3 शब्दों ने ही दीपक चौरसिया को पहुंचाया एक खास मुकाम पर, पढ़ें इंटरव्यू...

Sunday, 15 April, 2018

टीवी मीडिया में जिन पत्रकारों ने अपना एक खास मुकाम बनाया हैउनमें दीपक चौरसिया का नाम प्रमुख है। इन दिनों वे आईटीवी नेटवर्क के हिंदी न्यूज चैनल 'इंडिया न्यूज' के एडिटर-इन-चीफ हैं। मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले के एक छोटे से गांव सेंदवा में जन्मे दीपक चौरसिया की लिखने-पढ़ने में कॉलेज के दिनों से ही दिलचस्पी रही है। दीपक चौरसिया खुद मानते हैं कि पत्रकारिता उन्हें अंदर से संतुष्टि देती है। उनसे जुड़े तमाम पहलुओं पर विस्तार से बात की समाचार4मीडिया के संपादकीय प्रभारी अभिषेक मेहरोत्रा ने। उनका पूरा इंटरव्यू आप यहां पढ़ सकते हैं-

कैसे इंदौर का एक आम लड़का बना आज का ब्रैंड दीपक चौरसिया?

शुरुआती दौर में ये यात्रा बहुत कठिन थीलंबी थीलेकिन एक चीज हैजो मैंने कभी नहीं छोड़ी और वो है-लिखनापढ़ना और सीखना। इन तीन चीजों की पैकजिंग, मेहनत करने की काबिलियत और लगातार 18 से 20 घंटे काम करने की कुव्वत।

मैंने अपना करियर प्रिंट मीडिया से शुरू किया था। मैंने छोटे से अखबार ‘लोकस्वामी’ से पत्रकारिता जगत में कदम रखा था। ये एक लघु अखबार हैजो मध्यप्रदेश से हर रोज शाम को निकलता था और अभी भी निकल रहा है। उसी समय उसमें सत्ता परिवर्तन हुआ थातो नए मालिकान आए थे। तब मैं इसका देल्ही रिपोर्टर बना। उस समय 1993 में मध्य प्रदेश के चुनाव होने थे, तो मैं उस दौर में कैसे अपनी पहचान बनाऊंइसके लिए एक खास रणनीति बनाईक्योंकि वैसे भी मध्य प्रदेश पॉलिटकली बहुत अवेयर है। मैं उस समय वहां होने वाले विधानसभा चुनाव में किस सीट से किस बड़ी पार्टी के किस उम्मीदवार को टिकट मिलेगाये खबर ब्रेक करता था और वहां के पॉलिटिकल सर्कल और मीडिया जगत में इसकी खूब चर्चा होती थी। 

विधान सभा का टिकट किसको मिल रहा हैक्या ये खबर तब बड़े अखबार ब्रेक नहीं कर पाते थे?

दरअसल, सभी बड़े अखबार सुबह के अखबार थे और मेरा अखबार सांध्य दैनिक था। इसलिए मैं ही ये खबर सबसे पहले ब्रेक करता था। सबसे पहले का कॉन्सेप्ट तभी आया कि हमें सबसे पहले खबर देना क्यों जरूरी है और ये कैसे होता है? हर दिन सुबह से दोपहर मुझे ये जानकारी लोगों के द्वारा मिल जाती थी कि ये टिकट फाइनल हो गया और किसे मिल रहा है। और सबसे पहले खबर शाम के अखबार में ये खबर प्रकाशित होती और इस तरह मैंंने अपनी खबरों के जरिए अपनी एक पहचान बनाई। 

पहले आप जर्नलिज्म में आए और फिर आईआईएमसी से पत्रकारिता की पढ़ाई कीऐसा क्यों?

जर्नलिज्म में मैं इसलिए आया क्योंकि मैं अच्छा डिबेटर था और कुछ 'ऑफ द बीट' करना चाहता था। ये प्रवृति अभी भी मुझमें है। अभी हाल ही में मैंने अपनी किताब 'कूड़ाधनलिखी। ये बिलकुल एक ऐसा विषय हैजिस पर अमूमन पत्रकार लिखते नहीं है। वैसे जब मैं किशोरावस्था में साइंस का स्टूडेंट था और तब मुझमें पत्रकारिता की गहरी रुचि थी। हालांकि उस समय पत्रकारिता ग्लैमर वाला पेशा नहीं थाटीवी पर चमकने का मौका नहीं होता था। हम बाइलाइन लेने के लिए तरसते थे और सोचते थे कि हमारे एडिटर हमको बाइलाइन देंगे या नहीं। तब इसके लिए हम संघर्ष करते रहते थे।

उस दौर में लोग पत्रकारिता में नहीं आते थेफिर आप कैसेक्या कोई पारिवारिक बैकग्राउंड है?

