मीडिया को न्याय के लिए आवाज बुलंद करनी चाहिए

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अनुराग बत्रा, चेयरमैन एंड एडिटर-इन-चीफ, एक्सचेंज4मीडिया समूह
हेनरी अनातोले ग्रूनवाल्ड के अनुसार, पत्रकारिता कभी चुप नहीं रह सकती। यह इसकी सबसे बड़ी खूबी और सबसे बड़ी खामी है। जब आश्चर्यजनक कारनामों को अंजाम दिया जा रहा हो, विजय का उद्घोष और आतंक के लक्षण हवा में ही हो, इसे जरूर और तुरंत अपनी आवाज उठानी चाहिए, जबकि आश्चर्य की गूंज हवा में ही हो।
 
दो सप्ताह पहले की बात है जब मुझे सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी के द्वारा प्रमुख प्रिन्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया घरानों के पत्रकारों के लिए एक समारोह में बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था। अनुभवी संपादक, राजनीतिक विश्लेषक और कार्यकर्ता डॉ. वेदप्रताप वैदिक के साथ मुझे भी इस समारोह में आमंत्रित किया गया था। हम दोनों से, बदलते और चुनौतीपूर्ण समय में मीडिया, मीडिया की नीति और भूमिका पर बोलने को कहा गया था। वेद प्रताप वैदिक ने समारोह में यह कहा कि मीडिया के साथ जिस तरह से छेड़-छाड़ हो रही है और कभी-कभी व्यावसायिक हितों को ज्यादा तरजीह दी जाती है ऐसे अवसर पर उन्हें कभी-कभी इस बात पर शर्मिंदगी महसूस होती है कि वे भी एक पत्रकार हैं।
 

डॉ. वैदिक के मीडिया के बारे में निराशावादी कथन के बाद, अगले दिन मिड-डे के वरिष्ठ पत्रकार, ज्योतिर्मय डे की हत्या दिन के उजाले में कर दी गई, हजारों लोग इस हत्या के विरूद्ध में सड़कों पर उतर आए। माननीय वैदिक के कमेंट्स के तत्काल बाद मैंने महसूस किया कि मीडिया के लोगों के बीच में ही प्रकल्पित विश्वसनीयता का अभाव है। हम क्या कर सकते हैं इस पर हमें विश्वास नहीं है और इसके अलावा, हमें अपनी शक्ति का भी एहसास नहीं है। मैं मानता हूं कि मीडिया में बहुत सारे निहित स्वार्थी तत्व घुस आए हैं लेकिन हमें यह भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि कई सारे ऐसे लोग हैं जिनके लिए पत्रकारिता जीवन और मृत्यु की तरह है। ज्योतिर्मय डे उन्हीं में से एक थे। जेसिका लाल, नीतिश कटारा और रुचिका गिरोत्रा का केस बहादुरी और भावपूर्ण पत्रकारिता का उदाहरण है, हर तरह के राजनीतिक दबाव को देखते हुए मीडिया ने साहसिक कार्य किए हैं।

मैं, ज्योतिर्मय डे को ‘मीडिया शहीद’ कहूंगा। उनकी मृत्यु ने एक बार फिर से साबित कर दिया है कि अभी भी इस पेशे में विश्वसनीयता और नैतिकता बाकी है। और पत्रकारिता के क्षेत्र में कई सारे जेहादी और शहीद होने वाले व्यक्ति हैं जो सत्य को आम-आदमी के सामने लाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। लेकिन जैसा कि ग्रूनवाल्ड के कथन को ऊपर में उद्धृत किया गया है कि पत्रकारिता अत्यधिक लालच से घिरा है जो इसकी सबसे बड़ी कमी है। विशेषकर, भारत जैसे देश में अगर कोई बोलता है तो उसे अपने जान की कीमत देनी पड़ती है।
 
अल्बर्ट श्वेइत्जर का यह कथन, डे की शहादत पर बिल्कुल सही बैठता है, प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में ऐसा क्षण आता है जब हमारे अंदर की आग बाहर आ जाती है। कहने का मतलब कि हम एकदम से फूट पड़ते हैं। यह किसी अन्य व्यक्ति के मरने के बाद ज्वाला की तरह फूट कर बाहर आ जाता है। हमें उन व्यक्तियों का धन्यवाद देना चाहिए जिनकी वजह से हमारे भीतर की भावना जागृत होती है।
 
