सोशल मीडिया का 'गेट वेल सून'

सोशल मीडिया का 'गेट वेल सून'

Wednesday, 02 August, 2017

प्रवीण कुमार राजभर ।।

पिछले हफ्ते एक दोस्त के फेसबुक वॉल पर देखा उसने अपनी टूटी हुई टांग की फोटो डालकर अपडेट किया था, मेट विथ एन एक्सीडेंट, महज कुछ ही घंटों में उसके ऊपर 200 से ज्यादा कमेंट्स और 400 लाइक्स आ गए थे। लिखने वालों ने गेट वेल सून की लाइन लगा दी थी, फूल भी भेजे थे स्माइली वाले, कुछ लोगों ने तो थोडा ज्यादा टाइप करने की जहमत भी उठा ली थी, भाई कैसे हुआ और कब हुआ? उम्मीद करता हूं सब ठीक होगा, भगवान से प्रार्थना है सब ठीक हो जाएगा|

अच्छा लगा देखकर कि देश-विदेश के हर कोने से शुभचिंतकों की लाइन लगी थी। हम खामख्वाह ही दोष देते फिरते हैं कि लोगों में मानवीय मूल्यों के प्रति गिरावट हो रही है, सोशल मीडिया के इस दौर में मुझे तो ये कतई नहीं लगता है कि ऐसा कुछ हो भी रहा है, बल्कि इसमें तो बढ़ोतरी हुई हैहां, किसी बात में गिरावट होनी चाहिए तो मानवीय उम्मीदों में होनी चाहिए जो आज भी उसी उम्मीद में जी रहा है कि लोग आकर उससे मिलेगें, उसके सिरहाने बैठकर कंधे पर हाथ रखकर बोलेंगे कुछ नहीं हुआ तुम्हें,  सब ठीक हो जायेगा, हम है न

खैर, मेरा अभिप्राय यहां फेसबुकी प्यार पर ऊंगली उठाना नहीं है, क्योंकि देश के दूसरे छोर पर बैठा एक इंसान गेट वेल सून ही लिख सकता है, जो उसने लिख दिया, सवाल तो इस बात का है कि ये बात हमें तब पता चली जब खुद उस बन्दे ने अपने एक्सीडेंट की बात को चार दिन बाद फेसबुक पर अपडेट किया जब उसकी उंगलियां इस लायक हो चुकी थी कि एक सेल्फी लेकर कुछ टाइप कर सके। इसके बाद उन लोगों को भी इसका तभी पता चला जो महज कुछ कदम पर ही रहते हैंउन दोस्तों को भी तभी पता चला जो बचपन के सारे खेल, साजिश, मस्ती में एक रहे हैं, जो आज भी अपने आपको चड्ढी बड्डी यार बोलते हैं

मुझे याद है कि गांव में जब फोन महज गिने चुने लोगों के पास होते थे, या होते ही नहीं थे तो भी सिस्टम इतना तेज था कि किसी के बीमार होते ही गांव के हर कोने तक इसकी खबर लग जाती थी, रिश्तेदारों को पता नहीं कैसे पता चल जाता था, गांव के खानदानी दुश्मन भी दरवाजे पर देखे जाते थे, शायद उनको भी समझ में आता था कि दुश्मनी धर्म निभाने के लिए दुश्मन का जिन्दा रहना जरूरी है इसलिए अभी तो मेरा दुश्मन दुआओं का हकदार है|

सोशल मीडिया आज सबसे बड़ा बाजार है, भारत पाकिस्तान के मैच में जब पूरी गलियां सुनसान होती हैं, दुकानदार ग्राहक को तरसते हैं उस समय भी हम लोग सोशल में मीडिया में दौरे लगाते रहते हैं, लेकिन ये बात अब समझ में नहीं आती है कि पड़ोसी को अपने पड़ोसी के बीमार होने, मरने की खबर की जिम्मेदारी सोशल मीडिया ने अचानक कब उठा ली

हम जहां सोशल मीडिया में इस बात की रेस लगा रहे हैं कि ज्यादा से ज्यादा लोग हमारी फ्रेंड लिस्ट में हों, वहीं आज वो लिस्ट कब की खत्म हो गई, जो कभी सोशल मीडिया के बिना बनी थी, शायद आज हम सोशल होते हुए भी ज्यादा अनसोशल हो चुके हैं।  इस वर्चुअल दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी ये है कि इसने हमें कुछ इस तरह मशीनी बना दिया है कि हमें पड़ोसी के घर से बदबू आने के बाद पता चलता है कि ये कोई सड़े खाने की बदबू नहीं बल्कि उसी शख्स की है जिसके साथ सालों पहले कभी होली-दिवाली खेली थी और आजकल कभी-कभी सब्जियों की संडे मार्केट में किसी दुकान पर टकरा जाते थे, इसे त्रासदी नहीं तो और क्या कहेंगे जब इस तरह की खबरों को हम तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी फेसबुक और वॉट्सऐप ने ले ली है|

आजकल हर परिवार सुबह से शाम तक मिलता हैं, बातें करता है, तस्वीरें शेयर करता है, जन्मदिन से लेकर हर त्यौहार के शुभकामनाएं भेजता है लेकिन कहां, वॉट्सऐप के फेमिली ग्रुप में। कमाल की बात तो ये है कि कई बार रियल लाइफ में लोग इसलिए नाराज हो जाते हैं क्योंकि आभासी दुनिया में उनके करीबियों ने उनकी तस्वीरें लाइक नहीं की, मतलब लोग करीब तो हैं लेकिन ये करीबी कितनी दिखावटी है हम सब बखूबी जानते हैं और जैसे-तैसे स्माइली भेजकर अपना स्माइल वाला धर्म निभा रहे हैं

दिखावेपन का बुखार कुछ इस तरह का है कि पत्नी को पति के साथ पूरे दिन रहने के बाद भी शादी की सालगिरह मुबारकबाद वाली फिलिंग़ तब तक नहीं आती है जब तक उसका पति एक लम्बा पोस्ट फेसबुक पर करते हुए ये न लिख दे की हैप्पी एनीवर्सरी बेबी

खैर रिश्ते बनाने और चलाने के तौर तरीके आज भी वही हैं जो सोशल मीडिया से पहले होते थे, हम इंसान को लाइक्स पसंद आते हैं लेकिन ये ज्यादा पसंद आता है। मेरे पास अगर फेसबुक अकाउंट नहीं है तो भी लोग मुझे पसंद करते रहें, मिलने आते रहें, गेट वेल सून बोलते रहें, मेरे कंधे पर हाथ रखकर बोल दें कि सब ठीक हो जाएगाचलते-चलते इस बात पर भी गौर कर लिया जाए कि पॉकेट से स्मार्ट फोन और उसमें इंटरनेट के गायब होते ही हम कितने अकेले हैं इसका एहसास बना रहे तो जिंदगी सच में सोशल बनी रहेगी


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