‘सुशांतजी, उस रात आपसे मिलकर आने के बाद मैं पूरी रात सो नहीं पाया...’

‘सुशांतजी, उस रात आपसे मिलकर आने के बाद मैं पूरी रात सो नहीं पाया...’

Wednesday, 04 October, 2017

रवीश कुमार के खिलाफ टीवी एंकर सुशांत सिन्हा ने एक खुला खत लिखा, लेकिन उनके इस खत पर नाराजगी व्यक्त करते हुए मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार ने भी उन्हें एक खुला खत लिखा है, जिसमें उन्होंने उस रात की पहली मुलाकात का जिक्र किया, जब सुशांत के घर चोरी हो गई थीं और वे सुशांत के घर मिलने पहुंचे थे। पढ़िए उनका ये खत...

आप उस रात मुझे जरूर मनोरोगी लगे थे सुशांतजी

लेकिन उसके बाद कभी नहीं, आप हैं भी नहीं..

आदरणीय सुशांतजी

नमस्ते

देखिए कैसे-कैसे संदर्भ और मौके बनते हैं कि अचानक से दो अलग दुनिया आपस में एकदम सटी हुई, छोटी लगने लग जाती है। आज रात जब लिखने बैठा हूं तो सात-आठ साल पहले वाली रात एकदम से याद आने लग जा रही है। ऐसे कि जैसे ये कल की ही बात हो।

यूनिवर्सिटी से बुरी तरह थककर मैं वापस अपने घर की तरफ लौटा था। सोसायटी की बैक गेट से गार्ड ने जाने से रोक लिया। मैं पूछता कि मामला क्या कि इसके पहले ही भीतर का मंजर दिखाई दिया। अंदर पैदल आने-जाने तक की जगह नहीं थी। घूमकर दूसरी गेट पर पहुंचा तो चारों तरफ चैनलों के ओबी वैन लगे थे। पुलिस भरी हुई थी। अफरा-तफरी का माहौल था। मैंने एक-दो से पूछा तो पता चला एनडीटीवी के पत्रकार हैं सुशांत सिन्हा के घर अज्ञात लोग घुसे थे, उन्हें बांध दिया और लूटपाट किया। मेरे मुंह से एकदम से निकला- सुशांत सर जो पहले लाइव इंडिया में थे? लोग हमारी शक्ल देखने लग गए और पलटकर कहा- नहीं, एनडीटीवी इंडिया।

मैं आपको लेकर बेचैन हो गया। इस घटना से कुछ ही दिन पहले मयूर विहार में बीबीसी की एक पत्रकार की हत्या की खबर आयी थी। उस दिन आपसे मिलना संभव नहीं था। दिन की कोशिश भी नाकाम रही। अंत में आज की ही तरह पौने नौ-नौ बजे के आसपास मैंने आपके घर का दरवाजा खटखटाया। मेरे साथ मेरा एक दोस्त भी था। आपने लंगडाते हुए दरवाजा खोला। मैंने अपना परिचय देते हुए कहा- मेरा नाम विनीत है, आपके घर के ठीक सामने के कोने वाले घर में रहता हूं। डीयू से पीएचडी कर रहा हूं। सुनकर बहुत बुरा लगा ये सब तो मिलने चला आया। आपने कहा विनीत, हां-हां आपको तो जानता हूं। आपने मीडिया आधारित कुछ वेबसाइट के नाम लिए और कहा- आप तो सोशल मीडिया पर बहुत एक्टिव हो, पढ़ता रहता हूं आपको। आइए-आइए।

मैं आपके घर की ड्राइंग रूम में बैठ गया। आप बताने लगे कि आपके साथ क्या हुआ? मैं बार-बार अपनी जेब में हाथ डालकर रुक जा रहा था। उसमे तीन टी-बैग, कागज की पुड़िया में थोड़ी सी चीनी और एवरिडे मिल्क पाउडर थे। मैंने घर से चलते वक्त ये सारी चीजें रख ली थी और सोचा था कि आप बहुत बुरा फील कर रहे होंगे। आपकी किचन में तीन कप चाय बनाउंगा। आप जो खाना चाहेंगे, वो भी उसके बाद बना दूंगा। वैसे भी रात का खाना तो घर पर बनाना ही होता। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। आप बोलते रहे और हम दोनों सुनते रहे।

