रवीश भैया, आपसे कुछ कहना है...

रवीश भैया, आपसे कुछ कहना है...

Thursday, 21 December, 2017

मृत्युंजय त्रिपाठी

युवा पत्रकार ।।

सिर्फ सवाल नहीं, पेट का सवाल है... लेकिन जाने दीजिए...!

रवीश भैया, आपको अवॉर्ड मिलने से हमें दिली खुशी है। न यह अवॉर्ड छोटा है, न आप... दोनों एक साथ मिलकर एक-दूसरे को गौरवान्वित कर रहे हैं जैसे। और भैया, इस शर्ट में आप क्या खूब जंच रहे हैं। सम्मान पाने की आपकी खुशी और इस अनोखे अंदाज से आपकी उम्र भी ठहर गई है जैसे। लगता है आप फिर से इश्क में पड़ गए हैं, इश्क में शहर हो गए हैं...। बधाई हो! लेकिन रवीश भैया, एक और सीन है। यहीं आस-पास। एनडीटीवी से निकाले जा चुके पत्रकार बहुत दुःखी हैं। घर वाले परेशान हैं। चैनल में बचे- खुचे पत्रकार कार्य अधिकता के दबाव में हैं इसके बावजूद इनकी भी नौकरी सुरक्षित नहीं है। कौन, कब तक है, कहा नहीं जा सकता इसलिए भैया आपसे कुछ कहना है...।

रविश भैया, आपको याद है ना... कुछ महीने पहले एक असहिष्णुता हुई थी और तब सबने अपने सम्मान वापस लौटा दिए थे। आप भी प्राइम टाइम में खूब गरजे थे, याद आया ना? लेकिन यह क्या भैया, हम हैरान हैं कि आज आप इतने खामोश क्यों हो गए हैं? एक तरफ असहिष्णुता होती रही, दूसरी तरफ आप सम्मान लेते रहे...? काश कि पत्रकारों के साथ हो रही इस भीषण, भयावह, जानलेवा असहिष्णुता पर आपने कुछ कहा होता, न तो मौन रहकर सम्मान ही वापस कर दिया होता... कुछ तो किया होता?

किसी की रोजी-रोटी छीन लेना, असहिष्णुता नहीं है क्या भैया? देश के नौजवानों को नौकरियां न देने पर एक पत्रकार के रूप में आपने सरकार से कितने ही सवाल ठोंके हैं, कभी नहीं डरे लेकिन आज आप जिस चैनल में हैं, वहां अन्याय होता रहा, नौकरियां छीनी जाती रहीं और आप खामोश रहे। अब बोलिए ना, इस एनडीटीवी प्रबंधन से सवाल कौन पूछेगा? रवीश भैया, सवाल का सवाल तो अब भी है ना? बल्कि अभी तो उससे भी आगे पेट का सवाल है... स्क्रीन काली नहीं कीजिएगा? बैठा दीजिए ना उसी तरह दो नकाबपोशों को प्रबंधन और पत्रकार बनाकर... पूछ लीजिए ना 'अथॉरिटी' से सवाल...। बोलिए ना... नमस्कार, मैं रवीश कुमार...!

ओह... यह क्या कह दिया हमने भी...? छोड़िए-छोड़िए...। हमने तो यह सोचकर उम्मीद कर ली थी कि आप सच्चे पत्रकार हैं तो पत्रकारों की चिंता करेंगे, कई बार आपने की भी है लेकिन अभी याद आया कि जो चैनल प्रबंधन पत्रकारों को बाहर कर रहा है, उनमें सहमति तो आपकी भी है: वहां तो कुछ-कुछ प्रबंधन की ही हैशियत में आप खुद भी हैं और उसी प्रबंधन से सवाल? मतलब खुद से सवाल? यह तो अपने ही गिरेबां में देखने वाली बात हो जाएगी ना भैया? नहीं... यह कैसे हो सकता है? छोड़िए... अपनी बात वापस ले ली हमने...। जाने दीजिए, अगर सबकी नौकरी चली जाए, आप तो बस अपनी बचाइए...! हम जैसे कर्मचारी टाइप पत्रकार तो आते-जाते रहेंगे, रवीश कुमार देश में एक ही है... उसका होना जरूरी है। छोटा भाई समझकर कहा-सुना माफ कीजिए और आनंद लीजिए इस माहौल का, इस बहार का... अब तो आपके भी बागों में बहार है...। 
बधाई हो!

(साभार: फेसबुक वॉल से)

 

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