संपादक का बचाव सुनिए-‘संपादक कोई प्रोफेसर थोडे़ न होता है, 13 घंटे काम करता है...

संपादक का बचाव सुनिए-‘संपादक कोई प्रोफेसर थोडे़ न होता है, 13 घंटे काम करता है...

Wednesday, 13 September, 2017

दुर्भाग्य की बात है कि अधिकांश न्यूज चैनलों के एंकर-संपादकों ने तो राष्ट्रवादको अपनी पत्रकारिता का अपरिहार्य गुणक बताकर अपने को बौद्धिक ईमानदारी का अलमबरदार बताना भी शुरू कर दिया है। दैनिक जागरण में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं-

चैनलों की चर्चा का गिरता स्तर

कोई दस साल पहले जब न्यूज चैनलों के प्राइम-टाइम स्लॉट को बाबा, भूत-भभूत और एलियनके शिकंजे से छुड़ाकर स्वस्थ स्टूडियो चर्चा की ओर लाया गया तो उद्देश्य था जनसंवाद के केंद्र में लोकोपयोगी मुद्दों को लाना। इससे अपेक्षा की गई थी कि एंकर उस मुद्दे पर यथासंभव जानकारी अपनी रिसर्च यूनिट से हासिल कर पूरी तरह सत्य के निकट पहुंचने की कोशिश करेगा। यानी वे पक्ष-विपक्ष दोनों पहलू से समाज को अवगत कराने की ईमानदार कोशिश करेंगे। इस राजनीतिक संवाद में विभिन्न पार्टियों के प्रमुख लोग होंगे और सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक या अन्य मामलों में उस विषय के प्रतिनिधि तथा जानकार और स्वतंत्र विश्लेषक होंगे, जिनकी जानकारी और निरपेक्ष तर्कशक्ति विषय को ट्रैक पर रखेगी।

दरअसल यह प्रयास दो कारणों से किया गया। पहला, घटिया विषय-वस्तु देने से समाज में मीडिया और खासकर संपादकों की छवि काफी गिरने लगी थी। दूसरा, प्रजातंत्र के बेहतर संचरण के चार मूल तत्व होते हैं-बहुमत का शासन, अल्पसंख्यकों के अधिकार की रक्षा, संवैधानिक शासन पद्धति और विमर्श से शासन। क्योंकि चुनाव जीत कर सरकार चलाना कोई साइकिल स्टैंड का ठेका लेना नहीं है और सरकार से उसके कार्यों का हिसाब लगातार लेना, जनविमर्श के जरिये उसे अमुक कार्य करने या न करने के लिए प्रेरित करना और अगले चुनाव में उसे खारिज करने या फिर बहाल करने का भय बनाए रखना इसी विमर्श का हिस्सा होता है। इसी अवधारणा के कारण मीडिया की भूमिका स्वस्थ प्रजातंत्र में अपरिहार्य मानी जाती है।

स्टूडियो परिचर्चा के जरिये हमारा प्रयास था कि सार्थक मुद्दों पर बहस के माध्यम से दर्शकों को दोनों पक्ष के तथ्य दे दिए जाएं और फिर उन्हें जनविमर्श के केंद्र में ला कर छोड़ दिया जाए ताकि अगले दिन सुबह चाय की दुकानों, कार्यालयों और अन्य विमर्श के कोनोंमें लोग इस पर चर्चा करें और प्रजातंत्र की जड़ें अतार्किक, अवैज्ञानिक तथा भावनात्मक मुद्दों की बाढ़ में बह न जाएं। साथ ही चूंकि भारत सरीखे परंपरागत देश में वैज्ञानिक सोच लाने के लिए कोई क्रांति हुई ही नहीं (जो हुई वह गलत या सही संविधान में ही कैद रह गई-जैसे दलित प्रताड़ना और जातिवाद से छुटकारा, भ्रष्टाचार उन्मूलन, संप्रदायवाद के दंश से मुक्ति), लिहाजा इसका एक बड़ा फायदा यह होता कि समाज की तर्कशक्ति बेहतर होती और वह भावशून्य और तथ्य पर आधारित सोच विकसित करता। लेकिन कुछ ही वर्षों में यह सब कुछ पटरी से उतर गया और उद्देश्यों के ठीक उल्टा होने लगा। न्यूज चैनलों के संपादकों को लगा कि इसमें देशव्यापी पहचान बनती है, सत्ता सीधे प्रभावित होती है और उसकी फेस वैल्यू उसे तनख्वाह आसमानी करवाने में मदद करती है, लिहाजा चेहरा रंगा-पोतवा कर वे हर शाम घंटे-दो घंटे की कवायद को अपनी पत्रकारिता की गणेश-पूजामानने लगे। भूत-भभूत, बाबाओं और गाय ले जाने वाले आकाशीय एलिएंसदिखाने से अभी-अभी छूटे इन संपादकों को पढ़ने की आदत नहीं रही, लिहाजा शाम के डिस्कोके लिए विषय का चुनाव भी राधे-मां, आसाराम और दो के बदले दस सिरसे ऊपर नहीं बढ़ पाया। दरअसल इसमें एंकर-संपादकों को पढ़ना नहीं होता। खाली हांफ-हांफ कर राष्ट्रवाद में तन-मन न्योछावर करने के भाव में आना होता है। दुर्भाग्य की बात है कि अधिकांश न्यूज चैनलों के एंकर-संपादकों ने तो राष्ट्रवादको अपनी पत्रकारिता का अपरिहार्य गुणक बताकर अपने को बौद्धिक ईमानदारी का अलमबरदार बताना भी शुरू कर दिया है।