तीन-चार मिनट ही हुए होंगे कि मुझे आपको लेकर बेहद अफसोस होने लगा और खुद पर भी। मुझे लगने लगा कि हम जैसे लोगों की आपको बिल्कुल भी जरूरत नहीं है। आपकी पूरी बातचीत में बार-बार दो ही चीजें शामिल थी। एक मंहगे मोबाइल की कीमत जिसे उन्होंने ले लिया था या फिर देने के लिए दवाब बना रहे थे, ठीक से याद नहीं और दूसरा कि डॉ. राय ने आपको डायरेक्ट फोन किया जो कि आपके हिसाब से बड़ी बात थी। फिर एक-एक करके उन मंत्रियों, राजनेताओं, पुलिस-प्रशासन के बारे में बताने लग गए थे जो लगातार आपका हाल-चाल जानने के लिए फोन कर रहे थे।

ये सब कहने का अंदाज आपका ऐसा था कि सामने वाले को लगे कि इस पत्रकार को कितना लोग जानते हैं और वो भी पर्सनली। आप बार-बार जताने की कोशिश कर रहे थे कि आप दिल्ली जैसे शहर में रसूकदार लोगों से बेहतर संपर्क में हैं। कायदे से ये सब सुनकर किसी को भी बहुत प्रभावित हो जाना चाहिए था लेकिन मैं एकदम से उदासीन हो गया। पछताने लग गया कि मुझ अदने को क्या जरूरत थी हाल पूछने, आने की। लेकिन हमें इतना तो इल्म है ही कि संपर्क कमाना और लोग कमाना, दो अलग-अलग चीजें हैं।

सुशांतजी, हमारी पूरी अपब्रिंगिंग उन्हीं रसूकदार लोगों के बीच हुई जिनकी चर्चा आप संवेदना के स्तर पर नहीं स्टेटस क्यों के लिए ले रहे थे। कल तक हम जिसके साथ ग्वायर हॉल कैंटीन में मीठे समोसे खा रहे होते वो एसपी, डीएम बनकर देश का काम कर रहे हैं। हॉस्टल की पूरी-पूरी विंग यूपीएससी में सेलेक्ट हो जाती। इसी तरह संत जेवियर्स की पूरी की पूरी लॉट एमबीए, फैशन डिजायनिंग के बेहतरीन संस्थानों में। ऐसा सिर्फ मेरे साथ नहीं है। डीयू -जेएनयू में पढ़ रहे आप किसी भी स्टूडेंट से बात करें तो उन्हें दो-चार दस ऐसे लोग जानने वाले होंगे हीं। और फिर देश के एक बड़े नेटवर्क में कोई मीडियाकर्मी काम कर रहा है और उसे उनके सुपर बॉस, मंत्री, पुलिस कमिश्नर फोन कर रहे हैं तो इसमे कौन सी बड़ी बात है। बावजूद इसके आप जब उनके बारे में बता रहे थे तो आपके चेहरे पर आपके साथ जो कुछ हुआ है, उसे लेकर शिकन नहीं, एक खास किस्म का दर्प था और उस दर्प पर नजर पड़ते ही मैं उस रात आपकी तकलीफ से उस स्तर पर जुड़ नहीं पाया जैसा घर से चलते वक्त तरल हुआ जा रहा था।

मैं उस उदास ड्राइंगरूम में बैठे-बैठे जितना अनुमान लगा सकता था, लगा लिया था। आपके साथ कोई नहीं था। आप इतने बड़े हादसे के बीच एकदम से अकेले थे। लोग आ-जा जरूर रहे होंगे और ये कहते हुए विदा ले रहे होंगे कि सुशांत, किसी भी चीज की जरूरत हो तो बेहिचक बताना। मैंने इशारे में जानना भी चाहा लेकिन आपने फिर से एक नया संदर्भ शामिल किया कि दिल्ली में आपके कौन-कौन रिश्तेदार किन-किन पॉश इलाके में रहते हैं। एक बार फिर स्टेटस क्यों की गिरफ्त में।

सुशांतजी, मीडिया बिरादरी में आप ऐसे पहले शख्स थे, ऐसा नहीं है। मैंने इस दुनिया को बहुत करीब से देखा है। क्रोमा-मोंटाज के आगे जिन चमकीले चेहरे के जरिए दुनिया अपनी राय कायम करती है, वो कई बार अपने निजी जीवन में एकदम अकेला और यथार्थ की जमीन से कटे होते हैं। उन्हें रिक्शे-ठेलेवाले से तो लेना-देना होता नहीं, कायदे से पावर क्लब का भी सदस्य नहीं हो पाते। वो एक अजीब सी दुविधा और अपरिचय की दुनिया में जीते हुए अकेले पड़ जाते हैं। लेकिन उस रात मैं दूसरे सिरे से सोच रहा था। मैं सोच रहा था कि मीडिया मंडी की ये कैसी दुनिया है कि इंसान किसी और के प्रति तो न सही, खुद के प्रति भी संवेदनशील नहीं हो पाता। वो महसूस नहीं कर पाता कि उसे किस वक्त किस मानवीय पक्ष के साथ खड़े होकर जीना है? जब सभा-सेमिनारों में लोग कहते हैं कि मीडिया कॉर्पोरेट के हाथ बिका हुआ है, किसान-मजदूर, मेहनतकश वर्ग की खबरें नहीं दिखाता तो मैं उबने लग जाता हूं। मैं दूसरे सिरे से सवाल करता हूं- क्या इस मीडिया में खुद पत्रकारों की तकलीफ के लिए स्पेस बचा है, उसकी जिंदगी शामिल हो पाती है? वो चाहता है कि उसका संवेदनशील पक्ष उभरकर सामने आए?

