मीडिया को न्याय के लिए आवाज बुलंद करनी चाहिए
डॉ. वैदिक के मीडिया के बारे में निराशावादी कथन के बाद, अगले दिन मिड-डे के वरिष्ठ पत्रकार, ज्योतिर्मय डे की हत्या दिन के उजाले में कर दी गई, हजारों लोग इस हत्या के विरूद्ध में सड़कों पर उतर आए। माननीय वैदिक के कमेंट्स के तत्काल बाद मैंने महसूस किया कि मीडिया के लोगों के बीच में ही प्रकल्पित विश्वसनीयता का अभाव है। हम क्या कर सकते हैं इस पर हमें विश्वास नहीं है और इसके अलावा, हमें अपनी शक्ति का भी एहसास नहीं है। मैं मानता हूं कि मीडिया में बहुत सारे निहित स्वार्थी तत्व घुस आए हैं लेकिन हमें यह भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि कई सारे ऐसे लोग हैं जिनके लिए पत्रकारिता जीवन और मृत्यु की तरह है। ज्योतिर्मय डे उन्हीं में से एक थे। जेसिका लाल, नीतिश कटारा और रुचिका गिरोत्रा का केस बहादुरी और भावपूर्ण पत्रकारिता का उदाहरण है, हर तरह के राजनीतिक दबाव को देखते हुए मीडिया ने साहसिक कार्य किए हैं।
- 17/05/2012
वर्तिका नंदा, मीडिया विश्लेषक.
तस्वीरें काफी तेजी से बदलती हैं। जुलाई 2007 में को मीडिया की सुर्खियां प्रतिभा सिंह पाटिल थीं - देश की पहली महिला राष्ट्रपति, सौम्य, सजग, संवेदनशील वगैरह। उनके लिए वे तमाम विश्लेषण इस्तेमाल किए गए जो किसी की गरिमा को चार चांद लगा सकें।
- 14/05/2012
एनके सिंह, ग्रुप एडिटर, साधना न्यूज
सम्प्रेषण के मूल सिद्धान्तों में जो एक सबसे महत्वपूर्ण सिद्धान्त है वह यह कि सम्प्रेषण तभी कारगर होता है जब लक्षित सामाजिक समूह की चेतना के साथ तादात्म्य बना सकें। अगर संदेश के लिए गलत माध्यम चुना गया या उसकी विषय-वस्तु उसे समाज-समूह की समझ से परे रहा तब संदेश संप्रेषण बेमानी हो जाता है। सरकार की क्षेत्रीय चैनलों को लेकर नई नीति इस दिशा में एक सार्थक प्रयास है। इस नई नीति के तहत भारत सरकार न केवल क्षेत्रीय चैनलों के माध्यम से अपने कार्यक्रमों का विज्ञापन करेगी बल्कि इन चैनलों के रिपोर्टरों को अपने कार्यक्रमों के बारे में बताते हुए इन कार्यक्रमों की मॉनिटरिंग के प्रति भी रुझान पैदा करेगी - 10/05/2012
संजय द्विवेदी, प्रोफेसर, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय
हिंदुस्तान में रहते हुए हम किसी भी इलाके में जाएं उर्दू हमारा साथ नहीं छोड़ती। वह हिंदी की ही तरह राष्ट्रभाषा है, जिसकी जमीन बहुत व्यापक और जड़ें बहुत गहरी हैं। पाकिस्तान के निर्माण ने उर्दू की इस रफ्तार को रोक दिया। उर्दू एक खास तबके की भाषा बनकर रह गयी। वह हिंदुस्तानी जबान से एक कौम की जबान बन गयी या बना दी गयी। ऐसे समय में उर्दू सहाफत (पत्रकारिता) पर बात करना सच में अतीत के उन सुनहरे पन्नों को टटोलने की कोशिश है
- 07/05/2012वर्तिका नन्दावरिष्ठ मीडिया विश्लेषकआमिर के बहाने ही सही, शायद सच को इस बार जीतने में मदद मिल जाए। बरसों पहले रामायण और महाभारत वाले सुबह के स्लाट पर आमिर ने सामाजिक सरोकारों पर कुछ नया करने की कोशिश की। मुबारक आमिर,मुबारक उदय शंकर, मुबारक स्टार।
- 30/04/2012
आनंद प्रधान, एसोसिएट प्रोफेसर, आईआईएमसी
बाबाओं का साम्राज्य सिर्फ धार्मिक चैनलों तक सीमित नहीं है. मनोरंजन चैनलों से लेकर न्यूज चैनलों तक पर भी सुबह की कल्पना उनके बिना संभव नहीं है. इन बाबाओं/बापूओं/स्वामियों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि धर्म और ईश्वर भक्ति से उनका बहुत कम लेना-देना है.


