नीरेंद्र नागर सर: इंसान जो ‘एकला’ चलता रहा...

Saturday, 14 April, 2018

रिंकी वैश्य ।।

नागर सर से मेरा पहला परिचय हुआ सन 2007 में। यह फ़रवरी के शुरुआती दिनों की बात है जब मैं नौकरी के सिलसिले में Indiatimes.com के ऑफ़िस गई थी। अपनी पिछली नौकरी छोड़े हुए मुझे 4 महीने हो चुके थे। आत्मविश्वास ठीक-ठाक था, क्योंकि मीडिया का 3 साल का अनुभव हो चुका था और यह वह टाइम होता है जब आपको लगता है कि भाई दुनिया तो है मेरी मुट्ठी में।खैर

एक दोस्त के ज़रिए खबर मिली कि गुडगांव में एनबीटी ऑनलाइन में नौकरी है। बिना परिचय, बिना जुगाड़ और बिना कोई संपर्क-सूत्र के सीधे अपने कागज़-पत्तर संभालकर मैं नागर सर से मिलने पहुंच गई। कागज़-पत्तर बोले तो पुराने आर्टिकल। प्रिंट में काम कर चुकी थी, तो अपना लिखा और छपा हुआ एक-एक आर्टिकल किसी डिग्री से कम नहीं लगता था। बहरहाल, नौकरी के सिलसिले में किसी संपादक से सीधे मिलने जाने का यह मेरा पहला और अब तक का आखिरी अनुभव था और यह मेरी खुशकिस्मती है कि वह अनुभव मेरी खुशनुमा यादों में शुमार है। बमुश्किल आधे घंटे की बातचीत के बाद ही मुझे यह एहसास हो गया कि कुछ तो अलग है यह इंसान। उनकी सरलता, सौम्यता, विनम्रता सब कुछ प्रभावित करने वाली थी। विद्वता इसलिए नहीं लिखा क्योंकि उसका पता काम करने के दौरान चला।

मैंने एनबीटी ऑनलाइन में लगभग 10 महीने काम किया। इन 10 महीनों को मैं सीखने की अनवरत यात्रा कहूंगी। भाषा की शुद्धता के पीछे भी कोई इतनी मेहनत कर सकता है, यह जुनून मैं पहली बार देख रही थी। एक संपादक का हर एक की कॉपी पढ़ना और डेस्क पर जा-जाकर बताना... यह भी एक नया अनुभव था मेरे लिए, लेकिन उनकी सबसे बड़ी ख़ासियत है, एक अच्छा प्रफ़ेशनल होने से पहले एक अच्छा इंसान होना। कोई भी काम हो, अगर उसे मानवीय पहलू को ध्यान में रखकर किया जाए, तभी वह काम सफल हो सकता है- ऐसा मेरा मानना है। और एनबीटी ऑनलाइन की सफलता शायद उसका एक उदाहरण है। उस 10 महीने के कार्यकाल के दौरान कितनी ही ऐसी घटनाएं हुईं, जिन्होंने उनके मानवीय पक्ष को सामने रखा।

ऐसी ही एक घटना मुझे याद हैगुड़गांव में जाटों ने आरक्षण मसले को लेकर आंदोलन किया हुआ था। मेरी छुट्टी के दिन का वाकया है। जिस सहकर्मी की ड्यूटी थी, वह किसी वजह से नहीं आ पाया। नागर सर का फ़ोन आया कि क्या मैं ऑफ़िस जा सकती हूं (क्योंकि मैं गुड़गांव में ही रहती थी)। उस आवाज़ में एक संपादक के आदेश का पुट नहीं था, एक रिक्वेस्ट थी (क्योंकि उन्हें शायद निजी ज़िंदगी में मेरी व्यस्तता का भी अंदाज़ा था)। उसके बाद इनकार की तो गुंजाइश ही नहीं थी। ऑफ़िस गई और साइट पर मोर्चा संभाल लिया। दूसरे दिन, उन्होंने न केवल इस बात को एक्नॉलिज किया, बल्कि अप्रीशिएट भी किया क्योंकि हिट्स भी अच्छी तरह आ गए थे। ऐसी घटनाओं के समय साइट पर ट्रैफ़िक वैसे भी बढ़ जाता है। बात छोटी सी है और कुछ खास भी नहीं पर उनकी यह अप्रोच ज़रूर खास थी।

कुछ महीनों के बाद मैंने नौकरी छोड़ दी। उसके बाद मेरा और उनका संपर्क भी टूट गया। 10 महीने के परिचय के बाद टूटा संपर्क-सूत्र सीधे 10 साल बाद जुड़ा, जब मैंने एक बार फिर नौकरी करने का फ़ैसला लिया। कुछ सलाह-मशविरा करने के लिए जब मैंने उन्हें अप्रोच किया, मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि जिस संपर्क को मैं टूटा हुआ समझ रही थी, वह कहीं गहरे दब गया था, मगर टूटा नहीं था। वही सरलता, वही सौम्यता और वही विनम्रता एक बार फिर मेरे सामने थी। एक प्रफ़ेशनल, एक शुभांकाक्षी।

बीच-बीच में एनबीटी ब्लॉग पढ़ने के ज़रिए ज़रूर मेरा एनबीटी से सूत्र जुड़ा रहा। इससे वैचारिक तौर पर भी उनकी समृद्धता पता चलती रही। कुछ ब्लॉग ऐसे थे, जिनसे हम-आप पूरी तरह असहमत हो सकते हैं पर आपकी असहमति भी उतने ही सम्मान के साथ वह स्वीकार करते हैं। अपने विचार ईमानदारी से बेलाग-बेलौस कहने के लिए भी साहस चाहिए। इस साहस के लिए सर को सलाम। अपने ब्लॉग का नाम उन्होंने ठीक ही रखा था, ‘एकला चलो रे…’

औपचारिक तौर पर उन्होंने रिटायरमंट ज़रूर ले लिया है, पर उनके जैसे लोग क्या कभी काम करना छोड़ पाएंगे। और छोड़ें भी न:) जीवन की दूसरी पारी शुरू करने के लिए आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएं, सर।

 

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