ये तीन फैक्‍टर बनाते हैं मैगजीन को सफल, बोले ‘Brunch’ के नेशनल एडिटर जमाल शेख

ये तीन फैक्‍टर बनाते हैं मैगजीन को सफल, बोले ‘Brunch’ के नेशनल एडिटर जमाल शेख

Thursday, 29 June, 2017

समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।।


पिछले कुछ वर्षों से लोगों द्वारा न्‍यूज और फीचर्स हासिल करने और उसे पढ़ने के तरीकों में काफी बदलाव आया है। आजकल लगभग सभी लोग ऑनलाइन की ओर शिफ्ट होते जा रहे हैं। ऐसे में मैगजीन की बिक्री भी तेजी से कम होती जा रही है। सिर्फ कुछ मैगजीन ही ऐसी हैं जो डॉट कॉम की आंधी से बचने में कामयाब रही हैं और जिन पर लोगों का भरोसा अभी भी बरकरार है।   


इन्‍हीं सब बातों को लेकर हमारी सहयोगी बेवसाइट एक्‍सचेंज4मीडिया (exchange4media) ने ‘हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स’ की साप्‍ताहिक मैगजीन ‘ब्रंच’ (Brunch) के नेशनल एडिटर जमाल शेख से बातचीत की। इस बातचीत में यह भी जानने की कोशिश की गई कि मार्केट में तमाम उतार-चढ़ावों के बीच किस तरह इस मैगजीन ने अपना परचम लहरा रखा है।

प्रस्‍तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश-


आज के समय में जब लोग ऑनलाइन की ओर‍ शिफ्ट हो रहे हैं तो ‘एचटी ब्रंच’ किस तरह अपने पाठकों के साथ तालमेल बिठाए हुए है ?


हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स की ब्रंच ने संडे मैगजीन के रूप में पहले ही अपनी भूमिका स्‍पष्‍ट कर रखी है। यह सकारात्‍मक मैगजीन है और इसमें आपको अच्‍छी-अच्‍छी बातें पढ़ने को मिलती हैं यानी आपको इस मैगजीन को पढ़कर खुशी मिलती है। लगभग 14 वर्षों से ब्रंच ने अपने पाठकों को बेहतरीन कंटेंट उपलब्‍ध कराया है और यह सिद्ध कर दिया है कि देश में सिर्फ यही अकेली संडे मैगजीन है जो लगातार फलफूल रही है। वीर सांघवी, सीमा गोस्‍वामी, संजॉय नारायण और राजीव मखनी जैसे देश के बेस्‍ट कॉलमिस्‍ट इसके साथ हैं।  


आज के डिजिटल युग में प्रिंट में डिजाइन कितना महत्‍वपूर्ण है ?


मैगजीन का तेवर और कलेवर अखबार से अलग होता है। मुझे अभी भी याद है कि जब मैंने अमेरिका में हार्पर बाजार मैगजीन देखी तो पता चला कि 400 पेज की मैगजीन में 50 पेज से भी कम पर लेखन सामग्री है। आप इसे पिक्‍चर्स और कैप्‍शन वाली फोटो लाइब्रेरी भी कह सकते हैं अथवा ‘विजुअल स्‍टोरीटेलिंग एट इट्स बेस्‍ट’ भी कह सकते हैं। यहां से मैंने जाना कि किसी मैगजीन में विजुअल का कितना महत्‍वपूर्ण योगदान होता है। आज के डिजिटल युग में पिक्‍चर्स अभी भी काफी अहम हैं लेकिन ‘सॉफ्ट फोकस’ और ‘परफेक्‍ट पिक्‍चर्स’ के दिन जा चुके हैं। हम यूट्यूब पर पिक्‍चर्स देखने के आदी हो चुके हैं। आज भी एक अच्‍छी पिक्‍चर वह सारी बातें कह देती है जो विडियो नहीं कह पाते। हाल ही में ब्रंच ने सिर्फ आईफोन का इस्‍तेमाल कर अभिनेता वरुण धवन का पूरा कवर शूट किया था और सोशल मीडिया पर भी यह काफी हि‍ट रहा था।


आजकल डिजिटल और सोशल मीडिया का जमाना है। ऐसे में किसी प्रिंट के लिए अपने ऑडियंस को जोड़े रखना कितना मुश्किल काम है?


