भारतीय पत्रकारिता में यह ‘पूर्ण स्‍वराज्‍य’ का दौर है: अरनब गोस्‍वामी

Friday, 05 May, 2017

समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।।

वरिष्‍ठ पत्रकार अरनब गोस्‍वामी ने हमारी सहयोगी मैगजीन इंपैक्‍ट’ (IMPACT) की वरिष्‍ठ पत्रकार प्रियंका मेहरा से कई मुद्दों पर विस्‍तार से बातचीत की। अरनब ने बताया कि उनका नया वेंचर रिपब्लिक’ (Republic)  मौजूदा न्‍यूज नेटवर्क्‍स के बीच सबसे ज्‍यादा डायनामिक डिजिटल मौजूदगी दर्ज कराएगा। उन्‍होंने यह भी बताया कि टाइम्‍स नाउ’ (Times Now) छोड़कर लोग रिपब्लिकसे क्‍यों जुड़े हैं और मुंबई में काम करने से उन्‍हें आजादी और स्‍वतंत्रता में कितनी मदद मिलती है।https://ssl.gstatic.com/ui/v1/icons/mail/images/cleardot.gif

प्रस्‍तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश :

ऐसा लगता है कि आपने रिपब्लिक ब्रैंड को तैयार करने के लिए अपने ब्रैंड नेम  ‘अरनबका लाभ उठाया है?

मैं अपने आप को एक ब्रैंड के रूप में नहीं देखता हूं लेकिन लोगों के बीच एक धारणा बनी हुई है। यदि मेरे साथ कोई ब्रैंड वैल्‍यू जुड़ी हुई है तो रिपब्लिक टीवीकी लॉन्चिंग में इसका लाभ मिलेगा और हम इसे भुनाने के लिए हरसंभव उपाय करेंगे। अब ब्रैंड रिपब्लिकके बिना ब्रैंड अरनबकहीं नहीं है। यदि मेरा ब्रैंड नेम है भी, तो उसे इस संस्‍थान को सौपा जा चुका है।    

18 नवंबर 2016 को टाइम्‍स नाउमें आपका आखिरी दिन था। आपने रिपब्लिक टीवीके बारे में कब सोचा था ?

मैंने तभी इसके बारे में सोच लिया था और इसे शुरू करने में जुट गया। अब सारी चीजें आपके सामने हैं। चार महीने बाद ही हम इसे लॉन्‍च करने के लिए तैयार हैं। 

रिपब्लिकके बारे में कुछ बताएं, इसमें क्‍या खास है ?

रि‍पब्लिकपूरी तरह पत्रकारीय स्‍वतंत्रता (journalistic independence) की बात करता है। इसकी खास बात यह है कि इसकी स्‍टोरी बिना किसी दबाव अथवा डर के होंगी। मैंने भी हमेशा ऐसा ही किया है लेकिन अब यह पूरी तरह से स्‍वतंत्र है। आप यह भी कह सकते हैं कि भारतीय पत्रकारिता में यह पूर्ण स्‍वराज्‍य’ (poorna swaraj) का दौर है। इसके अलावा यह नई पीढ़ी की पत्रकारिता की बात भी करता है जो इस प्रकार की पत्रकारिता को एक नए युग में ले जाएंगे। रिपब्लिक वर्ल्‍ड’ (Republic World) भी टेलिविजन और डिजिटल मीडिया को एक साथ मिलाकर ज्‍यादा एग्रेसिव फॉर्मेट में लेकर आ रहा है।    

मीडिया विजिबिलिटी (media visibility) की बात करें तो आपका शुरुआती गेम प्‍लान क्‍या है। लॉन्चिंग के आखिरी चरण तक बिना पारंपरिक विज्ञापन के युवाओं के बीच दिए गए भाषण और डिजिटल को लेकर आपकी एग्रेसिव स्‍ट्रेटजी ने अपना काम कर दिया है...   