नहींमेरी पूरी फैमिली के लोग टीचर हैं या फिर टेक्नोक्रैट। सिर्फ मेरी एक बहन अब जर्नलिज्म में आई है। रही बात पत्रिकारिता में आने कि तो बताना चाहूंगा कि उस समय मैं अच्छा बोलता थाअच्छा लिखता था। मैंने कॉलेज के दिनों में ही मध्य प्रदेश के प्रतिष्ठित अखबारों जैसे नईदुनियादैनिक भास्कर के लिए लेख लिखना शुरू कर दिए थे। तब मैं ग्रेजुएशन कर रहा था। मुझे न्यूजरूम थोड़ा-थोड़ा समझ आने लगा था और उससे एक हद तक मुझे प्यार हो गया था। उसके बाद मैंने पत्रकारिता करने का निर्णय लिया, संस्थान के तौर पर आईआईएमसी को चुना क्योंकि आईआईएमसी की एक साख है। तब न तो इंटरनेट थान करियर काउंसलिंग थीन किसी तरह का गाइडेंस था। तब सोचा यहां जाना चाहिएइसलिए एंट्रेस एग्जाम दिया और पहली बार में ही एडमिशन हो गया। दिलचस्प बात है कि आईआईएमसी के एंट्रेस टेस्ट के बारे में एक अखबार से पता चला, जिसमें किसी दुकानदार ने मुझे कुछ सामान लेपेटकर दिया था।  दिल्ली आप पहली बार कब आए?

दिल्ली में पहली बार मैं तब आयाजब मेरा एडमिशन हो गयाक्योंकि मेरा एग्जामिनेशन सेंटर लखनऊ में था।

आईआईएमसी और दिल्ली में आपने पहली बार कदम रखातो मन में एक हिचक रही होगी?

पहले मैं नदी में तैर रहा थाफिर मैं समुद्र में आ गया। नदी की तुलना में समुद्र में आदमी के बह जानेगुम हो जाने की संभावनाएं बहुत ज्यादा होती हैं। तब मुझे भी लगा था क्या मैं लहरों के साथ आगे बढ़ पाऊंगा या नहीं। लेकिन वो तीन शब्द- लिखनापढ़ना और सीखना मेरे लिए मूलमंत्र रहे हैं। लिख कहीं भी सकते हैंपढ़ कहीं भी सकते हैं और सीख भी आप कहीं से भी सकते हैं। मैंने अपनी इसी सोच को फॉलो किया फिर ‘नवभारत’ जैसे बड़े अखबार का हिस्सा बन गया।

आईआईएमसी में आप बाहर से आएं हैं और कई स्टूडेंट दिल्ली के हैं, ऐसे में क्या कुछ अनकंफर्टेबल रहे  

नहीं,ऐसा तो कुछ नहीं लगा,क्योंकि मेरे अंदर एक लीडरशिप क्वॉलिटी थी और इसकी वजह से मैं उस भीड़ में भी अपनी एक पहचान बना लेता था।     

दिल्ली में पहला दिना आपने कैसा किया?

इसके लिए मैं आपको छोटा सा किस्सा सुनाता हूं। जब मैं पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उतरामुझे अपने पारिवारिक रिश्तेदार के घर जाना था, उनका पता था शायद कूंचा उस्ताद हीरा मैदान गली गुलियान (अब ठीक से याद नहीं) मैंने एक रिक्शेवाले से चलने के लिए पूछातो उसने कहा पचास रुपए लगेंगे। मैंने कहा ठीक है। बाहर आया तो उसने पांच-दस कदम पर लाकर छोड़ दिया और पचास रुपए भी ले लिए। तब मुझे समझ आ गया कि दिल्ली कितनी खतरनाक और जालिम है।

अपने करियर ग्राफ के बारे में कुछ बताइए?

लगभग 6 महीने मैंने 'लोकस्वामी' में काम किया। फिर मुझे मध्य प्रदेश के नवभारत ग्रुप ने ब्रेक दिया और उसके दिल्ली ऑफिस में जुड़ गया। यहां मैं करीब साल- सवा साल रहालेकिन एक दिन मैंने ऐसे ही अचनाक नौकरी छोड़ दी। तब मेरे पास कुछ नहीं था। बस मेरे पास उस वक्त पॉलिटिकल खबरों को खोजने की ताकत और पक्के सूत्र थे। तब मुझे मालूम पड़ा कि न्यूजट्रैक कुछ हायरिंग कर रही है और मेरे जानने वाले भी एक न्यूजट्रैक में थे। उनको रिपोर्टर की सख्त जरूरत थी। तब तक रिपोर्टिंग के जरिए इतनी पहचान बना चुका था कि नेता जानने-पहचानने लगे थेइसलिए पॉलिटिकल सर्कल में एक्सेस में तो दिक्कत नहीं थी और न्यूजट्रैक को भी ऐसे एक्सेस वाला रिपोर्टर चाहिए थे। बस फिर क्या उनके साथ जुड़ गया।

