आखिर रवीश कुमार की खबरों से सरकार क्यों नहीं जागती? आखिर रवीश कुमार की खबरों से सरकार क्यों नहीं जागती? आखिर रवीश कुमार की खबरों से सरकार क्यों नहीं जागती? आखिर रवीश कुमार की खबरों से सरकार क्यों नहीं जागती?

आखिर रवीश कुमार की खबरों से सरकार क्यों नहीं जागती?

Friday, 01 June, 2018

नीरज नैयर 

पत्रकार ।।

सिस्टम की मार खाए व्यक्ति को जब कोई रास्ता नहीं सूझता तो वो मीडिया का दरवाजा खटखटाता है, इन दरवाजो में कई दरवाजे ऐसे भी होते हैं जहां मदद के नाम पर महज इंतजार मिलता है, लेकिन रवीश कुमार के दरवाजे पर दस्तक देने वाले की कहानी देर-सवेर दुनिया के सामने आ ही जाती है। रवीश ने कई ऐसे मुद्दे उठाए हैं और उठा भी रहे हैं जिनका प्रत्यक्ष रूप से आम आदमी से जुड़ाव है। उनका शो प्राइम टाइमएकमात्र ऐसा शो है, जो टीआरपी की परवाह किए बगैर, आगे बढ़ा जा रहा है।

पिछले कुछ वक्त की अगर हम बात करें तो रवीश ने विश्वविद्यालयों की दुर्दशा, घटते रोजगार, स्टाफ सिलेक्शन कमीशन (एसएससी), बदहाल बैंकों जैसे मुद्दों को आवाज दी, जिन्हें काफी पसंद किया गया। फिलहाल वह ट्रेनों की लेटलतीफी को लेकर अभियान छेड़े हुए हैं। खास बात यह है कि रवीश अपने इस अभियान में प्रत्यक्ष रूप से उस आम आदमी को सामने ला रहे हैं, जिसकी परेशानियों पर ध्यान देने का समय किसी के पास नहीं। ट्रेनों की लेटलतीफी से केवल वातानुकूलित डिब्बों में सफर करने वालों का ही समय बर्बाद नहीं होता, बल्कि सामान्य बोगियों में भेड़-बकरियों की तरह भरे आम आदमी को भी कई तकलीफों से जूझना पड़ता है, लेकिन इस समस्या पर कभी इतनी गंभीर से मीडिया में चर्चा नहीं की गई, जैसी की अब रवीश कुमार द्वारा की जा रही है।

हाल ही में रवीश के प्राइम टाइम पर आशुतोष अग्रवाल नामक छात्र ने अपनी कहानी बयां की कि किस तरह ट्रेन की देरी ने उनकी तीन साल की मेहनत पर पानी फेर दिया। ऐसी अनगिनत कहानियां रवीश कुमार सरकार के सामने रखकर बदलाव लाने का प्रयास कर रहे हैं। रवीश से वैचारिक भिन्नता रखने वाले भी इस मामले में उनके साथ हैं। थोड़ा पीछे चलकर यदि हम बैंक एपिसोड की बात करें तो जिस तरह से बैंकरों ने बड़ी तादाद में रवीश को खत लिखे, उससे पता चलता है कि उन्होंने दुखती रग छेड़ दी है।

एनडीटीवी इंडिया के इस पत्रकार ने बैंक सीरीज के कुल 16 एपिसोड के माध्यम से बैंकिंग सेक्टर का वह चेहरा लोगों के सामने लाने का प्रयास किया, जिससे हममें से अधिकतर लोग अंजान थे। बैंकर्स को लेकर शुरू से यही मानसिकता रही है कि वे घड़ी देखकर लंच करते हैं और घड़ी देखकर कुर्सी से उठ जाते हैं, लेकिन रवीश और एनडीटीवी की बदौलत इस मानसिकता में बदलाव की संभावनाएं अब नजर आ रही हैं।

