'पत्रकारिता तानाशाही के पंजे में कैद होने वाली है'

'पत्रकारिता तानाशाही के पंजे में कैद होने वाली है'

Tuesday, 24 October, 2017

प्रवीण साहनी

एग्जिक्यूटिव एडिटर, समाचार प्लस ।।

भारत में दुनिया की सबसे बड़ी लोकशाही है लेकिन भारत के एक गौरवशाली प्रांत राजस्थान में राजशाही प्रत्यक्ष अपना प्रमाण दे रही है। मरुधरा की महारानी अपराध का लाइसेंस बांटने जा रही हैं और चालीस चोर चिंता छोड़ जश्न की तैयारी में जुटे हैं। रानी सा के राज में अब चोरी होगी, फिर सीनाजोरी होगी और कानो-कान खबर हुई तो खबरिया को हथकड़ी होगी।

आने वाले दिनों में राजस्थान में आपातकाल जैसी स्थिति होने वाली है, पत्रकारिता तानाशाही के पंजे में कैद होने वाली है। सियासत की सबसे बड़ी महारानी ने दब्बू दरबारियों के सामने काला कानून रख दिया है। जज, मजिस्ट्रेट और लोकसेवक अब लाइसेंसी भ्रष्टाचारी होंगे... और पत्रकारिता की लाचारी ऐसी, किसी नामुराद का नाम लेना भी महारानी की शान में गुस्ताखी होगी। वैसे राजस्थान में पहले से मीडिया विरोधी महारानी पत्रिकाऔर समाचार प्लस राजस्थानजैसे मीडिया समूहों को दरबारी पत्रकारिता न करने के गुनाह में सजा सुना चुकी हैं। दोनों मीडिया समूहों के लिए सरकारने सरकारी विज्ञापन पर रोक लगा दी थी। इससे ये साबित होता है कि महारानी का एक ही चेहरा हैनिरंकुश और आजाद आवाज की दुश्मन।

दशकों के सियासी सफर के बावजूद वसुंधरा राजे आज भी जनसेवक नहीं महारानी ही हैं, आज भी वो तुगलकी फरमान सुनाती हैं। महारानी आपके कानून से हो सकता है कि आमजन भ्रष्ट बाबुओं का नाम न जान पाए, उनकी पहचान न हो पाए... लेकिन पहले से ज्यादा कुछ बदलने वाला नहीं! इस कानून के पहले नाम भी उजागर हुए और काम भी, लेकिन राजशाही की कृपा से अंजाम तक पहले भी कोई नहीं पहुंचा। बस एक फायदा बढ़ गया, अब चोर भी शाह की पगड़ी पहनेगा क्योंकि सामाजिक प्रतिष्ठा पर दाग लगने का खतरा भी खत्म हो जाएगा। वैसे महारानी आप इंदिरा गांधी को जरूर याद कर लीजिए... किसी का अंजाम कुछ भी हो लेकिन तानाशाही का अंजाम बस वही होता है। लोग कहते हैं कि बढ़ती उम्र के साथ विनम्रता बढ़ती है लेकिन आप के साथ उल्टा है। पत्रकारिता में आज भी गणेश शंकर विद्यार्थी की कलम के वाहक मौजूद हैं, अब दिल से सोचिए अंग्रेजों से भी ज्यादा क्रूरता संभव है क्या?

आज एक लेख मैंने पत्रिकाके सम्पादक कोठारी जी का पढ़ा, मैं उनकी बात से पूरी तरह सहमत हूं। कोठारी जी आप जैसे पत्रकार नई पीढ़ी के लिए उदाहरण भी हैं, जब सत्ता के भय अथवा लाभ से कुछ पत्रकार दरबारी हो जाते हैं। चलते-चलते राजशाही के लिए शुभकामनाएं गेट वेल सून

(साभार: फेसबुक वाल से)



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