यहां हर तरह की खबरों की जानकारी मिल जाती थी। यहीं से मैंने अपने कैनवास को बड़ा किया और राष्ट्रीय खबरों के साथ-साथ राज्यों की खबरों पर भी नजर रखनी शुरू की। शुरुआत में ये हाल था कि मैं लगभग तीन-चार अखबारों का हर पेज पूरा पढ़ता था और यहां तक कि हर अखबार की प्रिंट लाइन तक पर मेरी नजर रहती थी। 

अखबार पढ़ने के पीछे उद्देश्य ये होता था कि यदि मैंने बीजेपी नेशनल एग्जिक्यूटिव की कोई रिपोर्ट लिखी है, तो दूसरे अखबार के रिपोर्टर ने वो खबर कैसी लिखी है और मैं उसकी खबर से क्या सीख सकता हूं। न्यूजट्रैक में मैं करीब 8 महीने रहाइसके बाद मैं टीवी मीडिया में आ गया और आजतक चैनल को लॉन्च करने वाली टीम का मेंबर बना। मैं आजतक की फाउंडर टीम का हिस्सा था। हम पांच लोगों ने वे पहला कैसेट बनाया थाजो 'आजतकशो के नाम से चला था। उस टीम में वरिष्ठ पत्रकार अजय चौधरी (जिनका दुर्भाग्यवश निधन हो चुका है)मृत्युंजय कुमार झाअल्पना किशोर और एस.पी. सिंह (जिन्होंने शो को एंकर किया था) और मैं था। 

ये वे दौर था जब एक तरफ दूरदर्शन पर 'आजतकआयातो दूसरी ओर प्रणॉय रॉय का ‘द न्यूज टू नाइट’ आया और दोनों के बीच कॉम्पिटशन बढ़ गया। फिर जैसे-जैसे 'आजतक बढ़ता रहा है वैसे-वैसे उसका परिवार बढ़ता रहा। लेकिन शुरुआती दौर में रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी अकेले मुझ पर ही थी। मुझे याद है जब पहला टेप बना था तो उस टेप में पांचों स्टोरी मेरी ही थीं।  हमने जो टेप बनाया था वो ‘देश दिनांक’ नाम से बनाया था। बाद में सवाल उठा ‘देश दिनांक’ क्या हैफिर नाम चेंज हुआ और ‘आज’ नाम दिया, लेकिन ‘आज’ नाम हम ले नहीं सकते थे क्योंकि आज नाम से एक अखबार निकलता था। नकवी जी जब जॉइन करने वाले थे तो उससे पहले ही उन्होंने फैक्स के जरिए नाम भेजा और कहा इसे देखिए। ‘आजतक’ का जो नाम दिया गया थावो कमर वहिद नकवी ने दिया था। हम तो ‘द न्यूज टू नाइट’ का हिंदी ट्रांसलेशन कर रहे थे। तब वे हमारी टीम के साथ ऑफिशियली जुड़े नहीं थेलेकिन कुछ दिनों बाद ही वे भी आजतक का हिस्सा बन गए थे। इस नाम को सबने पसंद किया और उसके बाद वे डेस्क से जुड़े।

आजतक के साथ आपकी कितनी लंबी पारी रही?       

बहुत लंबीमैंने 2003 में आजतक को छोड़ा और 1995 में आजतक डीडी पर लॉन्च हुआ थातब 20 मिनट का बुलेटिन होता था। 2001 में आजतक पूरी तरह से चैनल के रूप में लॉन्च हुआ। 1995-96 के दौरान पॉलिटकल क्राइसेस बहुत ज्यादा थींलोग टीवी से चिपक कर बैठे रहना चाहते थे। फिर 2003 में मैंने डीडी जॉइन कियावो भी बहुत न्यूजी दौर था। जैसे-सोनिया गांधी का प्रधानमंत्री का पद छोड़ना आदि। तब हमें पीस-टू-कैमरा नहीं आता थाहमें बाइट लेनी नहीं आती थी। यहां रहकर मैंने टीवी से जुड़ी हर चीज सीखी। मैंने बहुत घिस-घिसकर टीवी रिपोर्टिंग सीखी। टीवी टुडे नेटवर्क ने कई बार कुछ विदेशी टीवी एक्सपर्ट्स के साथ हमारे इंटरैक्शन कराएचैनल शुरू होने के बाद भी ये क्रम चलाकुछ ऑस्ट्रेलिया और अमेरिकन एक्सपर्ट्स के साथ सेशन कराए। जब 2003 में मैं इराक गयाउससे पहले तक मैं दुनियाभर की रिपोर्टिंग कर चुका था और 2001 में जब 9/11 हमला हुआ तब मैं अमेरिका भी गया था। मैंने करगिल वॉर को छोड़कर 1995 के बाद शायद ही कोई ऐसी घटना हो जिसे मैंने कवर न की होफिर चाहे वो पॉलिटिक्ल होडिप्लोमेटिकल या फिर टेरिस्ट से जुड़ा मुद्दा। 