विश्वविद्यालयों की दुर्दशा पर रवीश की रिपोर्ट ने सरकारी दावों और उनकी असलियत को उजागर किया। उन्होंने यूनिवर्सिटी सीरीज के 30 एपिसोड किए और हर एपिसोड में बदहाल व्यवस्था पर करारी चोट की। इस सीरीज के दौरान उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि किस तरह हिंदू-मुस्लिम के नाम पर छात्रों को धर्म की राजनीति में उलझाकर उनके भविष्य से खिलवाड़ किया जा रहा है। साथ ही घटते रोजगार और एसएससी की बात करके उन्होंने एक तरह से मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा किया। जनवरी और फरवरी महीने में रवीश कुमार ने नौकरी सीरीज के जरिए उन तमाम युवाओं की आवाज को बुलंद किया जो केंद्र या राज्य सरकारों के लापरवाह या उदासीन रवैये के चलते बेरोजगार बैठे हैं।

ऐसे सैंकड़ों युवा सामने आए जो सरकारी नौकरियों की परीक्षा देने के बाद लंबे समय से परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे हैं, या जिनके परिणाम आ गए लेकिन उन्हें अपॉइंटमेंट लेटर का इंतजार है। रवीश बड़ी संजीदगी के साथ गंभीर मुद्दों को उठाते हैं, और कई मामलों पर उन्हें आम जनता का समर्थन भी मिलता है, जैसा कि बैंकिंग सीरीज में मिला या रेलवे के विषय में मिल रहा है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है आखिर उनकी जनचेतना वाली खबरों पर सरकारी अमले में चेतना क्यों नहीं आती? रवीश ने अलग-अलग राज्यों के विश्विद्यालयों की बदतर स्थिति को उजागर किया था, इसमें यूपी और बिहार भी शामिल है, लेकिन उम्मीदों के अनुरूप बदलाव देखने को नहीं मिला।

आगे बढ़ते-बढ़ते जब रवीश पीछे लौटते हैं तो पाते हैं कि हालात जस के तस हैं, यानी संबंधित विभाग या प्रशासन ने उनकी खबरों का कोई संज्ञान नहीं लिया। विश्विद्यालयों के मामले में रवीश ने खुद माना है कि उनकी खबर पर एक्शन नहीं हुआ। इसी तरह बैंकों की सीरीज के इतने एपिसोड होने के बावजूद भी कोई सकारात्मक बदलाव हुआ हो, ऐसा नजर नहीं आता। बैंकरों की समस्या जरूर वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंची हैं, लेकिन उनके समाधान के लिए कदम नहीं उठाए गए। हालांकि एसएससी वाले मामले में जरूर कुछ एक्शन हुआ। करीब 11 हजार प्रतिभागियों को अपॉइंटमेंट लेटर जारी किए गए, मगर इसके पीछे काफी हद तक युवाओं का वो आंदोलन रहा जिसने एसएससी मुख्यालय में बैठे अधिकारियों को नींद से जगा दिया। ये बात सही है कि युवाओं में आंदोलन की अग्नि जलाने का काम रवीश कुमार ने ही किया लेकिन यदि कोई दबाव न होता तो शायद दूसरे मामलों की तरह यहां भी तस्वीर वही होती।

आमतौर पर किसी विभाग से जुड़ी कोई खबर यदि मीडिया में आती है, तो सुधार या बदलाव की हलचल सुनाई देने लगती है, लेकिन रवीश कुमार के मामले में ऐसा नहीं है। यह बात कहीं न कहीं स्वयं रवीश कुमार को भी खटकती है। हालांकि इसकी वजह काफी हद तक वह खुद भी हैं। यह सर्वविदित है कि रवीश भाजपा विरोधी हैं, मोदी या योगी सरकार बनने से पहले भी वह किस तरह भाजपाई नेताओं को लठियाते थे यह सबने देखा है। इसलिए सोशल मीडिया पर उन्हें कांग्रेसी या वामपंथी जैसे उपनामों से पुकारा जाता है। भाजपा के सत्ता में आने के बाद भले ही रवीश के हमले सरकारी नीतियों पर रहे हों, लेकिन उन्हें रवीश की पुरानी तस्वीर के साथ रखकर ही देखा गया। जब-जब उन्होंने आवाज उठाई, यही समझा गया कि वह पुरानी मानसिकता से ग्रस्त हैं। इसलिए सुनकर भी इसे अनसुना कर दिया गया।