: मेरा कोई गेम प्‍लान नहीं है। लेकिन मुझे लगता है कि हमारे देश के लिए हमारे ऊपर और जिस तरह की पत्रकारिता हम करते हैं, उस पर भरोसा करते हैं। इसलिए आप ऐसा कैसे कह सकती हैं?  आप सिर्फ विभिन्‍न स्‍थानों पर जाकर अपनी बात रखते हैं और तब लोग अपने हिसाब से उसे समझते हैं। हमारे देश में अधिकांश लोग मीडिया के लिए एक नया विजन चाहते हैं।  

वे लोग अब मीडिया में डायनामिक बदलाव चाहते हैं और वे पुरानी मीडिया से दूर जाना चाहते हैं। लोग अब पत्रकारिता का बेहतर भविष्‍य चाहते हैं। अभी तक में अपने आर्गनाइजेशन को तैयार करने में जुटा हुआ था और अब मैं इस स्थिति में आ गया हूं कि इसे लॉन्‍च किया जा सकता है। इसलिए इसमें असामान्‍य जैसी कोई बात नहीं है। सिर्फ इतना ही अंतर है कि मैं उन लोगों के खिलाफ हूं जो अभी भी पारंपरिक (traditionally) रूप से सोच रहे हैं और उन्‍होने मुझे डगमगाने की बचकानी हरकतें की हैं लेकिन उनके सभी तरीके फेल हो गए हैं।

आप किस तरह के हथकंडों (tactics) की बात कर रहे हैं ?

: एक मीडिया हाउस ने तो डिस्‍ट्रीब्‍यूटर्स के पास जाकर यह तक कह दिया कि यदि आप कुछ हफ्तों के लिए रिपब्लिक टीवीबंद कर देते हैं तो हम आपको छह महीने के डिस्‍ट्रीब्‍यूशन का पैसा देंगे। यही नहीं, एक मीडिया हाउस ने भी अपने यहां से नौकरी छोड़ने वालों को साफ कह दिया कि उन्‍हें पीएफ और ग्रेच्‍युटी का पैसा नहीं दिया जाएगा। लेकिन उन लोगों के ये हथकंडे काम नहीं आए क्‍योंकि उनकी ये बातें किसी ने नहीं मानीं।

क्‍या आपको उम्‍मीद थी कि आपको इस तरह के विरोध का सामना करना पड़ेगा ?

सच कहूं तो मुझे इस तरह की कतई उम्‍मीद नहीं थी। यह मीडिया हाउस मुझसे लड़कर बेकार में अपनी एनर्जी नष्‍ट कर रहा है। लेकिन अभी तक न तो मैंने कभी इसे गंभीरता से लिया है और न ही कभी अपनी प्रतिक्रिया दी है। मेरा पूरा फोकस अपनी टीम पर और इस बात पर है कि हमें आगे क्‍या करना है।

रिपब्लिक टीवी का कंटेंट फॉर्मेट किस तरह का है ?

यह पूरी इंडस्‍ट्री में सबसे बेहतर होगा। मैं इस बारे में और ज्‍यादा नहीं बता सकता हूं, ताकि इसके बारे में अनापशनाप बातें न बनें। यह सिर्फ न्‍यूज है और आखिर तक न्‍यूज ही रहेगी। मैं आपको यह बता सकता हूं कि इस न्‍यूज चैनल पर मैं रात नौ बजे आया करूंगा। उम्‍मीद है कि लोग मुझे देखना पसंद करेंगे।

रात नौ बजे के स्‍लॉट के बारे में आपका क्‍या मानना है ? 

न्‍यूज चैनलों के लिए रात नौ बजे का स्‍लॉट काफी महत्‍वपूर्ण होता है। मुझे लगता है कि रात नौ बजे हमें ऑडियंस मिलेंगे। आपको यह भी समझना होगा कि यह सिर्फ रात नौ बजे की बात नहीं है, इससे सभी न्‍यूज चैनलों की व्‍युअरशिप प्रभावित होती है। आखिरकार, मैं इसे प्राइम टाइम, सुपर प्राइम टाइम आदि के रूप में देखता हूं। हालांकि मैं किसी विशेष स्‍लॉट के बारे में नहीं सोच रहा हूं लेकिन रात नौ बजे का समय काफी महत्‍वपूर्ण होता है।

हम देख चुके हैं कि पूरे दिन के मुकाबले रात नौ बजे का स्‍लॉट चैनल को ज्‍यादा लोगों से जोड़ पाता है। क्‍या रिपब्लिक इससे कुछ अलग करने जा रहा है। ऑडियंस बढ़ाने के लिए क्‍या इसे डिजिटल का सहारा मिलने जा रहा है?

