हर त्योहार पर एक बार रोता ज़रूर हूं: शशि शेखर, वरिष्ठ पत्रकार हर त्योहार पर एक बार रोता ज़रूर हूं: शशि शेखर, वरिष्ठ पत्रकार

हर त्योहार पर एक बार रोता ज़रूर हूं: शशि शेखर, वरिष्ठ पत्रकार

Wednesday, 18 October, 2017

शशि शेखर

एडिटर-इन-चीफ, हिन्दुस्तान ।।

हर त्योहार पर सालते कुछ सवाल

हर त्योहार पर एक बार रोता ज़रूर हूं। घर वाले कहते हैं कि मैं ख़ुश रहना नहीं जानता या ख़ुश रहना नहीं चाहता। हरबार दूसरों की दिक़्क़तें अपनी आत्मा पर ले लेता हूं। हरेक का संकट हर लेने की ताक़त विधाता ने मुझे बख़्शी नहीं है पर करूं क्या?

इस सवाल का जवाब मेरे पास नहीं है। तीन-चार साल पहले छोटी होली के दिन कहीं बाहर से लौट रहा था। हवाई अड्डे से घर के रास्ते में नए नवेले लीला पैलेस होटेल की भव्यता के साये में देखता हूं कि धूल से लथपथ एक जवान औरत अपने किशोर होते बालक के साथ घर की ओर लौट रही है। चारों ओर चिचियाते, शोर मचाते क़िस्म-क़िस्म के वाहन। गोधुलि बेला पर सवार अंधियारे को चीरती बत्तियां। शोर, रोशनियां, हड़बड़ी, अपेक्षा और उपेक्षा- महानगर का चमकीला नर्क हर तरफ़ प्रस्तुत था। ऐसे में वे मां-बेटे यथासंभव तेज़ी से क़दम बढ़ाते हुए। उन्हें कहां जाना था, वे कहां जाएंगे? वे घर जा रहे हैं तो क्या यह महिला अभी चूल्हा गरम करेगी? क्या पेट भरने लायक पैसे हैं उसके पास? उनकी होली कैसी होगी? होगी भी या नहीं?

सवालों की यह भंवरनुमा शाश्वत विशेषता है की आप उनसे जितना जूझिए वे आपको गहरा धंसाते जाएंगे। तब तक, जब तक आप बेदम न पड़ जायें। उस दिन भी ऐसा हुआ था, आज भी वैसा ही हो रहा है। आप सोच रहें हैं होंगे कि हुआ क्या?

सुनिए। सुबह दफ़्तर जाने से पहले सोचा कि क्यों न ATM से कुछ धन निकाल लूं। थोड़ा आगे बढ़ते ही देखता हूं कि एक रिक्शे वाला यथासंभव सजधज के साथ अपने रिक्शे पर बैठा है। उसके चेहरे पर उकताहट भरा इंतज़ार पसरा था। क्या वह सवारियों की प्रतीक्षा में अघा रहा है? घर से काम पर तो वह वैसे ही तैयार होकर निकला, जैसे की मैं पर इतना फ़र्क़? हालात का अंतर कुछ भी हो पर मनखते तो एक सी ही होंगी। हम मध्यवर्गीयों और आर्थिक तौर पर कमज़ोर लोगों में 1970 के दशक तक इतना वैषम्य नहीं था पर अब हालात बदल गए हैं।

1991 के बाद पनपे भारत ने ग़रीब-अमीर के आदिम अलगाव में कुछ नए पर निराशाजनक अध्याय जोड़े हैं। काश, खोखले सपनों में बसर करने वाले सवाल करना सीख सकते! मेरे तमाम प्रश्नों का उत्तर उनमें छिपा है।

#रंगीली होली #बेदम दिवाली

(साभार: फेसबुक वॉल से)


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