नए जमाने के युवाओं की जीवनशैली के प्रति समाज को संवदेशनशील होने की जरूररत: शेखर गुप्ता

Thursday, 28 September, 2017

मैं जजों के तर्क पर सवाल नहीं उठा रहा हूं। मैं किसी पितृ सत्तात्मकता अथवा नैतिकता की दुहाई भी नहीं दे रहा हूं। मैं सिर्फ वयस्कों के यौन रिश्तों व जीवनशैली के चुनाव को लेकर अधिक संवेदनशील होने का सुझाव दे रहा हूं।हिंदी अखबार दैनिक भास्करमें छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:

पीड़ित की स्वच्छंदता अपराधी का बचाव नहीं

आखिर कोई युवती पुरुष मित्र के साथ टाइट जींस और टी शर्ट पहनकर देर रात फिल्म देखने जाती ही क्यों है? क्या इससे स्वच्छंद रिश्ते जाहिर नहीं होते? उसने अपने माता-पिता और कॉलेज को बताया क्यों नहीं? वे ऐसी खाली बस में क्यों चढ़ें, जिसमें छह लफंगे दिखने वालों के अलावा कोई नहीं था? यह कैसा विवेकहीन, दुस्साहसी और गैर-जिम्मेदार व्यवहार था? बस में सवार लोगों ने दुष्कर्म करके और उसके साथी को पीटकर गलत ही किया पर तुमने उन्हें ऐसे उकसाने वाले हालात में क्यों डाला? जब वे उकसावे में आ ही गए तो बाद में आसाराम बापू के कहे मुताबिक उन्हें भाई कहकर उनकी कलाई पर राखी बांधने की पेशकश क्यों नहीं की? वह बेअसर रहता तो सबकुछ शांति से क्यों नहीं होने दिया? इससे तुम हिंसा और मौत से बच जाती। फिर तुम्हारा तो बॉय फ्रेंड भी था, शायद अंतरंग संबंधों की आदत होगी। ऐसे में इतना घातक संघर्ष करने की जरूरत क्या थी?

काश! उन मूर्ख लड़कों ने तुम्हारी जान न ली होती, तो उन्हें उदार सजा सुनाई जाती, जिसे निलंबित रखा जाता। क्योंकि तब ऐसे मामलों के पहले या बाद में होने वाली खौंफनाक हिंसा नहीं होती। संभव है वे लड़के भी बेंगलुरु के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हैल्थ एंड न्यूरोसाइंस (निमहान्स) में मौजूद देश के सबसे बड़े मनोवैज्ञानिकों से काउंसलिंग के बाद सामान्य जिंदगी में लौट जाते। अदालतें भी शायद निमहान्स डायरेक्टर को यह काम प्राथमिकता के आधार पर करने को कहतीं। यह ऐसी त्रासदी है, जिसमें आठ ज़िंदगियां व इतने ही परिवार खाई में धकेल दिए गए। देश को हिला देने वाले निर्भया कांड के बारे में ऐसा लिखने के लिए अगर आप मुझ पर गुस्सा हैं तो मैं अपनी कोशिश में कामयाब रहा।

आइए, निर्भया कांड के एक साल बाद हरियाणा के सोनीपत में घटी घटना पर जाएं। ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी की एक छात्रा ने बॉयफ्रेंड पर ब्लैकमेल और साथियों सहित कई बार दुष्कर्म करने का आरोप लगाया, जिसमें एक स्थिति तो सामूहिक दुष्कर्म जैसी भी थी। पहले लड़के ने अपने निर्वस्त्र फोटो भेजे, फिर उसे अपने भेजने के लिए उकसाया। फिर उसे धमकी दी कि वह इन्हें कैंपस में सबको और उसके माता-पिता को दिखा देगा। उसने यह सब एक मजिस्ट्रेट को निर्भया कांड के बाद बने नए कड़े कानून के अनुरूप सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दर्ज कराया। उसने यह भी कहा कि बॉयफ्रेंड ने ब्लैकमेल करके उसे एक सेक्स टॉय खरीदकर उसका इस्तेमाल करने पर मजबूर किया, जिसे उसने स्काइप पर देखा। निचली अदालत की जज सुनीता ग्रोवर ने युवती के आरोप स्वीकार किए। तीन लड़कों को दुष्कर्म, ब्लैकमेल, आईटी कानून के उल्लंघन सहित कई अपराधों का दोषी पाया और दुष्कर्म के लिए 20 साल की सजा सहित कई सजाएं सुनाई गईं। दोषियों ने पंजाब व हरियाणा हाई कोर्ट में अपील की। हालांकि, दो हफ्ते पहले हाई कोर्ट की बेंच ने मामले में अपराध की गंभीरता घटाने वाले कुछ महत्वपूर्ण पक्ष देखकर दुष्कर्म/ब्लैकमेल के दोषियों को जमानत दे दी।

