'संपत्ति में अधिकार से कहीं आगे हैं आदिवासी महिलाएं'

'संपत्ति में अधिकार से कहीं आगे हैं आदिवासी महिलाएं'

Friday, 13 October, 2017

नरजिस हुसैन

पत्रकार ।।

महिलाओं को हमेशा से ही जमीन जायदाद के अधिकारों से दूर रख कर देखा गया है। कमोबेश सभी दौर में सभी धर्मों में इसकी जो दलील दी जाती थी वो यह कि पति के अलावा उसे यानी महिला को संपत्ति में हक देने का क्या मतलब है। पति ही उसकी असली संपत्ति है और-तो-और पत्नी खुद भी पति की अन्य संप्तितयों में से एक है। हालांकि, वक्त बदला और उस बदलते वक्त के साथ ही हमारी सोच और मान्यताएं भी बदली। आज कानून के तहत देश की सभी महिलाओं को पति और पिता की जायदाद में भाइयों की तरह की बराबर का हक है।

 

शहरी भारत में तो महिलाएं क्योंकि इतनी लिख-पढ़ गई हैं तो वे अपने अधिकारों के बारे में सजग हैं लेकिन, आदिवासी भारत में महिलाएं आज भी अपने अधिकारों खासकर संपति से जुड़े अधिकारों के बारे में अनजान हैं। ये महिलाएं मकान, दुकान और जमीन को ही संपति के तौर पर देखती हैं और ये भूल जाती हैं कि आभूषणकीमती बर्तन, हथकरघा और घर के मवेशी यानी बैल, भैंस, गाय, बकरी, मुर्गी, बत्तख वगैरह भी चल और अचल संपति के दायरे में आते हैं। आदिवासी औरतें घर और खेत दोनों जगह कमर कसकर काम करती हैं चाहे वे किसी भी राज्य में रह रही हो। घर और खेत दोनों जगह काम करना इन्हीं के हिस्से आता है। असल में देखा जाए तो आज भी आदिवासी भारत में ऐसे कई परिवार हैं जहां महिला ही परिवार की मुखिया हैं क्योंकि पुरुष काम और नौकरी की खोज में दूर-दराज के स्थानों पर चले जाते है। औरतें पशुपालन के साथ खाना पकाने के लिए लकड़ियां इकटठी करना, बच्चों को देखने और गैर-कृषि कामों को करती है।

 

पशुपालन एक आर्थिक गतिविधि है जिससे न सिर्फ घर में पैसा आता है बल्कि बुरे समय में इन पशुओं को पशुधन की तरह भी इस्तेमाल किया जाता रहा है। इनको पालने में आदिवासी और ग्रामीण महिलाएं सुबह से शाम एक कर देती हैं। सुबह चारा-पानी देना, दूध दोहना, फिर नहलाना, उनके रहने की जगह की साफ-सफाई करना, उपले थोपना और रात में दोबारा चारा देकर उन्हें हिफाजत से रखना। घर में पले इन पशुओं की ठीक उसी तरह और उतनी ही देखभाल की जाती है जितनी कि घर के बच्चों की। ये बात और है कि अगर आपके खुद के खेत हैं तो पशुओं की यह संख्या ज्यादा हो सकती है और अगर आप भूमिहीन किसान है तो संभव है कि आपके पास दो तीन पशु ही हों।

 

कई राज्यों खासकर वे जहां सूखा पड़ता है वहां पशु जैसे बकरी और ऊंट खासा महत्व रखते हैं। 2015 में मधुरा स्वामीनाथन और विकास रावल की “Socio-Economic Surveys of Two Villages in Rajasthan” नाम की सर्वे रिपोर्ट में राजस्थान के दो गांवों के कुल 219 घरों पर किए सर्वे से पता चला कि ज्यादातर लोग बकरी और ऊंट को ही पालना चाहते हैं क्योंकि सूखे के दिनों में या फसल ना होने की स्थिति में ये जानवर घर के लोगों को कम-से-कम दूध देते हैं। इसके अलावा ये दोनों ही पशु खेजड़ी और आदू पेड़ की पत्तियां खाकर काफी लंबे तक जीवित रह सकते हैं क्योंकि सूखे के दिनों में मवेशियों को खाना देना काफी मुश्किल काम साबित होता है। हालांकि, यहां अंतर ये है कि पुरुष इन पशुओं का इस्तेमाल पुरुष आर्थिक तौर पर करता है और उनकी देखभाल से जुड़ी सारी बुनियादी जिम्मेदारी औरतों पर होती है। इन जिम्मेदारियों को निभाने के बाद भी इन कामों की गिनती न तो घर में होती है और न ही किसी तरह के श्रम सर्वे में। NSSO के रोजगार/बेरोजगार सर्वे के 68वें राउंड के मुताबिक ग्रामीण भारत में कुल 59 फीसदी महिलाओं के पास स्व-रोजगार है जबकि 75 प्रतिशत कृषि आधारित क्षेत्रों में कामगार हैं। मध्य प्रदेश में किया एक अध्ययन बताता है कि राज्य में 70 फीसदी महिलाएं कृषि कामों में लगी है लेकिन 6.5 प्रतिशत महिलाओं का ही जमीन पर मालिकाना हक है।