आप उस रात जैसा व्यवहार कर रहे थे, हर्बट मार्कूजे ने इसे फॉल्स कन्शसनेस के तहत विश्लेषित किया है जिसमे हमें लगता है कि हम बहुत चौकस और जागरूक हो रहे हैं लेकिन उस स्तर की जागरूकता से कोसों दूर होते हैं जिसका संबंध हमारी बुनियादी जरूरतों से है।

मैं आपसे बात करके लौट आया। चलते-चलते इतना जरूर कहा- सर, किसी भी चीज की जरूरत हो तो बताइएगा, मैं एकदम सामने हूं आपके। आगे मैं जोड़ना चाह रहा था कि आपको दिक्कत न हो तो आपके यहां ही रुक जाउं, लेकिन ऐसा कह नहीं पाया। घर आया तो टी बैग बुरी तरह मुड-तुड़ चुके थे। थोड़ी सी चीनी पुड़िया से निकलकर जेब में गिर गयी थी और पाउडर दूध से जेब चिपचिपी हो गयी थी लेकिन इन सबके बीच मैं खुद बहुत ज्यादा चिपचिपा हो गया था।

सुशांतजी, पूरी बातचीत में मैंने आपको सर ही कह रहा था। अभी भी सुशांतजी लिखते हुए अजीब लग रहा है। आपने मुझे न तो पढ़ाया है, न कोई ट्रेनिंग दी है। बस जनमत न्यूज की सीढ़ियों से गुजरते हुए, स्टूडियो में आपको खबरें पढ़ते हुए देखा करता और एक ट्रेनी एंकर को सर ही तो बोलेगा तो बस वो सब याद आता रहा। एनडीटीवी पर आपकी एंकरिंग मुझे कभी पसंद नहीं आयी, दो-चार बार से ज्यादा देखा ही नहीं। इंडिया न्यूज देखना बहुत कम होता है सो आपको क्या, किसी को भी नहीं देख पाता। बावजूद इसके कोई उस रात की घटना की याद दिलाकर कहे कि आप मनोरोगी हैं तो मैं किसी हालत में ये शब्द आपके लिए इस्तेमाल नहीं कर सकता। अभी जो चिट्ठी आपने अपने पूर्व सहकर्मियों के नाम लिखी है, वो पढ़कर भी नहीं। आपसे असहमत होने और आपकी आलोचना करने के लिए मेरी डिक्शनरी में दर्जनों शब्द हैं लेकिन अंतिम शब्द के तौर पर भी मनोरोगी तो बिल्कुल भी नहीं। मीडिया और अकादमिक दुनिया का कोई शख्स, मेरे आसपास की दुनिया का कोई व्यक्ति यदि सच में मनोरोगी हो जाता है तो मैं अपनी क्षमता से उसके ठीक होने में मदद करूंगा, चिंता व्यक्त करूंगा, इंसानियत की जमीन पर खड़े होकर उसके लिए दुआएं करूंगा लेकिन सार्वजनिक मंच से इस बीमारी का कभी उपहास नहीं उडाउंगा। मैंने देखा है कि मनोरोगी होना क्या होता है?

