क्या बाबा, बेबी और मौलवी ही न्यूज चैनलों पर दिखते रहेंगे?

क्या बाबा, बेबी और मौलवी ही न्यूज चैनलों पर दिखते रहेंगे?

Thursday, 02 November, 2017

रमेश कुमार

जागरुक टीवी दर्शक ।।

आज का पत्रकार समाज दो धाराओं में बट चुका है एक तरफ के लोग सत्ता पक्ष के चाटुकार बने हुए हैं तो दूसरी तरफ के लोग विपक्ष का बंधुआ मजदूर ऐसे में जनता की बुनियादी समस्या गौण सी हो गई है सामाजिक सरोकार की बातें कोई नहीं करना चाहता केवल बाबा, बेबी तथा मुल्ले मौलवीओ की कहानियां न्यूज का विषय बना हुआ है?

ऐसा नहीं है कि सभी पत्रकार चाटुकार और बंधुआ मजदूर ही हैं, कुछ पत्रकार ऐसे भी हैं जो इन सब विषयों से कोसों दूर रहकर अपने पेशे का मान-सम्मान रखते हुए निष्पक्ष पत्रकारिता कर रहे हैं, लेकिन उनकी संख्या गिनी-चुनी है। ऐसे पत्रकार जनता की बुनियादी समस्याओं को तो उठा रहे हैं लेकिन चाटुकार पत्रकारों की संख्या अधिक होने के कारण लोगों का ध्यान खबर के बजाय एंटरटेनमेंट पर ही जाता है।

एंटरटेनमेंट शब्द का प्रयोग मैंने इसलिए किया, क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्राइवेट न्यूज चैनलों पर खबर कम मनोरंजन की अधिकता ज्यादा है। अरे भाई आपको मनोरंजन ही करना था, तो आप न्यूज चैनल की जगह मनोरंजन चैनल में काम कीजिए, न्यूज चैनल है तो खबर ही दिखाइए और उस पर ही फोकस रखिए।

आज न्यूज चैनलों का मकसद सिर्फ व सिर्फ टीआरपी बटोरना तथा न्यूज एंकरो को ट्विटर पर फॉलोअर्स बटोरना ही रह गया है। इसके लिए केवल पत्रकार ही जिम्मेवार नहीं है, आम जनता भी जिम्मेदार है। अगर आप न्यूज चैनल पर एंटरटेनमेंट वाले शोज को नजरअंदाज करोगे, तो अपने आप न्यूज चैनल आपके मुद्दे उठाने पर मजबूर हो जाएंगे।

जैसा श्रोतावैसा ही गवैया होता है। निष्पक्ष पत्रकारों की संख्या कम होने का कारण बुनियादी समस्याओं को जानने वाले की संख्या की कमी है।  

मैं सभी पत्रकारों से आग्रह करूंगा कि आप अपने अंदर झांककर देखें कि आप किस धारा की तरफ जा रहे है (1)सत्ता पक्ष की चाटुकारिता की तरफ? (2) विपक्ष की बंधुआ मजदूरी के तरफ? (3)या उन गिने चुने निष्पक्ष पत्रकारों की पत्रकारिता की तरफ?

 

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