भारत में राजनीतिज्ञों, व्यापारिक घरानों और अपराधियों के द्वारा मीडिया को मोहरे की तरह इस्तेमाल किया जाता है और महाराष्ट्र सरकार के द्वारा सीबीआई जांच से इंकार इस तथ्य की पुष्टि करता है। यह सुनने में हास्यास्पद लगता है कि मंत्रीगण ऐसे कानून को बनाने से भय खाते हैं जिससे उन पत्रकारों की रक्षा हो जो उनकी छवि और कॅरियर को प्रभावित करते हैं।
राजनीतिज्ञ पत्रकारों की जीविका को नियंत्रित करना चाहते हैं, उनकी सैलरी को नियंत्रित करना चाहते हैं, जैसा कि पत्रकारों के लिए गठित वेतन बोर्ड के द्वारा अनुशंसित वेतन इस दिशा में एक प्रतिगामी कदम लग रहा है, मेरा मानना है कि यही समय है जब मीडिया को इसके खिलाफ आवाज बुलंद करनी चाहिए।
 
हमेशा की तरह मीडिया को टॉप पर और सिविल सोसाइटी से आगे रहना चाहिए और शासन का एक उपकरण होना चाहिए। भारतीय मीडिया को ‘खुद की सुरक्षा’, ‘स्वयं के हित के लिए’ और ‘अपने भविष्य के लिए’ एवं जिसके लिए वो हमेशा से आवाज उठाता रहता है अपनी आवाज को बुलंद करना चाहिए। जैसा कि हमेशा से होता रहा है ज्योतिर्मय डे की हत्या से संबंधित फाइल आने वाले कई वर्षों तक धूल चाटती रहेगी। अगर मीडिया को अपने भविष्य की चिंता है तो इसे डे के केस में उसी तरह अपनी लड़ाई को जारी रखनी होगी जिस तरह से जेसिका लाल के हत्यारों को कानून के शिकंजे में लाने के लिए किया था। अपराधियों को दंड मिलना चाहिए और यह मीडिया का दायित्व है कि यह खुद के केस को किसी पुलिस स्टेशन के किसी कॉर्नर में पड़ा रहने दे। मैं ‘मुंबई प्रेस क्लब’ की भूमिका की भूरि-भूरि प्रशंसा करता हूं जिसने ज्योतिर्मय डे के हत्यारों को पकड़ने और पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के लिए संघर्ष जारी रखा है और मैं आशा करता हूं कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृति नहीं होगी और उसे रोका जा सकेगा।
 
मेरी सबसे बड़ी चिंता इन समर्पित पत्रकारों के परिवारों के बारे में है जिनकी असामयिक मृत्यु हो जाती है। मीडिया, जहां अन्य इंडस्ट्री की अपेक्षा पहले से ही काफी कम वेतन मिलता है। ऐसे में उन परिवारों को शायद ही कोई वित्तीय सुरक्षा प्रदान की जाती है। इन परिवारों के भविष्य पर एक प्रश्नचिन्ह लग जाता है। मेरा सपना है कि एक ऐसे फंड की व्यवस्था करूं जिससे इस इंडस्ट्री के लोगों को लाभ मिल सके। ऐसा फंड जिससे उन शहीदों के परिवारों को पुरस्कृत किया जाये और उन्हें सहायता दी जाये जो अपने जीवन को ईमानदार पत्रकारिता के पेशे के लिए कुर्बान कर देते हैं।
 
अतीत में, हमने इस तरह के कार्यों के लिए समूह के स्तर पर फंड एकत्र किया है लेकिन मुझे लगता है कि मीडिया के शहीदों के लिए संपूर्ण इंडस्ट्री को एक साथ होकर संस्थागत रूप से एक कोष का निर्माण करना चाहिए। यही समय है जब इंडस्ट्री को एक साथ आकर अपने लोगों का समर्थन करना चाहिए। मुझे खुशी होगी जब अधिक से अधिक लोग एक साथ आयेंगे और इस कार्य में अपना योगदान देंगे। एक ऐसा कारण जिससे इस पेशे के प्रति सम्मान बढ़े जो अपने लोगों के बीच में ही इसने खो दिया है।
 