लोगों की शिकायत है कि एनडीटीवी इंडिया और रवीश कुमार हिन्दुओं पर होने वाले अत्याचारों और मोदी सरकार के अच्छे कामकाज को सबके सामने रखने में कंजूसी करते हैं। जबकि अखलाख जैसे मामलों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है। इन आरोपों में कितनी सच्चाई है यह तो कहना मुश्किल है, लेकिन ऐसे ही आरोपों के चलते सत्ता प्रतिष्ठानों से करीबी रखने वालों की नजर में रवीश किरकिरी बन गए हैं। चाहें बैंक हों या विश्विद्यालय प्रशासन या कोई अन्य विभाग, सभी जानते हैं कि रवीश की खबरें सरकार में हलचल पैदा नहीं करतीं, लिहाजा वो भी हलचल की संभावनाओं को पैदा होने नहीं देते। उन्हें पता है कि उनकी उदासीनता पर सरकार की तरफ से सवाल खड़े नहीं होंगे, इसलिए वह खामोश रहना ही बेहतर समझते हैं। निसंदेह लोकतंत्र के लिए यह हानिकारक है। अगर कोई वाजिब मुद्दा उठता है, तो सरकार और उसके विभागों को हरकत में आना ही चाहिए, लेकिन इन सब बातों का फिलहाल कोई मतलब नहीं। बस इतना ही कहा जा सकता है कि रवीश को इसी तरह जनता से जुड़े मुद्दे उठाते रहना चाहिए और साथ ही सत्ता प्रतिष्ठान के सरहानीय प्रयासों को भी दिखाना चाहिए, जिससे एक तरफा नफरत की खाई को कुछ हद तक कम किया जा सके।

इम्पैक्ट हुआ... हुआ तो फिर क्रेडिट लेने में संकोच क्यो?

एनडीटीवी इंडिया के मैनेजिंग एडिटर सुनील सैनी का इस संबंध में कहना है कि हमारा काम सिस्टम की खामियों को जनता के सामने लाना है और यदि हमारी कवरेज से किसी को फायदा मिले तो यह हमारी स्टोरी का इम्पैक्ट ही हुआ। उन्होंने आगे कहा, ‘हमारे पास हर रोज दर्शकों के संदेश आते हैं कि हमारी सीरीज सही दिशा में बढ़ रही हैं।हालांकि बातों-बातों में सैनी यह दर्शाना भी नहीं भूले कि उनकी खबरों पर सरकार ने संज्ञान लिया है। उन्होंने कहा, ‘हम यह कतई दावा नहीं करते कि एसएससी परीक्षा में सरकार का सीबीआई जांच का आदेश हमारी लगातार चल रही कवरेज का नतीजा है, या हम यह भी दावा नहीं करते कि रेलवे में हजारों रिक्त पदों को भरने के लिए विज्ञापन इसलिए निकाला गया क्योंकि प्राइमटाइम में इस मुद्दे को उठाया गया था और न ही हम इस बात का क्रेडिट लेना चाहते हैं कि सार्वजानिक बैंकों ने समस्याओं का संज्ञान लेना शुरू कर दिया है। हमारा एकमात्र फोकस जनता की समस्याओं पर है, जो लगातार जारी रहेगा।

यहां सवाल यह भी उठता है कि अगर एनडीटीवी इंडिया या रवीश कुमार की खबरों पर इम्पैक्ट हो रहा है, तो एनडीटीवी प्रबंधन उसका प्रमुखता से बखान क्यों नहीं कर रहा? जैसा कि वह अक्सर करता आया है। पिछले कुछ वक्त में ऐसा क्या हुआ है कि न्यूज चैनल अपनी स्टोरी पर इम्पैक्ट का क्रेडिट लेने से बच रहा है या सीधे तौर पर उसे स्वीकार नहीं कर रहा? जबकि पहले एनडीटीवी सरकार या प्रशासन की हर हरकत को अपनी खबरों से प्रभाव से जोड़कर देखता था



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