सुशांतजी, उस रात आपसे मिलकर आने के बाद मैं पूरी रात सो नहीं पाया। मैं बार-बार इन्डस्ट्री के बारे में सोचने लगा जो मुझे सचमुच फॉल्स कन्शसनेस की शिकार लगती है। दर्शकों को लगता है कि उसका एंकर-रिपोर्टर जनमत तैयार कर रहा है लेकिन वो खुद अपने मोर्चे पर कितना संकटग्रस्त है, इस विडंबना से परिचित नहीं है। ऐसे मौके पर मैं साहित्य के अपने शिक्षकों का शुक्रिया अदा करता हूं कि उन्होंने चीजों को तात्कालिक असर में देखने के साथ-साथ उसके गहरे संदर्भों में जाकर देखने की सलाहियत दी। उस रात भी मैंने ऐसा ही सोचना शुरू किया और आपको लेकर मनोरोगी होने का जो ख्याल थोड़े वक्त के लिए आया था वो दूर हो गया।

मैं दिल्ली में लेखक-पत्रकारों की मौत पर अंतिम दर्शन करने जरूर जाता हूं। ज्यादातर लोगों से लिखे के स्तर के रिश्ते होते हैं, व्यक्तिगत रूप से नहीं। मैंने कई बार देखा है कि उस अंतिम क्षण में उनके साथ बहुत कम लोग होते हैं। उनके पीछे भले ही शोहरत, नाम, प्रकाशन और पुरस्कार का जखीरा रह गया हो। मुझे अंतिम दर्शन में जाना जरूरी लगता है। मैं इससे दिल्ली में रहते हुए डिटॉक्स हो पाता हूं। महसूस कर पाता हूं कि हम किस हद जंजालों के बीच फंसे और किस हद तक कुछ रचते हुए जी पा रहे हैं? आपकी घटना के बाद मैं यही सब सोचने लग गया।

मैं सोचने लगा कि जब हमारा वर्तमान एकदम कमजोर, विकट और संकटग्रस्त होता है तो हम उसके भीतर जीने के लिए या तो अपने अतीत से या फिर आसपास के मजबूत रेशे का सहारा लेते हैं। कोई जब भारत के गौरवशाली अतीत की याद करता है तो उसके पीछे का भाव यही होता है कि वो कमजोर वर्तमान के बीच जीने की ताकत अतीत से लेना चाह रहा है। हिन्दी साहित्य का छायावाद इसकी एक मजबूत प्रस्तावना है। जब देश की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थिति पर गर्व करने के लिए कुछ था ही नहीं तो प्रसाद हिमाद्रि तुंग शृंग से, प्रबुद्ध शुद्ध भारती... नहीं लिखते तो देशवासियों में शक्ति का संचार कैसे हो पाता? आपने अपनी तकलीफ के बीच जब अपने संपर्क और स्टेटस को मेरे सामने दोहराना चाहा तो उस वक्त तो बुरा जरूर लगा लेकिन इस सिरे से सोचने पर लगा कि संभव हो कि ये आपको मौजूदा हालात से उबरने में मदद करे। बाद में पता नहीं कि आप किस हद तक उबर पाए। इसके लिए आपने थोड़े दिनों बाद वो घर भी छोड़ दिया।

खैर, मैं आपके उस कदम को भी पलायन नहीं कहूंगा और न ही एक पत्रकार की जिम्मेदारी से बच निकलना। उस वक्त आपकी बुनियादी जरूरत उस भरोसे को समेटना था जिसमे सबसे पहले आप खुद को नागरिक की तरह महसूस करें। इन सबके बावजूद आपके घर की तरफ दोबारा कभी पैर बढ़े ही नहीं।

सुशांतजी, आपने अपनी चिट्ठी में अपने जिन सहकर्मियों को वितृष्णा के भाव से याद किया है, ये वही लोग हैं जिन्हें जब ये मालूम हुआ कि मैं आपके घर के सामने रहता हूं तो कई बार दोहराया- विनीत, प्लीज उसका ख्याल रखना। अभी-अभी तो चैनल जॉइन किया है और ये सब हो गया उसके साथ। पैर जमने से पहले ही परेशान हो गया। उसे फील मत होने देना कि वो अकेला है।

सुशांतजी, मैं ये चिट्ठी आपको कभी नहीं लिखता क्योंकि ये बेहद ही निजी प्रसंग है। मेरा आपके घर जाना, इमोशन में आकर साथ में टीबैग रखना, सब बहुत पर्सनल है। लेकिन आपके साथ उस वक्त जो कुछ भी हुआ, वो सार्वजनिक घटना थी और उसका असर भी सार्वजनिक था। मुझे नहीं पता कि आप इस चिट्ठी को किस तरह लेंगे लेकिन सच कहूं तो जब भी किसी मीडियाकर्मी-लेखक-साहित्यकार के साथ कुछ गलत होता है तो अपने भीतर बहुत कुछ मरता है। मैं अपने भीतर के पत्रकार-लेखक को जिंदा रखने के लिए कई बार ऐसी हरकतें कर जाता हूं जो व्यावहारिक दुनिया के हिसाब से फैंटेसी है। एफबी पर किसी की टाइमलाइन से गुजरते हुए पता चलता है कि वो बीमार है, अकेला है तो मैं फोन करके बात करने लग जाता हूं, पूछ लेता हूं- आकर खाना बना जाउं? कोई ब्रेकअप के विछोह से उबर नहीं पाता तो ऑफर कर देता हूं- मेरे पास आ जाओ कुछ दिनों के लिए।