बेंच ने स्पष्ट कहा है कि इस आदेश में वे जो कह रहे हैं उसका अपील पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। चूंकि हमारे यहां अपील की प्रक्रिया में वक्त लगता है इसलिए उचित होगा कि इन युवकों को छोड़ दिया जाए। वे नए सिरे से ज़िंदगी शुरू करें, पढ़ाई पूरी करें, जरूरी हो तो विदेश जाएं बशर्ते अदालत की अनुमति ली जाए। लड़कों की दिल्ली के एम्स में काउंसलिंग कराई जाए। एम्स डायरेक्टर को आदेश दिया कि वे पूरी प्रक्रिया की प्रगति से कोर्ट को अवगत कराएं। जजों की बुद्धिमत्ता पर सवाल उठाने का मेरा जरा-सा भी इरादा नहीं है। शिकायतकर्ता की पृष्ठभूमि, व्यवहार, दोषियों के साथ उसके संबंधों के आधार पर उन्होंने यह महत्वपूर्ण फैसला लिया है। बहस की कोई गुंजाइश नहीं। 

नीचे मैंने कानून की जानकार अपनी साथी अपूर्वा विश्वनाथ की मदद से माननीय जजों के 12 पेजों के आदेश में से कुछ अंश निकाले हैं: पीड़ित का बयान और जि़रह बताती है उसके तीन अभियुक्तों के साथ अंतरंग संबंध रहे हैं और किसी भी चरण पर उसने अपनी मानसिक स्थिति कॉलेज के अधिकारियों या पालकों अथवा मित्रों के सामने उजागर करने की कोशिश नहीं की। जिरह के दौरान पीड़ित ने माना कि होस्टल के कमरे की तलाशी में वार्डन को कंडोम मिले थे लेकिन, पालकों को इसकी सूचना नहीं दी गई थी। उसने माना कि उसे क्लासिकसिगरेट पीने की आदत है। उसने नशीले पदार्थ लेने की बात मानी पर कहा कि यह उसने मर्जी से नहीं किया। यह पदार्थ ज्वाइंटथा। यह पूरा सिलसिला युवाओं की पतनशील मानसिकता दिखाता है, जिससे नशीले पदार्थ, शराब, अंतरंग रिश्ते और अशालीनता के दलदल में फंसे रिश्ते पैदा होते हैं।

अचरज नहीं कि हमारे सामने ऐसी त्रासदी है, जिसमें चार युवा जिंदगियां व इतने ही परिवार रसातल में पहुंच गए हैं। पीड़ित का बयान उसके मित्रों के साथ अनौपचारिक रिश्तों, अंतरंग रिश्तों में दुस्साहस व प्रयोगशीलता की समानांतर कहानी बताता है। ये तथ्य सजा निलंबित रखने की याचिका पर विचार करने के अकाट्य कारण देते हैं और पूरी दास्तान वह खौंफनाक हिंसा नहीं बताती, जो ऐसी घटनाओं के पहले और बाद में आमतौर पर होती है।

अब आपको इस लेख के शुरू में लिखे अंशों का आशय समझ में आ गया होगा। मेरी दलील खुद ही सब स्पष्ट करती है। फिर कहूंगा कि मैं जजों के तर्क पर सवाल नहीं उठा रहा हूं। मैं किसी पितृ सत्तात्मकता अथवा नैतिकता की दुहाई भी नहीं दे रहा हूं। मैं सिर्फ वयस्कों के यौन रिश्तों व जीवनशैली के चुनाव को लेकर अधिक संवेदनशील होने का सुझाव दे रहा हूं।

जोनाथन कैप्लन की 1988 की अवॉर्ड विजेता फिल्म द एक्यूस्डदेखना अच्छी शुरुआत हो सकती है। जूडी फास्टर द्वारा अभिनीत सामूहिक दुष्कर्म की शिकार पात्र कामकाजी महिला है। लियो रोसी द्वारा अभिनीत बचाव पक्ष का गवाह कहता है, ‘दुष्कर्म? यह वेश्या है.. उसे यह सब पसंद है अब वह दूसरों को दोष दे रही है।’ 1988 की फिल्म में इस दलील को स्वीकार नहीं किया गया। क्या अब इसे असली जिंदगी में 2017 में स्वीकारना चाहिए

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)


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