सभी न्‍यूज नेटवर्क्‍स के बीच रिपब्लिकसबसे डायनामिक डिजिटल उपस्थिति दर्ज कराएगा। हम एक नए लेवल का प्रयोग शुरू करने जा रहे हैं। इसमें सराउंड साउंड के साथ ही कुछ ऐसी भी चीजें होंगी, जो अबसे पहले नहीं हुई हैं। इसके लिए हम अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर कुछ ग्रुप्‍स के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। इसलिए ‘RepublicWorld.com’ में आपको डिजिटल के सभी रूप देखने को मिलेंगे। इसमें हमारे चैनल की लाइव स्‍ट्रीमिंग (live-streaming) भी होगी। इसके लिए हम थर्ड पार्टी प्रोवाइडर से भी मिलकर काम करेंगे। इसलिए रिपब्लिक वर्ल्‍डअपने आप में एक अलग ही कंपनी होगी और इसे चैनल के साथ ही लॉन्‍च किया जाएगा।

रिपब्लिकके लिए क्‍या आप किसी खास सेगमेंट के एडवर्टाइजर्स के बारे में सोच रहे हैं?

नहीं, ऐसा कुछ नहीं है। इस पर सभी सेगमेंट के एडवर्टाइजर्स मिलेंगे। इसमें ऐसे एडवर्टाइजर्स भी शामिल हैं जिन्‍होंने पूर्व में कभी न्‍यूज जॉनर (genre) को एडवर्टाइजिंग के हिसाब से नहीं देखा है।

मिरर नाउ’ (Mirror Now) की लॉन्चिंग के बारे में आप क्‍या सोचते हैं?

ये मिरर नाउक्‍या है। मैंने इसके बारे में कभी नहीं सुना है। इसके बारे में आप मुझे बताएइये कि यह क्‍या है?

टाइम्‍स नेटवर्कने मैजिक ब्रिक्‍स’ (Magicbricks) को ही मिरर नाउके रूप में रीलॉन्‍च किया है और इसे अपने दूसरे नंबर के इंग्लिश जनरल न्‍यूज चैनल के रूप में रखा है। इसके बारे में आपका क्‍या विचार है?

यहां चैनल अपने नाम को तीन-तीन बार बदलते हैं। आप प्रॉपर्टी टाइम्‍सको मै‍जिक ब्रिक्‍समें बदल देते हैं और फिर इसे मिरर नाउआदि नाम से बदल देते हैं। मुझे नहीं लगता कि देश में इन चैनलों को कोई देख रहा है। आप मेरे न्‍यूज रूम में जाकर इसके बारे में पूछिए, किसी को भी इसके बारे में पता नहीं होगा। ऐसे चैनलों के लिए मेरी शुभकामनाएं।     ‍

टाइम्‍स नाउछोड़कर कितने लोग आपके साथ जुड़े हैं?

ऐसे कम से कम 30-40 लोग हैं। टाइम्‍स नाउसे कई अच्‍छे प्रोफेशनल लोग हमसे जुड़े हैं। मुझे नहीं लगता कि किसी को खासकर टाइम्‍स नाउको इसके बारे में झल्‍लाना चाहिए। यदि लोग आपको छोड़कर जा रहे हैं तो आपको बैठकर झल्‍लाने के बजाय आत्‍ममंथन करना होगा कि क्‍यों ऐसा हो रहा है।

