योगी की ताजपोशी की कहानी, टीवी पत्रकार दिनेश कांडपाल की जुबानी

Wednesday, 22 March, 2017

दिनेश कांडपाल

सीनियर प्रड्यूसर, इंडिया टीवी ।।

बीजेपी ने जब यूपी के लिये चुनाव प्रचार की रणनीति तय की उसी वक्त तय हो गया कि योगी आदित्यनाथ किस भूमिका में आगे बढ़ सकते हैं। बीजेपी की मजबूरी थी कि वो कोई एक नाम आगे नहीं कर सकती थी। बिहार से सबक ले चुके बीजेपी के रणनीतिकार यूपी के लिये कोई भी कमज़ोर कड़ी छोड़ना नहीं चाहते थे। उस वक्त भी योगी बड़ा चेहरा तो थे लेकिन विपक्ष उनको आसानी से निशाने पर ले सकता था। योगी को निशाने पर रखकर विरोधी दल इतना शोर कर सकते थे कि बीजेपी का ध्यान भटक जाता। बीजेपी ने जिस लक्ष्य के लिये पिछले दो साल से तैयारियां शुरू कर दी थीं उसके लिये कोई भी चूक इस वक्त खतरनाक हो सकती थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने विरोधियों के पास कोई चेहरा नहीं था, योगी आगे आते तो तुलनाएं शुरु हो सकती थीं।

किसकी पसंद थे योगी?

ये सवाल 18 मार्च को उस वक्त उठना शुरू हुआ जब योगी ने दिल्ली से लखनऊ के लिये उड़ान भरी। लखनऊ के वीवीआईपी गेस्ट हाउस में वैंकया नायडू और योगी की मुलाकात हुई तो राजनीतिक प्रेक्षक कौतूहल से भर गये। बड़े बड़े पंडित और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अपनी बात का भरोसा न होने पर सूत्रों का हवाला लेने वाले रिपोर्टर सकते में आ गये। ये सवाल तो अभी तक नहीं उठा कि योगी को सीएम क्यों बनाया, सबसे बड़ा सवाल तो ये खड़ा हो गया कि योगी को सीएम किसने बनाया। दरअसल लोकसभा चुनाव में बंपर जीत के बाद से ही बीजेपी के लिये ये ज़रूरी हो गया था कि वो हिंदुत्व के प्रतीकों को आगे बढ़ाने पर गहराई से सोचे। राजनीतिक क्षेत्र के साथ साथ दूसरे सामाजिक क्षेत्रों में भी। केन्द्र सरकार कुछ नियुक्तियों में परेशानी देख चुकी थी, लेकिन एजेंडे से हटने का मतलब होता जनादेश का निरादर करना। योगी आदित्यनाथ हिंदुत्व का उग्र चेहरा हैं, लेकिन पिछले 6 महीने से शांत है। उनकी बातों में गंभीरता है, किसी रैली का भाषण हो या फिर टेलिविज़न शो का संवाद। योगी संयमित हैं।

सवाल पर लौटते हैं कि योगी आखिर किसकी पसंद हैं। आरएसएस के अनुषांगिक संगठनों से जुड़े लोग बताते हैं कि ये योगी आदित्यनाथ साझा रणनीतिक पसंद हैं। योगी को सीएम बनाने का विचार नागपुर से होकर दिल्ली नहीं आया। बल्कि नागपुर से दिल्ली के केशव कुंज और 7 लोक कल्याण मार्ग से अशोक रोड तक जहां भी भविष्य को लेकर मंथन हुआ वहां योगी फिट होते चले गये। बीजेपी को यूपी में जीत दिख रही थी, ज़ाहिर है नामों पर भी हाईकमान विचार कर ही रही होगी, इसलिये जब नतीजा आया तो दिल्ली में केवल दो लोग मंथन करते दिखे एक थे अमित शाह और दूसरे केशव प्रसाद मौर्य। फैसला तो हो चुका था, जिन्हें ज़रूरत थी उन्हें बता भी दिया गया था। मीडिया और नेताओं के बीच ब्रेकिंग का खेल खेला जा रहा था, अमित शाह ने उसे खेलने दिया।

योगी को कब बताया गया?

योगी आदित्यनाथ के तेवर दो आवरण लिये हुए थे। पूरे चुनाव के दौरान योगी का एक भी बयान विवादों में नहीं आया। योगी ने सुर तीखे रखे लेकिन शब्दों को संयमित कर लिया। आवाज़ बुलंद रखी लेकिन बातों को विवादों से दूर ही रखा। जो लोग पिछले 6 महीने से योगी को कवर रह रहे हैं वो ये अनुभव कर चुके होंगे की योगी खुद किसी बड़ी योजना की तरफ चल चुके हैं। योगी ने बीजेपी के लिये बतौर स्टार प्रचारक गाज़ियाबाद से लेकर गोरखपुर तक प्रचार किया। बीजेपी के उम्मीदवारों में पीएम मोदी और अमित शाह के बाद योगी सबसे बड़ी पसंद थे, ये संकेत भी पार्टी हाईकमान को बता रहे थे कि यूपी को किसका साथ पसंद हैं। पूरे चुनाव में योगी लगभग हर जगह गये और जमकर गरजे, लेकिन मर्यादा के दायरे में। योगी आदित्यनाथ को तैयार रहने के संकेत दिये जा चुके थे, उन्हें बता दिया गया था कि जीत के लिये मेहनत कीजिये और आगे के नक्शे पर कदम बढ़ाईये।

योगी को क्यों चुना गया?

जिन लोगों ने योगी आदित्यनाथ की शपथ को ठीक से देखा या सुना है उन्होंने गौर किया होगा कि यूपी के नये सीएम का नाम थोड़ा आगे पीछे हो गया है। हम जानते हैं य़ोगी आदित्यनाथ को लेकिन शपथ के दिन हमारा परिचय हुआ आदित्यनाथ योगी से। संत परंपराओं के देश वाला कोई भी शख्स बता सकता है कि पहले योगी लगता है उसके बाद नाम। यही बड़ी वजह है योगी के चुनाव की। 45 फीसदी ओबीसी, 21 फीसदी दलित और उसके बाद अगड़ी जातियों के पेंच, योगी नाम लगते ही बीजेपी ने उस बड़ी बाधा को पार कर लिया जिस पर उसके विरोधी चारों खाने चित होकर बैठ गये हैं। योगी की कोई जात नहीं है और यूपी में बिना जात के बात नहीं होगी। योगी आदित्यनाथ हिंदुत्व का वो छाता है जिसकी छांव में सारे जाति, पंथ बाहर की धूप में खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं। बीजेपी हाईकमान जानता था कि उसे नया वोटर मिल तो गया लेकिन उसे सहेज कर रखना ज़रूरी है, इसलिये एक बिना जात वाले को आगे कर दिया और उस बंधन से पार पा गये।

कुल मिलाकर योगी में बीजेपी बड़ा भविष्य देख रही है और कुछ उत्साही देश का भविष्य भी देखने लगे हैं।



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