जानना चाहते हैं किसकी साज़िश का नतीजा था देश का बंटवारा, तो पढ़िए ये पोस्ट...

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Wednesday, 16 May, 2018

1912 में एडविन लुटियन की दिल्ली यात्रा के बाद शहर के निर्माण का काम शुरू हो जाना था लेकिन विश्वयुद्ध शुरू हो गया और ब्रिटेन उसमें बुरी तरह उलझ गया इसलिए नई दिल्ली प्रोजेक्ट पर काम पहले विश्वयुद्ध के बाद शुरू हुआ। यह अजीब इत्तेफाक है कि भारत की आजादी की लड़ाई जब अपने उरूज़ पर थी तो अंग्रेज भारत की राजधानी के लिए नया शहर बनाने में लगे हुए थे।अपने फेसबुक पोस्ट के जरिए ये कहा वरिष्ठ पत्रकार शेष नारायण सिंह ने। उनका पूरा पोस्ट आप यहां पढ़ सकते हैं-

चर्चिल और जिन्नाह की साज़िश का नतीजा था देश का बंटवारा

भारत का बंटवारा एक बहुत बड़ा धोखा था, जो कई स्तरों पर खेला गया था। अंग्रेज भारत को आजाद किसी कीमत पर नहीं करना चाहते थे लेकिन उनके प्रधानमंत्री विन्स्टन चर्चिल को सन बयालीस के बाद जब अंदाजा लग गया कि अब महात्मा गांधी की आंधी के सामने टिक पाना नामुमकिन है तो उसने देश के टुकड़े करने की योजना पर काम करना शुरू कर दिया। जिन्नाह अंग्रेजों के वफादार थे ही, चर्चिल ने देसी राजाओं को भी हवा देना शुरू कर दिया था। उसको उम्मीद थी कि राजा लोग कांग्रेस के अधीन भारत में शामिल नहीं होंगें। पाकिस्तान तो उसने बनवा लिया लेकिन राजाओं को सरदार पटेल ने भारत में शामिल होने के लिए राजी कर लिया। जो नहीं राजी हो रहे थे उनको नई हुकूमत की ताकत दिखा दी। हैदराबाद का निजाम और जूनागढ़ का नवाब कुछ पाकिस्तानी मुहब्बत में नजर आये तो उनको सरदार पटेल की राजनीतिक अधिकारिता के दायरे में ले लिया गया और कश्मीर का राजा शरारत की बात सोच रहा था तो उसको भारत की मदद की जरूरत तब पड़ी जब पाकिस्तान की तरफ से कबायली हमला हुआ। हमले के बाद राजा डर गया और सरदार ने उसकी मदद करने से इनकार कर दिया। जब राजा ने भारत के साथ विलय के दस्तावेज पर दस्तखत कर दिया तो पाकिस्तानी फौज और कबायली हमले को भारत की सेना ने वापस भगा दिया। लेकिन यह सब देश के बंटवारे के बाद हुआ।

1945 में तो चर्चिल ने इसे एक ऐसी योजना के रूप में सोचा होगा, जिसके बाद भारत के टुकड़े होने से कोई रोक नहीं सकता था। चर्चिल का सपना था कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जिस तरह से यूरोप के देशों का विजयी देशों ने यूरोप के देशों में प्रभाव क्षेत्र का बंदरबांट किया था, उसी तरह से भारत में भी कर लिया जाएगा। अंग्रेजों ने भारत को कभी भी अपने से अलग करने की बात सोची ही नहीं थी। उन्होंने तो दिल्ली में एक खूबसूरत राजधानी बना ली थी। प्रोजेक्ट नई दिल्ली 1911 में शुरू हुआ था और महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन और सिविल नाफ़रमानी आंदोलन की सफलता के बावजूद भी नई इंपीरियल कैपिटल में ब्रिटिश हुक्मरान पूरे ताम झाम से आकर बस गए थे। 10 फरवरी 1931 के दिन नई दिल्ली को औपचारिक रूप से ब्रिटिश भारत की राजधानी बनाया गया। उस वक़्त के वायसराय लार्ड इरविन ने नई दिल्ली शहर का विधिवत उद्घाटन किया। 1911 में जार्ज पंचम के राज के दौरान दिल्ली में दरबार हुआ और तय हुआ कि राजधानी दिल्ली में बनायी जायेगी। उसी फैसले को कार्यरूप देने के लिए रायसीना की पहाड़ियों पर नए शहर को बसाने का फैसला हुआ और नई दिल्ली एक शहर के रूप में विकसित हुआ। इस शहर की डिजायन में एडविन लुटियन का बहुत योगदान है।

