कुछ इस तरह जब वरिष्ठ पत्रकार विनोद मेहता ने याद किया था अपने गुरु खुशवंत सिंह को...

Monday, 20 March, 2017

अपनी बेबाकी और बिंदासपन के लिए मशहूर रहे लेखक, पत्रकार खुशवंत सिंह की आज पुण्यतिथि है। ऐसे मौके पर समाचार4मीडिया अपनी सहयोगी प्रतिष्ठित मैगजीन 'इम्पैक्ट' (IMPACT) से  आउटलुक समूह के एडिटोरियल चेयरमैन रह चुके स्व. विनोद मेहता का वो लेख पब्लिश कर रहा है, जिसमें उन्होंने अपने जमाने के उत्कृष्ट संपादक, विद्वान, मजाकिया और बेवाक सरदार के दुनिया से अलविदा कह देने पर कुछ यूं याद किया था....। ये लेख 2014 में लिखा गया था।

खुशवंत सिंह से मेरी पहली मुलाकात 1969 में हुई। उस वक्त मैं अपनी  किताब 'Bombay: A Private View'  व्यस्त था, जिससे मेरी मां नफरत करती थीं। खुशवंत ने मुझे दो लंबे साक्षात्कार दिए। जब मैंने उनसे पूछा कि लंदन में रहने के दौरान क्या किया तो उनका जवाब था,  'Fuc***g, cheese and wine.'। ये अद्भुतवाक्य उस अध्याय का शीर्षक बन गया जिसे मैंने उन्हें समर्पित किया था। 1974 में जब मैं डेबोनेयर(Debonair) का संपादन कर रहा था और वो इलस्ट्रेटेड वीकली के साथ समृद्धि हासिल कर रहे थे। उस दौरान जब पत्रिका के बीच के पेजों पर एक नग्न तस्वीर छपी थी। एक पर्सनल फेवर के रूप में मैंने उन्हें डेबोनेयर की अग्रिम प्रतियां भेजीं, ताकि वो सबसे पहले उस पेज का आनंद उठा सकें। खुशवंत ने मेरे इस काम की सराहना की और हम जीवन भर के दोस्त बन गए। हालांकि हम दोनों में कुछ मुद्दों पर असहमति थी, फिर भी वो मेरे गुरु बन गए।

अगर भारत में ऐसा कोई संपादक है जिसने मुझे प्रभावित किया तो वो खुशवंत सिंह ही थे। उन्होंने मुझे समझदार विवाद की महत्ता बताई, जो बहस और असहमति तक पहुंच सकता है। वो कहते थे पाठक को भडक़ाओ, उसे जगाओ। कभी-कभी लोग मुझे बधाई देते थे, उन सभी प्रकाशनों के उन लाइव ‘लेटर पेज’ के लिए जिन्हें मैं संपादित करता था। सच्चाई ये है कि पाठक सिर्फ अखबार या मैगजीन  पर ही नहीं, उसके संपादक पर भी आक्रामकता करना पसंद करता है।

दरअसल, खुशवंत ने मुझे आलोचनाओं को इनायत के साथ स्वीकारना सिखाया, क्योंकि संपादक के बारे में लिखे जाने वाले पत्र हमेशा अधिक मनोरंजक, बेहतरीन तरीके से लिखे हुए और सच के करीब होते हैं। मैंने जल्दी से उनकी इस बुद्धिमता को अपनाया। खुशवंत से जुड़ी अनगिनत यादें मेरे दिमाग में हैं। हमारी आखिरी मुलाकात में वो मुझे एक नोवल लिखने के लिए तंग कर रहे थे, उन्होंने मुझे शांति से लिखने के लिए अपना कसौली वाला मकान देने की बात भी कही थी। हालांकि मैंने उनसे कहा था कि अभी मेरे अंदर फिक्शन लिखने का आत्मविश्वास नहीं है। लेकिन उन्होंने दबाव डाला। ऐसे हजारों उभरते और नए लेखक होंगे जिनके काम का श्रेय खुशवंत सिंह को जाता है। खुशवंत सिंह ने कई नए लेखकों को अपनी सलाह, अपने कॉन्टैक्ट और संपादकों से नए लोगों की तारीफ के रूप में उन्हें प्रोत्साहित किया (लिखने की इच्छा रखने वाली सुंदर लड़कियों को अधिक प्रोत्साहन मिला)। नतीजतन उन्हें समर्पित की जाने वाली किताबों की संख्या सैंकड़ों में हो गई। मैं जितने भी लेखकों को जानता हूं उसमें वो सबसे ज्यादा दरियादिल थे।

लेखक आमतौर पर दरियादिली के लिए नहीं जाने जाते, ईर्ष्या करना उनके लिए ज्यादा सामान्य है। जब ट्रूमैन कैपोटे (Truman Capote) की मौत हुई तो उनके समकालीन लेखक गोरविडाल ने कहा, गुड करियर मूव। खुशवंत सिंह किसी से ईर्ष्या नहीं करते थे। एक नए लेखक की नई किताब उन्हें खुशी देती थी। वो लगातार उसके बारे में बात करते थे। अगर वो अपने दक्षिण दिल्ली के फ्लैट में आपको बुलाते थे तो पूरी शाम शानदार वार्तालाप चलता रहता था। उनके घर पर विद्धानों से लेकर पेज 3 तक के लोगों को जमावड़ा रहता था। खुशनसीबी से पेज 3 वाले कभी-कभी ही अपना मुंह खोलते थे। मैं उन्हें हमेशा चुटकुले सुनाता था और लुटियन गॉसिप भी बताता रहता था। वो खुद कभी गॉसिप नहीं करते थे। उन्हें इन दोनों ही चीजों की कमी महसूस हुई होगी। खासतौर पर पिछले दो दशकों में जब वो कम चल-फिर पाते थे।