यह ज्‍यादा मुश्किल नहीं है। आज भी अपने देश में सबसे मजबूत कंटेंट प्रिंट से ही आता है और फिर इसे डिजिटल पर पेश किया जाता है। आने वाले समय में आप देखेंगे कि ब्रंच की डिजिटल ऑफरिंग और मजबूत हो जाएगी। इसके अलावा जल्‍द ही आपको ब्रंच साप्‍ताहिक की जगह रोजाना देखने को मिल सकती है।   

 

ऐसे कौन से तीन आवश्‍यक फैक्‍टर्स हैं जो कंटेंट को रोचक बनाते हैं?


सबसे पहला होता है सरप्राइज फैक्‍टर, इसके बाद आता है विजुअल अपील, जो किसी भी मैगजीन में बहुत जरूरी है इसके अलावा डिलाइट यानी खुशी का फैक्‍टर होना बहुत जरूरी है। यदि संडे की मैगजीन आपको प्रसन्‍न नहीं कर पाती है तो उसका कोई फायदा नहीं है।  


ब्रंच के नेशनल एडिटर के रूप में आपका अब तक का सफर कैसा रहा?


सच कहूं तो जब मैंने ‘हिन्‍दुस्‍तान’ जॉइन किया था तो मुझे ‘ब्रंच’ की लोकप्रियता का पता तो था लेकिन यह नहीं जानता था कि हर हफ्ते ब्रंच की एक मिलियन से ज्‍यादा कॉपियां छपती हैं और इसकी रीडरशिप चार मिलियन है। ब्रंच की तुलना में अन्‍य मैगजीन इससे पीछे हैं और यह देश में सबसे ज्‍यादा बिकने और पढ़ी जाने वाली मैगजीन है। रविवार को मुझे सोशल मीडिया पर पूरे दिन प्रतिक्रियाएं मिलती हैं हालांकि मैं इन्‍हें सिर्फ सुबह दो घंटे और शाम को दो घंटे में देखने की कोशिश करता है, लेकिन अधिकतर ऐसा हो नहीं पाता है। जब मैं ‘टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ में काम करता था और उन दिनों सोशल मीडिया नहीं था, यहां तक कि ईमेल का प्रचलन भी इतना नहीं था। तब इस तरह की प्रतिक्रियाएं कुछ दिनों बाद आती थीं। लेकिन ब्रंच को लेकर आने वाली प्रतिक्रियाएं हर रविवार को सुनामी की तरह आती हैं और तब इसकी पॉवर व लोकप्रियता का पता चलता है।   

 

प्रतिस्‍पर्द्धा का सामना आप किस प्रकार करते हैं, क्‍या आप इसके लिए कोई खास स्‍ट्रेटजी अपनाते हैं?


ब्रंच के एक उत्‍साही प्रशंसक ने हाल ही में कुछ इश्तिहार बनाकर उन्‍हें सोशल मीडिया पर डाल दिया था। इसमें उसने ब्रंच के कवर पेज को जिसमें गर्भवती करीना कपूर को दिखाया था और इसके बाद ‘ग्रेजिया’ मैगजीन का कवर पेज, जिसमें भी करीना को गर्भवती दिखाया था, पोस्‍ट करते हुए कैप्‍शन लिखा था कि ‘ब्रंच ने यह काम सबसे पहले किया’। यही काम उसने 'रोशन ऐंड संस' के मामले में ‘हेलो’ मैगजीन के साथ किया था। इससे पता चलता है कि लोग ब्रंच को कितना पसंद करते हैं और उसकी कितनी क्रेडिबिलिटी है।     

 

प्रिंट मीडिया के भविष्‍य के बारे में आपका क्‍या कहना है?


प्रिंट हमेशा चलता रहेगा। लोगों का पेपर पर पढ़ने का आकर्षण बना रहेगा। लेकिन इसके साथ ही वीडियोलिंक्स इत्यादि के साथ भी अन्‍य सामग्री भी पाठकों को डिजिटल रूप से उपलब्ध कराई जानी चाहिए। पाठकों को भी अच्‍छे कंटेंट के लिए भुगतान शुरू करने की जरूरत है। यही एकमात्र तरीका है जिससे इसे प्राप्‍त करना जारी रखेंगे।



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