 

जिन राज्यों में आदिवासी समाज मैट्रीनिलियल तर्ज (जहां मां के नाम से वंश चलता है) पर चलता है वहां के सामुदायिक कानून या कस्टमरी लॉ को सरकार ने हिन्दु उत्तराधिकार कानून, 2005 के दायरे में शामिल किया है। इन राज्यों में अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और असम आते हैं। देश में मातृसत्तातमक समाज की सबसे बड़ी तादाद मेघालय की गारो, खासी और जयंतिया का आदिवासी समाज है। ये समाज राज्य की जनसंख्या का 90 फीसदी है। इस समाज के उत्तराधिकार कानून है:

 

खासी आदिवासी

खासी आदिवासी समाज में घर की सबसे छोटी बेटी को उत्तराधिकारी माना जाता है। खासी आदिवासी परिवार की सबसे छोटी बेटी परिवार में काफी महत्व रखती है। परिवार की इस बेटी के नाम परिवार की संपति होती है और धर्म का नाम भी इसी के सहारे आगे बढ़ता है।

1.  बाकी बेटियों को माता-पिता के जीवनकाल में उनकी अन्य संपत्ति में हिस्सा मिलता है। मां-बाप अपने जीवन में इन बेटियों को जो चाहे दे सकते हैं पारिवारिक संपत्ति को छोड़कर।

2.  सबसे छोटी बेटी परिवार के सभी समारोहों पर खर्च करेगी जैसे शादी, नामकरण और दाह संस्कार। दाह संस्कार खासा खर्चीला होता है जिसमें भूमि भी शामिल होती है।

3.  अगर सबसे छोटी बेटी की किसी कारण मृत्यु हो जाती है तो उसकी बेटी उत्तराधिकारी बनती है। बेटी न होने की हालत में उससे बड़ी बहन उत्तराधिकारी बनती है। अगर ये भी संभव नहीं हो पाता तो परिवार की सारी संपत्ति मां की बहन या बहन की बेटी को मिल जाती है।

4.  इसी तरह मां की निजी संपत्ति अगर मरने से पहले नहीं बंटी है तो मरने के बाद सबसे छोटी बेटी हक उसपर हो जाता है।

5.  अगर महिला अविवाहित है और कसी भी तरह की चल-अचल संपत्ति की मालकिन है तो विवाह से पूर्व मृत्यु की दशा में उसकी संपत्ति मां या बहन को मिलती है।

6.  ऐसे ही घर के अविवाहित बेटे की संपत्ति (अगर वह मां के साथ रह रहा है तो) मरने के बाद  मां या बहन को मिलती है।

7.  अगर बेटा शादी के बाद मां-पिता से अलग पत्नी और बच्चों के साथ रहता है तो उसकी संपत्ति पर उसकी पत्नी और बच्चों का अधिकार होता है।

 

गारो आदिवासी

1.  इस आदिवासी समुदाय में परिवार की सारी निजी संपत्ति मां के नाम होती है और उसके बाद उसपर बेटी का अधिकार होता है।

2.  माता-पिता ही इसका चयन करते हैं कि ये संपत्ति किस बेटी को दी जानी है।

3.  अगर परिवार में कोई बेटी नहीं है तो मां के खानदान से कोई एक लड़की को चुनकर उसी को जायदाद का उत्तराधिकारी घोषित किया जाता है।

4.  लालुंग समुदाय में भी घर की सबसे छोटी बेटी को संपत्ति उत्तराधिकारी माना जाता है। पुश्तैनी घर और जमीनें छोटी बेटी के हिस्से आती हैं।

 

जयंतिया आदिवासी

1.   जयंतिया आदिवासी समुदाय में भी परिवार की सबसे छोटी बेटी के हिस्से चल-अचल संपत्ति का सबसे बड़ा हिस्सा आता है।

 

 

समाचार4मीडिया.कॉम देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडियापोर्टल exchange4media.com की हिंदी वेबसाइट है। समाचार4मीडिया में हम अपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो कर सकते हैं।



संबंधित खबरें

पोल

गौरी लंकेश की हत्या के बाद आयोजित विरोधसभा के मंच पर नेताओ का आना क्या ठीक है?

हां

नहीं

पता नहीं

Copyright © 2017 samachar4media.com