जब वरिष्ठ पत्रकार अभिरंजन से उलझ बैठे साहित्यकार गिरिराज किशोर...

जब वरिष्ठ पत्रकार अभिरंजन से उलझ बैठे साहित्यकार गिरिराज किशोर...

Tuesday, 16 January, 2018

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।


इसे शब्दों से खेलने की बाजीगरी कहें, या शब्दों को लेकर खुद पर दृढ़ विश्वास, जब फेसबुक पर दो धुरंधर एक शब्द को लेकर आपस में ही उलझ गए। दरअसल ये दोनों ही धुरंधर अपने-अपने क्षेत्र के महारथी हैं, जिनमें पहला नाम है  टीवी पत्रकार अभिरंजन कुमार का और दूसरा नाम वरिष्ठ साहित्यकार गिरिराज किशोर का। और यह शब्द है संघी, जिसे पढ़ते-सुनते ही मन में कई तरह के विचार उमड़ जाते हैं।


दरअसल हुआ यूं कि वरिष्ठ टीवी पत्रकार अभिरंजन कुमार ने चार क्रांतिकारी जजों को लेकर फेसबुक पर एक पोस्ट लिखी, जिसे लेकर उनके फेसबुक फ्रैंड श्रीनिवासन चौधरी ने उनकी सोच पर कमेंट किया। उन्होंने लिखा, "आपकी सोच पकिया संघी हो गया है।"


लेकिन जब अभिरंजन ने इसी कमेंट को लेकर एक पोस्ट लिखी तो कई लोगों ने अपनी प्रतिक्रियाएं दीं, जिनमें से वरिष्ठ साहित्यकार गिरिराज किशोर का नाम भी शामिल था, लेकिन शायद उन्हें पत्रकार द्वारा की गई ये पोस्ट पसंद नहीं आई, लिहाजा उन्होंने भी एक कमेंट कर दिया। पहले यहां जान लीजिए कि टीवी पत्रकार अभिरंजन कुमार ने अपनी पोस्ट में लिखा क्या था।


अभिरंजन कुमार ने लिखा, मेरे प्रति ऐसा प्यार बरतने वाले शिवाशीष चौधरी जी अकेले नहीं हैं। इसलिए उन्हें दिया जवाब सभी मित्रों से साझा कर रहा हूं- "परम आदरणीय श्री शिवाशीष चौधरी जी। अगर कांग्रेस की पोल खोलना संघी होना है, तो आप मुझे बेहिचक संघी कहें। वैसे, अगर कांग्रेसी होना बुरा नहीं है, तो संघी होना इस देश में कब और क्यों बुरा हो गया? जब धत्कर्मों की लिस्ट बनाएंगे, तो कांग्रेसियों के नाम अधिक धत्कर्म आएंगे या संघियों के नाम? आशा है, निरपेक्ष चिंतन करेंगे। यूं, भारत एक संघीय गणराज्य है और एक भारतीय होने के नाते मैं हमेशा से संघी था, संघी हूं और संघी रहूंगा। शुक्रिया।


हालांकि उनके इसी पोस्ट को लेकर साहित्यकार गिरिराज किशोर ने कमेंट करते हुए लिखा, ‘संघी तो जन्मजात संघी होता है... इसमें क्या छिपाना।इसके जवाब में टीवी पत्रकार ने लिखा आदरणीय Giriraj Kishore जी। सही कहा आपने। हम सब जन्मजात भारतीय हैं, इसलिए हम सब जन्मजात संघी हैं। हम भी। आप भी। इसे क्यों छिपाते हैं हम? मार्क्स, लेनिन और चाओ-माओ की संतानें तो नहीं छिपातीं अपनी पहचान। फिर हम-आप ही क्यों छिपाते फिरें इसे? सादर    


फिर क्या था उनका यह जवाब देखकर साहित्यकार गिरिराज किशोर बिफर पड़े और लिख दिया कि मैं स्पष्ट कर दूं कि मैं न जन संघी हूं, मैं मानव संग हूं। फिर शुरू हुई शब्दों की बाजीगरी, क्योंकि यहां सवाल नहीं थे, लेकिन जवाबों की बौछार तेजी से शुरू हो चुकी थी। लिहाजा टीवी पत्रकार ने भी उनके इस कमेंट पर एक और जवाब दाग दिया, आदरणीय Giriraj Kishore जी। यहां तो "संघी" होने की बात चल रही थी। "जनसंघी" कहां से आ गया? कृपया स्पष्ट करें कि आप "संघी" नहीं हैं? मैं तो "संघी" हूं। पकिया "संघी" हूं। वजह मैंने बताई है अपने पोस्ट में। शुक्रिया। हालांकि यह जवाब सुनकर गिरिराज किशोर और उत्तेजित हो गए और उन्होंने लिखा, ‘संघी शब्द जनसंघियों को रेखांकित करता है, मैं मानव संग हूं यह मैंने स्पष्ट कर दिया। आपको आपत्ति...। बस, इस रीकमेंट के बाद जवाबों पर जवाबों का सिलसिला कुछ ऐसा शुरू हुआ कि कई घंटों बाद जाकर थमा।   


यहां आप भी पढ़िेेए संघीशब्द को लेकर पूरा वाद-विवाद... 

  

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