सवाल यह है कि पत्रकारों की इस हालत के लिए क्या सिर्फ मीडिया संस्थान दोषी हैं?

Monday, 08 January, 2018

पत्रकार अगर अपनी जमीन पर लौट गए तो लोकतंत्र पर मंडरा रहा खतरा काफी कम हो जाएगा। पत्रकार जिस बेचारगी की मुद्रा में आ गए हैवह लोकतंत्र के ध्वंस के संकेत हैं।’ अपने फेसबुक पोस्ट के जरिए ये कहा डेक्कन हेराल्ड के प्रिंसिपल कॉरेस्पोंडेंट अनिल सिन्हा ने। उनका पूरा पोस्ट आप यहां पढ़ सकते हैं-

शनिवार की शाम उदासी में गुजरी। प्रेस क्लब गया थाचैनलों और अखबारों में चल रही छटनी पर आयेाजित सभा में भाग लेने। देखकर उदास हो गया कि मीडियाकर्मियों पर बेचारगी पूरी तरह हावी है।

जयशंकर गुप्ता और उर्मिलेश जैसे वरिष्ठ साथियों ने संघर्ष और एकता के कुछ अच्छे तरीके जरूर बताए। सवाल यह है कि पत्रकारों की इस हालत के लिए क्या सिर्फ मीडिया संस्थान दोषी हैं?

वैश्वीकरण की अर्थव्यवस्था के साथ उपभोक्तावाद ने पत्रकारों को इस तरह मोहित कर लिया कि वे भी बारात में बाजा बजाने लगे। पत्रकारों की आमदनी इतनी बढ़ गई कि देश की गरीबी की चर्चा करने में उन्हें शर्म आने लगी। उन्होंने मजदूर यूनियनों और आंदोलन समूहों की खबरें छापना बंद कर दी। पहले पत्रकार लड़ाई के लिए उतरते थे तो वे बिन बुलाए आ जाते थे। अब किस मुंह से आएंगेकई वक्ताओं ने भावुकता भरी शिकायत रखी कि चैनल और अखबारों में लाखों पाने वाले संपादकों और वरिष्ठ पत्रकारों ने अपनी तनख्वाह कम कर साथियों की नौकरी नहीं बचाई।

इस चर्चा का असर तो किसी पर शायद ही होगालेकिन इसमें बड़े मूल्यों की ओर लौटने की ललक जरूर दिखाई देती है। पत्रकार अगर अपनी जमीन पर लौट गए तो लोकतंत्र पर मंडरा रहा खतरा काफी कम हो जाएगा। पत्रकार जिस बेचारगी की मुद्रा में आ गए हैवह लोकतंत्र के ध्वंस के संकेत हैं। ऐसी स्थिति उस समय कभी नहीं आई जब पत्रकार इतना कम वेतन पाते थे कि उनका गुजारा भी मुश्किल से होता था। नैतिक ताकत ने उन्हें भारत को आजादी दिलाने में अहम भूमिका निभाने की ऊर्जा दी और इसी ताकत के बल पर वह इंदिरा गांधी के आापातकाल से लड़ पाए।



समाचार4मीडिया.कॉम देश के प्रतिष्ठित और नं.मीडियापोर्टल exchange4media.com की हिंदी वेबसाइट है। समाचार4मीडिया में हम अपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी रायसुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो कर सकते हैं।



पोल

क्या संजय लीला भंसाली द्वारा कुछ पत्रकारों को पद्मावती फिल्म दिखाना उचित है?

हां

नहीं

Copyright © 2017 samachar4media.com