसान नहीं था। तीन साल भटकता रहा। कई बार लगता- फिल्म नहीं बन पाएगी। फिर अन्दर से ताकत जुटाता और खोज में लग जाता। श्रीमती मोहिनी माथुर ने फिल्म के लिए बहुत सहयोग किया।

नईदुनिया के प्रधान संपादक आलोक मेहता ने अपने खजाने से माथुर जी के बारे में कुछ दुर्लभ सामग्री निकाली। इस तरह यह फिल्म तैयार हो गई। इसका पहला शो इंदौर के प्रेस क्लब में हुआ था। माथुर जी इसके अध्यक्ष रहे थे। उनके नाम पर एक सभागार भी वहां है। फिल्म का शो इसी ऑडिटोरियम में हुआ। इसके बाद यह फिल्म देश के करीब एक दर्जन राज्यों के पत्रकारों और मीडिया के छात्रों के बीच दिखाई जा चुकी है। अभी भी दिखाई जा रही है।

राज्यसभा टेलिविजन में कार्यकारी निदेशक के तौर पर जॉइन करने के बाद मैंने आधा घंटे की एक फिल्म ‘उनकी नजर उनका शहर’ श्रृंखला के तहत तैयार की। माथुर जी की हर जन्म तिथि और पुण्यतिथि पर यह फिल्म दिखाई जाती है। अब इन दिनों मैं राजेंद्र माथुर जी पर एक ग्रन्थ तैयार कर रहा हूं। इसमें माथुर जी  के कुछ अब तक अप्रकाशित आलेख, उनके जीवनवृत, उनका इतिहास बोध, उनके समकालीन संपादकों के आलेख और कुछ दुर्लभ चित्र तथा दस्तावेज शामिल किए जाएंगे। पत्रकारिता के छात्रों और पत्रकारों के लिए यह एक संग्रहणीय ग्रन्थ हो सकता है।

(9 अप्रैल राजेंद्र माथुरजी की पुण्यतिथि है, चुनिंदा लेखों के जरिए उनको हमारी श्रद्धांजलि)

यहां देखें राजेन्द्र माथुर पर डॉक्यूमेंट्री:

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