मैंने पहली बार ब्लू लेबल विस्की उन्हीं के घर में पी थी। किसी ने उन्हें उपहार के रूप में विस्की दी थी। कई मायनों में वो ऐसे इंसान थे, जिनके लिए उपहार चुनना आसान था। एक विस्की की बोतल हमेशा उनके चेहरे पर मुस्कान ले आती थी। क्योंकि उनका निमंत्रण केवल शाम सात से आठ के बीच ही खुला रहता था। इसलिए उनके साथ जल्दी पीना पड़ता था। वो हमेशा दो बड़े विस्की के पैग पीते थे, कभी इससे ज्यादा नहीं। पर जैसे-जैसे उनकी उम्र बड़ी, दो से एक पर आ गए।

जब हाल ही मे मैं उनसे मिला तो मैंने पाया कि वो जल्द ही थक जाते थे, इसलिए साढ़े सात बजे तक निकलना पड़ता था। वो विस्की और सेक्स की धुन में खोए रहते थे। हालांकि मैं ठीक से नहीं कह सकता कि वो दोनों में कितनी भरपूरता से लिप्त थे। वो करने वालों से ज्यादा बात करने वालों में से थे।

ज्यादातर पंजाबी मर्दों की तरह उन्हे भी महिलाओं के बड़े ब्रेस्ट भाते थे, और वो उन महिलाओं के प्रति पक्षपाती थी जो ऐसी होती थी। जब मैं डेबोनेयर का संपादक था, तब उन्होंने मुझे फोन कर केटी मूजा के बारे में पूछा जो उस वक्त डेबोनेयर पर छाई हुई थी। केटी के स्तन बड़े थे। उन्होंने मुझ से पूछा कि मैं केटी के साथ उनकी मुलाकात करा सकता हूं क्या। उन दोनों की दोस्ती काफी चर्चित रही।

खुशवंत सिंह दो तरह की टोपियां पहनते थे-दोनों अलग-अलग। बेशक वो हमारे दौर के बेजोड़ संपादक थे। 70 के दशक में छपने वाले इलस्ट्रेटेड वीकली ने  पत्रकारिता के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित किए और अपने जमाने की सबसे ज्यादा बिकने वाली पत्रिका बनी। उनके संपादन में पत्रिका ने बड़ी आसानी से ऊंचे किस्म का साहित्य और लोकप्रिय राजनीति का मेल किया, जिससे पत्रिका ने अप्रत्याशित सफलता हासिल की।

उनके कॉलम बेजोड़ थे (सिवाए गंदे चुटकुलों को) और देश भर में पढ़े जाते थे। ऑस्कर वाइल्ड की तरह वो गंभीर चीजों को मनोरंजक बना सकते थे और मनोरंजक को गंभीर बनाने की क्षमता रखते थे। मारियो मैरांडा का वो स्केच जिसमें एक सरकार को बल्ब की रोशनी में विस्की पीते और अश्लील तस्वीरें देखते हुए दिखाया गया है, उनके व्यक्तित्व का बिल्कुल सही प्रस्तुतिकरण है।

विद्धान के रूप में उनके द्वारा लिखी गई ‘हिस्ट्री ऑफ सिख’ एक क्लासिक और परिपूर्ण काम है। उसी तरह उनकी उपन्यास ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ भी। अपनी किताबों की संख्या के लिए शायद वो गिनीज बुक ऑफ वल्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज करवा सकते थे। उनके कुछ काम ज्यादा सोच विचार के बिना लिखे प्रतीत होते हैं। एक बार उन्होंने मुझे बताया कि जब कुछ प्रकाशन उन्हें लिखने के लिए तंग करते हैं और वो उन्हें मना करते हैं तो वे लोग उन्हीं के पहले छपे हुए कामों को जोड़ तोडक़र छाप देते थे।

सबसे बड़ी बात ये है कि खुशवंत सिंह एक निडर व्यक्ति थे, जो शक्तिशाली दुश्मन बनाने से डरते नहीं थे। भिंडरवाले से भिड़कर उन्होंने अपनी जान जोखिम में इसीलिए डाली, क्योंकि उनका ये मानना था कि वो पूरे सिख समुदाय को बर्बाद कर रहा था। उन्होंने निडर तरीके से समाज में हो रहे कपट का मजाक उड़ाया, ऐसा नहीं कि वो मृत व्यक्तियों के बारे में बुरा बोल रहे थे। वो अपनी आखिरी सांस तक संशयवादी बने रहे। दूसरी ओर आपातकाल के दौरान हुए घटनाक्रम के बावजूद वो संजय गांधी का समर्थन करते थे। वो इसे लेकर अपना दिमाग नहीं बदल पाए थे और इस मुद्दे पर अपने को सही मानते थे।

जब खुशवंत सिंह स्वर्ग के दरवाजे पर खड़े होंगे तो मुझे यकीन है कि वो भगवान को अपने अश्लील चुटकुलों से मनोरंजन करेंगे और उनसे पूछेंगे कि क्या उनके पास कोई अच्छी विस्की है।

आप स्व. विनोद मेहता का अंग्रेजी में लिखा लेख नीचे हेडलाइन पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं...

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