'शायद इसीलिए 'ताई' के मीडिया से सम्बंध कभी भी ख़राब नहीं रहे'

Thursday, 12 April, 2018

अभिलाष खांडेकर

वरिष्ठ पत्रकार ।।

क्या आपने किसी राजनेता को बिना किसी स्वार्थ के लगातार कई वर्षों तक पत्रकारों को अलग-अलग विषयों की पुस्तकें भेंट करते हुए सुना हैं? या उनको मुंह पर खरी-खोटी सुनाने वाली नेता जिन्हें पत्रकार बिरादरी फिर भी ख़ूब प्रेम और आदर देती हों?

जी  हां, मैं बात कर रहा हूं लोक सभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन की। वही ताईजी जो महाराष्ट्र की बेटी हैं किंतु मध्य प्रदेश की व्यावसायिक राजधानी इंदौर से लगातार आठ बार लोक सभा चुनाव जितने का कीर्तिमान बना चुकी हैं। आडवाणी-जोशी को अलग रखें तो आज वें भाजपा कीं सबसे वरिष्ठ नेता हैं। स्पीकर होने से वे राजनीति से ज़रूर परे हैं, जो कि इस पद से वैधानिक अपेक्षा होती हैं।

वैसे राजनेताओं और पत्रकारों के रिश्ते थोड़े अजीब होते हैं। दोनों को एक दूसरे की ज़रूरत होती हैं लेकिन दोनो एक दूसरे को ख़ूब पसंद करते हों ऐसा भी अक्सर देखने को नहीं मिलता। अपनी-अपनी बिरादरी में राजनेता और पत्रकार दूसरे की बुराई करते आप हमने कई बार सुना हैं; नेताओ के कई क़िस्से भले ही अख़बारों में लिखे ना जाय या  टीवी चैनल्ज़ पर शायद ना दिखाए जातें हों किंतु किसी प्रेस क्लब में या अख़बारों के दफ़्तर में चटखारे लेकर सुनाने में पत्रकार भी पीछे नहीं रहते। नेता लोग भी अपने पार्टी कार्यालयों में, निजी चर्चाओं में पत्रकारों को लेकर कैसी बातें करते हैं, क्या विचार रखते हैं यह भी जग-ज़ाहिर हैं। निश्चित ही मीडिया के बारे में अच्छें विचार रखने वाले बहुत ही कम लोग हैं। हां, दोनो क्षेत्रों में  कुछ अपवाद भी हैं।

इधर जबसे नरेंद्र मोदी सरकार दिल्ली में क़ाबिज़ हुईं हैं पत्रकारों और भाजपा के मंत्रियों-नेताओं में दूरियां बढ़ी ही हैं और परस्पर के विश्वास में भी काफ़ी कमी देखीं जा रहीं हैं। कुछ मंत्रियों जैसे अरूण जेटली या नितिन गड़करी को अलग रखें तो परस्पर अविश्वास की यह खाईं राष्ट्रीय राजधानी में अधिक गहरी मालूम होती हैं। 

किंतु सुमित्रा महाजन एक ऐसी बिरली प्रजाति की राजनेता हैं जिन्हें छोटे-बड़े पत्रकार भी अपनी निजी बातचीत में और उनकी अनुपस्थिती में भी बड़े सम्मान के साथ उनका उल्लेख करते हैं और ताई भी पत्रकारों को हर भाईंदूज पर बेहतर से बेहतर लेखकों की सुंदर और उपयोगी पुस्तकें भेंट करतीं आ रहीं हैं और अपने घर पर मालवी भोजन अपने हाथ से परोसती हैं। मेरे अपने पुस्तकालय में उनकी दी हुईं कई पठनीय पुस्तकें आज भी सुरक्षित हैं।

लोक सभा अध्यक्ष बनने के पश्चात भी उन्होंने पत्रकारों से बेहतर रिश्ते बनायें रखें हैं, किंतु बिना किसी स्वार्थ के। कुछ माह पहलें इंदौर के एक साधारण परिवार के वरिष्ठ पत्रकार को जब गम्भीर बीमारी ने जकड़ लिया तब ताई ने उनका ख़ूब ध्यान रखा और उनकी हर सम्भव सहायता की। ध्यान रहें, वे पत्रकार अब रोज़मर्रा की पत्रकारीता से काफ़ी दूर हो गए हैं। लेकिन ताई की यही तो ख़ासियत हैं।

जिन लोगों ने ताई को प्रसिद्ध पत्रकार दीपक चौरसिया की किताब के विमोचन के अवसर पर दिल्ली में सुना होगा, उन्हें याद होगा की मीडिया की खिंचाई में भी ताई पीछे नहीं रहतीं लेकिन उनका अपना अन्दाज़ अलग ही हैं। शायद इसीलिए उनके मीडिया से सम्बंध कभी भी ख़राब नहीं रहे।


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