टाइम्‍स नाउके कई लोगों ने हमारे यहां जॉइन किया है, क्‍योंकि उन्‍हें मेरी पत्रकारिता में भरोसा है और दुनिया में कोई भी उन्‍हें नहीं रोक सकता है और न ही वे रुकेंगे। इनमें से ऐसे भी कई लोग हैं जो तमाम परेशानियों और व्‍यक्तिगत कठिनाइयों के बावजूद हमसे जुड़े हैं। रिपब्लिक टीवीके लिए हम जिस तरह की पत्रकारिता करते हैं, उसमें उनका पूरा भरोसा है। मैं काफी खुशनसीब हूं कि इस तरह के लोग मेरी टीम का हिस्‍सा हैं।   

अपनी पुरानी भूमिका से आपको क्‍या सीख मिली है जिसे आप रिपब्लिक टीवीमें अप्‍लाई करेंगे?

मैंने अभी तक जो भी सीखा है वह अपने रिपोर्टरों और एडिटर्स से सीखा है। मैं इस ऑर्गनाइजेशन में किसी कॉरपोरेट मीडिया ग्रुप के मूल्‍यों (values) को लेकर नहीं आया हूं। मैं अपने मूल्‍यों को अपने साथ लेकर चलता हूं।

टाइम्‍स नाउमें आपके साथ काम कर चुके लोगों से हमें पता चला है कि जब आप वहां पर थे तो आप ब्रैंडेड कंटेंट की जोरदार खिलाफत करते थे। इस बारे में अब आपके क्‍या विचार हैं ?

मैं न्‍यूज कभी बेचता नहीं हूं। न ही मैं किसी को न्‍यूज बेचने देता हूं।

रिपब्लिक टीवीऔर रिपब्लिक वर्ल्‍डसे आपकी क्‍या उम्‍मीदें हैं?

यह बिल्‍कुल सीधी सपाट पत्रकारिता है जो दिल से आती है और रिपोर्टर को पूरी आजादी देती है ताकि वह बिना किसी डर के रिपोर्टिंग करे और न्‍यूज लेकर आए। आप मेरी पत्रकारिता के बारे में जानती हैं। मैंने हमेशा यही किया है। टीवी और डिजिटल एक साथ मिलकर सोसायटी बना सकते हैं और देश को सही दिशा में ले जा सकते हैं। रिपब्लिकके जरिये मैं यही करना चाहता हूं।    

आपने मुंबई में रहकर काम करने का निर्णय लिया है, इसकी कुछ खास वजह?

मैं ‍सभी तरह के दबावों से मुक्‍त होकर बिल्‍कुल अलग रहकर काम करना चाहता हूं और दिल्‍ली में कई तरह के दबाव हैं। इसलिए मैंने मुंबई से काम करने का निर्णय लिया है। मेरे साथ ऐसे कई लोग हैं जिन्‍होंने दिल्‍ली की बजाय मुंबई से काम करने का विकल्‍प चुना है। यहां काफी खुला माहौल मिलता है और किसी तरह का ज्‍यादा दबाव नहीं होता है।

क्‍या यह आपको सचमुच दिल्‍ली से दूर रखता है, जब आप कहते हैं कि यह पॉलिटिक्‍स का हब बन चुकी है। क्‍या आप वास्‍तव में इससे दूर हैं?

मुझे पॉलिटिक्‍स से दूर रहने की कोई जरूरत नहीं है। मुझे जब भी जरूरत होती है मैं राजनेताओं से बात करता हूं। मेरा उनके साथ और किसी तरह का कोई संबंध नहीं होता है, इसलिए मैं इस चीज को मिस नहीं करता हूं। असल में विशुद्ध राजनीति की तुलना में मीडिया में कवर करने के लिए बहुत कुछ है। 

दिल्‍ली में रहकर और यहां से दूर रहकर काम करने में आप कितना अंतर महसूस करते हैं?

दोनों जगह काम करने में बहुत अंतर है, क्‍योंकि मुझे लगता है कि मुंबई में रहकर आप अपने काम पर ज्‍यादा फोकस कर सकते हैं और वैसे भी मुझे लोगों में ज्‍यादा घुलना-मिलना (socialize) पसंद नहीं है। 

 

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