1912 में एडविन लुटियन की दिल्ली यात्रा के बाद शहर के निर्माण का काम शुरू हो जाना था लेकिन विश्वयुद्ध शुरू हो गया और ब्रिटेन उसमें बुरी तरह उलझ गया इसलिए नई दिल्ली प्रोजेक्ट पर काम पहले विश्वयुद्ध के बाद शुरू हुआ। यह अजीब इत्तेफाक है कि भारत की आजादी की लड़ाई जब अपने उरूज़ पर थी तो अंग्रेज भारत की राजधानी के लिए नया शहर बनाने में लगे हुए थे। पहले विश्वयुद्ध के बाद ही महात्मा गांधी ने कांग्रेस और आजादी की लड़ाई का नेतृत्व संभाला और उसी के साथ साथ अंग्रेजों ने राजधानी के शहर का निर्माण शुरू कर दिया। 1931 में जब नई दिल्ली का उद्घाटन हुआ तो महात्मा गांधी देश के सर्वोच्च नेता थे और पूरी दुनिया के राजनीतिक चिन्तक बहुत ही उत्सुकता से देख रहे थे कि अहिंसा का इस्तेमाल राजनीतिक संघर्ष के हथियार के रूप में किस तरह से किया जा रहा है।

1920 के महात्मा गांधी के आंदोलन की सफलता और उसे मिले हिन्दू-मुसलमानों के एकजुट समर्थन के बाद ब्रिटिश साम्राज्य के लोग घबड़ा गए थे। उन्होंने हिन्दू मुस्लिम एकता को तोड़ने के लिए सारे इंतजाम करना शुरू कर दिया था। हिन्दू महासभा के नेता वी.डी. सावरकर को माफी देकर उन्हें किसी ऐसे संगठन की स्थापना का ज़िम्मा दे दिया था जो हिन्दुओं और मुसलमानों में फर्क डाल सके। उन्होंने अपना काम बखूबी निभाया। उनकी नई किताब हिंदुत्वइस मिशन में बहुत काम आई। 1920 के आंदोलन में दरकिनार होने के बाद कांग्रेस की राजनीति में निष्क्रिय हो चुके मुहम्मद अली जिन्ना को अंग्रेजों ने सक्रिय किया और उनसे मुसलमानों के लिए अलग देश मांगने की राजनीति पर काम करने को कहा। देश का राजनीतिक माहौल इतना गर्म हो गया कि 1931 में नई दिल्ली के उद्घाटन के बाद ही अंग्रेजों की समझ में आ गया था कि उनके चैन से बैठने के दिन लद चुके हैं।

लेकिन अंग्रेज हार मानने वाले नहीं थे। उन्होंने जिस डामिनियन स्टेटस की बात को अब तक लगातार नकारा था, उसको लागू करने की बात करने लगे। 1935 का गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट इसी दिशा में एक कदम था लेकिन कांग्रेस ने लाहौर में 1930 में ही तय कर लिया था कि अब पूर्ण स्वराज चाहिए, उस से कम कुछ नहीं। 1935 के बाद यह तय हो गया था कि अंग्रेज को जाना ही पड़ेगा। लेकिन वह तरह तरह के तरीकों से उसे टालने की कोशिश कर रहा था। अपने सबसे बड़े खैरख्वाह जिन्ना को भी नई दिल्ली के क्वीन्स्वे (अब जनपथ) पर अंग्रेजों ने एक घर दिलवा दिया था। जिन्ना उनके मित्र थे इसलिए उन्हें एडवांस में मालूम पड़ गया था कि बंटवारा होगा और फाइनल होगा। शायद इसीलिए जिन्ना की हर चाल में चालाकी नजर आती थी। बंटवारे के लिए अंग्रेजों ने अपने वफादार मुहम्मद अली जिन्ना से द्विराष्ट्र सिद्धांत का प्रतिपादन करवा दिया। वी.डी. सावरकार ने भी इस सिद्धांत को हिन्दू महासभा के अध्यक्ष के रूप में 1937 में अहमदाबाद के अधिवेशन में अपने भाषण में कहा लेकिन अंग्रेज जानता था कि सावरकर के पास कोई राजनीतिक समर्थन नहीं है इसलिए वे जिन्ना को उकसाकर महात्मा गांधी और कांग्रेस को हिन्दू पार्टी के रूप में ही पेश करने की कोशिश करते रहे।