उदारता की कीमत हमें तभी पता चलती है जब हमें दूसरों के द्वारा उतना समर्थन नहीं मिलता है। मैं आशा करता हूं कि एक इंडस्ट्री और प्रोफेशनल के नाते हम अपने मीडिया हीरो’’ज के प्रति उदासीन नहीं है।
 
  • 17/05/2012

    वर्तिका नंदा, मीडिया विश्लेषक.
    तस्वीरें काफी तेजी से बदलती हैं। जुलाई 2007 में को मीडिया की सुर्खियां प्रतिभा सिंह पाटिल थीं - देश की पहली महिला राष्ट्रपति, सौम्य, सजग, संवेदनशील वगैरह। उनके लिए वे तमाम विश्लेषण इस्तेमाल किए गए जो किसी की गरिमा को चार चांद लगा सकें।
     

  • 14/05/2012

    एनके सिंह, ग्रुप एडिटर, साधना न्यूज

    सम्प्रेषण के मूल सिद्धान्तों में जो एक सबसे महत्वपूर्ण सिद्धान्त है वह यह कि सम्प्रेषण तभी कारगर होता है जब लक्षित सामाजिक समूह की चेतना के साथ तादात्म्य बना सकें। अगर संदेश के लिए गलत माध्यम चुना गया या उसकी विषय-वस्तु उसे समाज-समूह की समझ से परे रहा तब संदेश संप्रेषण बेमानी हो जाता है। सरकार की क्षेत्रीय चैनलों को लेकर नई नीति इस दिशा में एक सार्थक प्रयास है। इस नई नीति के तहत भारत सरकार न केवल क्षेत्रीय चैनलों के माध्यम से अपने कार्यक्रमों का विज्ञापन करेगी बल्कि इन चैनलों के रिपोर्टरों को अपने कार्यक्रमों के बारे में बताते हुए इन कार्यक्रमों की मॉनिटरिंग के प्रति भी रुझान पैदा करेगी
  • 10/05/2012

    संजय द्विवेदी, प्रोफेसर, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय

    हिंदुस्तान में रहते हुए हम किसी भी इलाके में जाएं उर्दू हमारा साथ नहीं छोड़ती। वह हिंदी की ही तरह राष्ट्रभाषा है, जिसकी जमीन बहुत व्यापक और जड़ें बहुत गहरी हैं। पाकिस्तान के निर्माण ने उर्दू की इस रफ्तार को रोक दिया। उर्दू एक खास तबके की भाषा बनकर रह गयी। वह हिंदुस्तानी जबान से एक कौम की जबान बन गयी या बना दी गयी। ऐसे समय में उर्दू सहाफत (पत्रकारिता) पर बात करना सच में अतीत के उन सुनहरे पन्नों को टटोलने की कोशिश है

  • 07/05/2012
    वर्तिका नन्दा
    वरिष्ठ मीडिया विश्लेषक
    आमिर के बहाने ही सही, शायद सच को इस बार जीतने में मदद मिल जाए। बरसों पहले रामायण और महाभारत वाले सुबह के स्लाट पर आमिर ने सामाजिक सरोकारों पर कुछ नया करने की कोशिश की। मुबारक आमिर,मुबारक उदय शंकर, मुबारक स्टार।
  • 30/04/2012

    आनंद प्रधान, एसोसिएट प्रोफेसर, आईआईएमसी
    बाबाओं का साम्राज्य सिर्फ धार्मिक चैनलों तक सीमित नहीं है. मनोरंजन चैनलों से लेकर न्यूज चैनलों तक पर भी सुबह की कल्पना उनके बिना संभव नहीं है. इन बाबाओं/बापूओं/स्वामियों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि धर्म और ईश्वर भक्ति से उनका बहुत कम लेना-देना है.