पढ़िए, राष्ट्रपति की मोदी सरकार को खुली चेतावनी पर क्या बोले डॉ. वैदिक

Monday, 09 January, 2017

डॉ. वेदप्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार ।।

मोदी को राष्ट्रपति की चेतावनी

मुझे खुशी है कि नोटबंदी के बारे में मेरी जो राय रही है, उसी तर्ज पर अब राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी सरकार को चेताया है। उन्होंने राज्यपालों को संबोधित करते समय कहा है कि नोटबंदी से अर्थ-व्यवस्था में जो मंदी आएगी, उससे गरीबों की जिंदगी दूभर हो जाएगी। उन्हें ‘अभी और यहीं’ याने तत्काल राहत पहुंचाने में सरकार को मुस्तैदी दिखानी होगी। नोटबंदी का फायदा जब मिलेगा, तब मिलेगा लेकिन गरीब लोग तब तक इंतजार नहीं कर पाएंगे। याने उनका धैर्य टूट सकता है।

राष्ट्रपति ने मोदी सरकार को यह खुली चेतावनी दे दी है। प्रणब दा ने राष्ट्रपति का कर्तव्य ठीक से निभाया है, इसके लिए मैं उनको बधाई देता हूं। कोई राष्ट्रपति इससे ज्यादा क्या बोल सकता है? यदि राष्ट्रपति के पद पर कोई भाजपा का आदमी बैठा होता या प्रधानमंत्री कोई कांग्रेसी होता तो राष्ट्रपति शायद इतना भी नहीं बोल पाते। बैंकों में लाइनें लगाने और लाइनों में लगे हुए दम तोड़ने के हादसे अब धीरे-धीरे घट रहे हैं लेकिन अब बेकारी और बेरोजगारी का जो दौर शुरु हुआ है, असली चिंता उसी की है। कोई आश्चर्य नहीं कि यह दौर हिंसक रुप धारण कर ले।

इसके अलावा काला धन और भ्रष्टाचार घटने की बजाय बढ़ गया है। रिजर्व बैंक को कंपकंपी छूट रही है। वह यही नहीं बता पा रही है कि 50 दिन में कितने पुराने नोट बैंकों में जमा हो गए हैं? 14 लाख करोड़ या 15 लाख करोड़? लोगों ने एक अच्छे उद्देश्य में सरकार की मदद करने की बजाय उसे चारों खाने चित कर दिया। नोटबंदी को शत प्रतिशत फेल कर दिया। सारा काला धन सफेद कर लिया। पुराने नोट जलाने या गंगा में बहाने की एक घटना भी सामने नहीं आई। अब नए नकली नोट भी धड़ल्ले से बन रहे हैं।

इसके अलावा बैंकों के लाखों बाबू, करोड़ों बेनामी खाते वाले और आयकर अधिकारी भी नोटबंदी के कारण भ्रष्टाचारी बन गए हैं। डिजिटल लेन-देन अब बड़ी-बड़ी कंपनियों को कमीशन एजेंट से ‘कमीशन बादशाह’ बना देगा। जिन्हें नकद रिश्वतें देनी और लेनी हैं, वे पहले की तरह दनदनाते रहेंगे। हमारे राजनीतिक दल और नेतागण भ्रष्टाचार के मूल स्त्रोत हैं। उन पर कोई लगाम नहीं है। अब इस सरकार का ज्यादा समय नोटबंदी के घोड़े की लीद को समेटने में खर्च हो रहा है। यदि राष्ट्रपति महोदय शुरु में ही प्रधानमंत्री को चेता देते तो मोदी इतना साहस शायद जुटा लेते कि वे पांच-सात दिन में ही इस आत्मभंजक पहल को वापस ले लेते। जाहिर है कि भाजपा-कार्यकारिणी की बैठक में किसी की हिम्मत नहीं कि वह मोदी को खरी-खरी सुना सके या बता सके। शायद राष्ट्रपति की चेतावनी ही कुछ काम करे।

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