इन दिनों गुरमीत मुद्दे पर दिन-रात वह तहखाना दिखाया जा रहा है जिसमें इन लाल-बुझक्कड़ों के अनुसार वह एक सुरंग के जरिये दुष्कर्म करने के लिए लड़कियों को मंगवाता था। इनमें से कई चैनलों के संपादकों को हाल ही में गुरमीत अपनी फिल्म प्रमोशन के लिए इंटरव्यू दे चुका है। लेकिन तब इनको बाबा नैतिकता की प्रतिमूर्ति लगा था। तब किसी एंकर-संपादक ने इस बात पर चर्चा नहीं की कि कैसे देश में कमजोर और अज्ञानी वर्ग इन कथित बाबाओं के चंगुल में दिनोंदिन फंसता गया? इसमें सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों और बाजार की ताकतों और सत्ता-बाबा गठजोड़ की क्या भूमिका थी? संविधान में संशोधन करके वर्ष 1976 से वैज्ञानिक सोच विकसित करनाहर नागरिक का कर्तव्य माना गया, लेकिन क्या सरकार ने इसके लिए कोई फंड या विभाग या कोई अन्य उपक्रम किया? या फिर किसी मीडिया संस्थान ने क्या कभी इसके लिए कोई अभियान चलाया? उस कथित बाबा से हम विज्ञापन लेते रहे और जब वह फंसगया तो उसके बेडरूमकी अय्याशी हफ्तों-दर-हफ्तों दिखाने लगे। इस पूरी कवायद में पढ़ने की जरूरत है कहां? एक और उदाहरण लें।

कुछ हफ्ते पहले देश के स्वास्थ्य क्षेत्र को लेकर सरकार की एक विस्तृत रिपोर्ट आई। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएसएच) की यह चौथी रिपोर्ट है (तीसरी साल 2007 में आई थी)। इस वृहद रिपोर्ट जिसमें देश के हर जिले में स्वास्थ्य की कितनी बुरी स्थिति है, पर प्रमाणिक ब्यौरा दिया गया है। पढ़ने पर पता चलता है कि देश में स्वास्थ्य की स्थिति बेहद खराब है। क्या इन सर्वज्ञएंकर-संपादकों को इस पर जनविमर्श तैयार नहीं करना चाहिए था? लेकिन इसके लिए इनको कई दशकों तक पढ़ना पड़ता तब वे इस विषय का महत्व समझ पाते, लिहाजा शाम को ये फिर किसी बाबा के बेडरूममें घुस गए। जाहिर है जब संपादक महोदय न्यूज रूम में ऐसे टॉपिक का चुनाव करेंगे तो रिपोर्टर खबर लाएगा बाबा रोज शाम को काम-शक्तिवर्धक दवा खाता था

दो दिन पहले एक प्रमाणिक रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में लगातार गरीब-अमीर की खाई बढ़ रही है। तमाम अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं लगातार चीख-चीख कर बता रही हैं कि भारत का आर्थिक मॉडल गलत है और इसमें गरीब और गरीब बन रहा है और अमीर और अमीर, लेकिन क्या आपने एक दिन भी कोई चर्चा सुनी है? कारण? एंकर महोदय को पढ़ना पडे़गा। मीडिया में लाखों रुपये महीने की तनख्वाह, रातों-रात सेलिब्रिटी बनकर बेपनाह पहचान’, हर शाम महज घंटे-दो घंटे के लिए राष्ट्रवाद या बाबा की अय्याशीको लेकर गुस्से के भाव ने भारत के सार्थक जनसंवाद को कहीं दूर फेंक दिया है।

इनमें से एक अपेक्षाकृत बेहतर वसूलों वाले संपादक का बचाव सुनिए-संपादक कोई प्रोफेसर थोडे़ न होता है। 13 घंटे काम करता है। अगर वह ऑफिस में संविधान और गूढ़ रिपोर्ट पढे़गा तो चैनल चल चुका।शायद उसे नहीं मालूम था कि संपादक प्रोफेसर से ज्यादा पढ़ता है और तब जब समाज से सम्मान मिलता है वह अलग होता है। पंडित भीमसेन जोशी और मीका में अंतर समझना होगा।

(साभार: दैनिक जागरण)
 

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