आजादी की लड़ाई सन बयालीस के बाद बहुत तेज हो गई। ब्रिटेन के युद्ध कालीन प्रधानमंत्री विन्स्टन चर्चिल को साफ अंदाज लग गया कि अब भारत से ब्रिटिश साम्राज्य का दाना पानी उठ चुका है। इसलिए उसने बंटवारे का नक्शा बनाना शुरू कर दिया था। चर्चिल को उम्मीद थी कि वह युद्ध के बाद होने वाले चुनाव में फिर चुने जायेगें और प्रधानमंत्री वही रहेंगे इसलिए उन्होंने भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड वाबेल को पंजाब और बंगाल के विभाजन का नक्शा भी दे दिया था। उनको शक था कि आजाद भारत सोवियत रूस की तरफ जा सकता है और उसको कराची का बेहतरीन बंदरगाह मिल सकता है। उसके बाद पश्चिम एशिया के तेल पर उसका अधिकार ज्यादा हो जाएगा। शायद इसीलिए चर्चिल ने जिन्ना को इस्तेमाल करके कराची को भारत से अलग करने की साजिश रची थी।उसने तत्कालीन वायसराय लार्ड वाबेल को निर्देश दिया कि बंटवारे का एक नक्शा बाण लो। लार्ड वाबेल तो चले गए लेकिन वह नक्शा कहीं नहीं गया। जब लार्ड माउंटबेटन भारत के वायसराय तैनात हुए तो लार्ड हैस्टिंग्ज इसमें जुगाड़ करके अपने आपको वायसराय की चीफ ऑफ स्टाफ नियुक्त करवा लिया। उन्होंने युद्ध काल में चर्चिल के साथ काम किया था इसलिए लार्ड इसमें चर्चिल के बहुत भरोसे के आदमी थे और चर्चिल ने अपनी योजना को लागू करने के लिए इनको सही समझा। प्रधानमंत्री एटली को भरोसे में लेकर लार्ड हैस्टिंगज लायनेल इसमे, नए वायसराय के साथ ही नई दिल्ली आ गए। चर्चिल की बंटवारे की योजना के वे ही भारत में सूत्रधार बने। वे युद्ध काल में चर्चिल के चीफ मिलिटरी असिस्टेंट रह चुके थे। बाद में वे ही नैटो के गठन के बाद उसके पहले सेक्रेटरी जनरल भी बने।

जब लार्ड माउंटबेटन मार्च 1947 में भारत आए तो उनका काम भारत में एक नई सरकार को अंग्रेजों की सत्ता को सौंप देने का एजेंडा था। उनको क्या पता था कि चर्चिल ने पहले से ही तय कर रखा था कि देश का बंटवारा करना है। हालांकि माउंटबेटन 1947 में भारत आए थे लेकिन उनको क्या करना है यह पहले से ही तय हो चुका था। यह अलग बात है उनको पूरी जानकारी नहीं थी। वे अपने हिसाब से ट्रांसफर ऑफ पावर के कार्य में लगे हुए थे। बाद में लार्ड माउंटबेटन को पता चला कि उनको चर्चिल ने इस्तेमाल कर लिया है लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

भारत के बंटवारे में अंग्रेजों की साजिश की जानकारी तो शुरू से थी लेकिन न ब्रिटिश लाइब्रेरी में एक ऐसा दस्तावेज मिला है जो यह बताता है कि चर्चिल ने 1945 में ही पंजाब और बंगाल को बांटकर नक़्शे की शक्ल दे दी थी। जब माउंटबेटन को पता चला कि वे इस्तेमाल हो गए हैं तो उन्होंने बहुत गुस्सा किया और अपने चीफ ऑफ स्टाफ हैस्टिंग्ज इसमें से कहा कि आप लोगों के हाथ खून से रंगे हैं तो जवाब मिला कि लेकिन तलवार तो आपके हाथ में थी। उनको याद दिलाया गया कि भारत के बंटवारे की योजना का नाम माउंटबेटन प्लानभी उनके ही नाम पर है। जब पाकिस्तान के उद्घाटन के अवसर पर माउंटबेटन कराची गए तो जिन्ना ने उनको धन्यवाद किया। वायसराय ने जवाब दिया कि आप धन्यवाद तो चर्चिल को दीजिए, क्योंकि आप के साथ मिलकर उन्होंने ही यह साजिश रची थी। मैं तो इस्तेमाल हो गया। जिन्नाह ने जवाब दिया कि हम दोनों ही इस्तेमाल हुए हैं, हम दोनों ही शतरंज की चाल में मोहरे बने हैं। जानकार बताते हैं कि चर्चिल ने जिन्नाह को ऐसा पाकिस्तान देने का सब्ज़बाग़ दिखाया था जिसमें बंगाल और पंजाब तो होगा ही, बीच का पूरा इलाका होगा जहां से होकर जीटी रोड गुजरती है, वह पाकिस्तान में ही रहेगा। शायद इसीलिए जब 1500 किलोमीटर के फासले के दो हिस्सों में फैला पाकिस्तान बना तो जिनाह की पहली प्रतिक्रिया थी कि उनको माथ ईटेन पाकिस्तानमिला है। अपनी मौत के पहले मुहम्मद अली जिन्ना ने अपने प्रधानमंत्री लियाक़त अली से स्वीकार किया कि पाकिस्तान बनाना उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी बेवकूफी थी।

(इस लेख को लिखने के पहले मैंने लैरी कालिंस और डामिनिक लैपियर की किताब फ्रीडम ऐट मिडनाईटऔर नरेंद्र सिंह सरीला की किताब ग्रेट गेम : द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ इंडियाज पार्टीशन को एक बार और पढ़ा। इस विषय पर एक बहुत अच्छी ब्रिटिश फिल्म भी बन चुकी है)

[साभार: फेसबुक वाल से]

 

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