ये सब करते हुए रिस्क है। पता नहीं कौन इसे किस तरह से देखे-समझे। लेकिन करता हूं क्योंकि मुझे हर बार यही लगता है कि देश का एक बेहतरीन माइंड गडबड़ होने से बच जाए, हमारे भीतर कोई चीज मरने से रह जाए।

एक सभ्य समाज में कोई मनोरोगी हो भी जाता है (हालांकि आपने जिस रविश कुमार की बात की है, वो आपलोगों की दुआ से एकदम फिट हैं) तो वो हमारे लिए उतनी ही चिंता की बात है जितनी कि उसकी खुद की। हम उसे ऐसे-कैसे छोड़ दे सकते हैं? उसका कैसे उपहास उड़ा सकते हैं? उसके पीछे कैसे ऐसी सामग्री छोड़ दें कि वो ट्रोल कंटेंट का काम करने लगे? उस शख्स ने हमें हजारों ऐसे शब्द दिए हैं जिससे हमारे सोचने की ताकत को मजबूती मिली है। उसने लिखकर-बोलकर दूरदराज के हजारों लोगों के बीच ये भरोसा पैदा करने का काम किया है कि पढ़ने-लिखने से किसी और कि नहीं, अपनी दुनिया बेहतर होती है। हम अपने जानते किसी भी लेखक-पत्रकार-साहित्यकार को ऐसा नहीं होने देंगे।

सुशांतजी। सत्ता और सरकार आती-जाती रहेंगी। उनसे असहमति और उनके प्रति प्रतिरोध भी जारी रहेंगे। बचा रहेगा तो सिर्फ असहमति का विवेक और हमारे भीतर का वो मानवीय पक्ष जो बुरे से बुरे वक्त में भी हमें आदमी की तरह सोचने, व्यवहार करने और इस दुनिया को सुंदर बनाने के लिए प्रोत्साहित करता रहे। कई बार हम अपने निजी, कटु अनुभवों को इस हद तक जूम इन करने की कोशिश करने लग जाते हैं कि बाकी चीजें अपना मूल आकार खोने लग जाती हैं। लेकिन यही वो नाजुक वक्त होता है जहां हमें ठहरकर सोचना होता है कि क्या ऐसा करते हुए हम शब्द के भीतर की ताकत को कही हुई बात की तासीर की सांकेतिक हत्या तो नहीं कर दे रहे? हम सर्जना के पेशे से जुड़े लोग हैं सुशांतजी। ध्वस्त करने के रास्ते कहीं और ले जाते हैं, वो कहीं और चले जाएं लेकिन वो हमें कम से कम वहां तक तो नहीं ही ले जाते जहां पहुंचने के लिए हम सब यहां, इस पेशे में आए हैं। ऐसे वक्त में मैं पीजी डिप्लोमा इन मास कॉम की पहली क्लास याद करता हूं। क्यों आए थे? यकीं मानिए, जवाब में पैसा नहीं होता है। आप खुद से सवाल करेंगे तो भी शायद यही जवाब मिले।

कहने को तो बहुत कुछ है लेकिन इस यकीं के साथ यहीं छोड़ रहा हूं कि हम असहमति के लिए जिन शब्दों का, जिन वादों का और आगे बढ़कर जिन आरोपों का इस्तेमाल करते हैं, वो अपने असर में कैसा होता है, उससे कैसी दुनिया बनती है, वो लोगों के बीच कैसा मनोविज्ञान रचते हैं, इन सब पर हमें सोचने की जरूरत है। चैनल, अखबार, रेडियो तो फिर भी कोई फन्डर खरीद ले जाएगा, बैनर-लोगो बचा ले जाएगा, लेकिन उसके भीतर आदमी के आदमी बने रहने की, पत्रकार को पत्रकार की तरह सोचने का जो विवेक है, वो हम-आप ही बचा पाएंगे। बदहवास होकर हम जिस तरह शब्दों का प्रयोग करते आए हैं, एक दिन ये शब्द वक्त के गवाह बनना बंद कर देंगे तो हमारे पास भला कौन सी पूंजी बचेगी? सुविधा-असुविधा का सवाल वक्त के साथ घुलते-मिलते रहते हैं। ज्यादा जरूरी है, बीमार होती इस मीडिया इन्डस्ट्री को संभाल पाना।

 


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