जैसा आपने कहा कि आपने 1995 के बाद से अधिकांश बड़ी घटनाओं को कवर कियातो फिर करगिल वॉर कवर क्यों नहीं किया?  

हांमैंने बहुत एक्सपेरिमेंट किए हैं। 1995 के बाद से दुनिया की कोई ऐसी बड़ी त्रासदी नही हैजिसे मैंने कवर न किया हो। करगिल वॉर के पहले और बाद की घटनाओं को मैंने कवर कियालेकिन वॉर को नही किया और ऐसा इसलिए क्योंकि उस समय मैं शादी की छुट्टियों पर था।  

उस दौर में आजतक एक अकेला बड़ा ब्रैन्ड था और इसे आप छोड़कर डीडी आ गएक्या आपको कभी नहीं लगा कि उस समय आप सरकारी प्रवक्ता बन जाएंगे?

मैं ये मानकर नहीं गया था कि मैं वहां के ढर्रे को अपनाऊंगा। उस समय मेरी सोच बिल्कुल स्पष्ट थी। पहली ये कि मैं किसी भी तरह की फाइनेंशियल डील का हिस्सा नहीं बनूंगा। दूसरा-किसी ऐसी फाइल पर हस्ताक्षर नहीं करुंगा जिसके बारे में मुझे समझ नहीं है और तीसरा-प्रफेशनलिज्म के साथ काम करूंगा और काम करने के लिए मुझे प्रफेशनल सोच वाली टीम चाहिए। शायद मैं इकलौता बाहर से आया एडिटर थाजो पूरी तरह से न्यूजरूम कंट्रोल करता था। मैंने जो प्रयोग डीडी में 2003 में किएउन्हीं प्रयोगों से ही या उन्हीं प्रोगाम्स को रिपीट करने की वजह से आज भी डीडी को टीआरपी मिल जाती है। मेरे बाद कई बड़े-बड़े लोग डीडी में आए और गएलेकिन डीडी का फॉर्मेट नहीं बदला। 2003 में उदय शंकर जी मुझे फोन कर कहते थे कि तेरे चैनल ने मुझे हिला रखा है। तब हम नंबर-2 पर थे। हम नीचे भी गिरे और फिर नंबर-2 पर पहुंचे। जब मैंने डीडी छोड़ा तब हम नंबर-2 पर थे।

डीडी में आपने कितनी लंबी पारी खेली?

मैं डीडी में मात्र 11 महीने ही रहा। सरकार बदल गईजिसकी वजह से मुझे भी बदल दिया गया।  

तो क्या आपको उस समय लगा कि डीडी जाना आपका गलत फैसला था?       

देखिएजिंदगी में हर इंसान फैसले लेता हैपर ये बाद में ही पता चलता है कि ये फैसला सही है या गलत। लेकिन मैंने तो हर बार शून्य से ही शुरू किया है। मेरे करियर में कई बार ऐसे उतार-चढ़ाव आएजहां मुझे फिर से सबकुछ शुरू करना पड़ा। यही दीपक चौरसिया बनने की कहानी हैजिसमें डीडी का भी हाथ हैं। मेरी पागलों की तरह मेहनत करने का भी हाथ है और कई बड़ी घटनाओ को कवर करने के मौके भी मिलते चले गए।

जिस दौरान आप डीडी गएतब वहां के लोग बीजेपी के क्लोज माने जाते थेऐसा कई लोगों ने आपसे कहा भी होगा?

देखिएकोई कुछ भी कहे उससे मुझे इन सब बातों कोई मतलब नहीं है, न इनका मुझ पर कोई फर्क पड़ता है। उस समय मैं बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही बीट कवर करता था। मैंने दोनों ही पार्टियों को फेयर ट्रीटमेंट दिया। इसलिए मुझसे ये कहा जाता था कि तुम कुछ जरूरत से ज्यादा ही प्रोफेशनल हो गए हो। लेकिन 2004 में मैं फिर आजतक आ गया था और फिर मैंने एक लंबी पारी खेली।

किन चैनलों में आपने किन-किन पदों पर काम किया?

मैंने न्यूज चैनल (आजतक) में एक ट्रेनी रिपोर्टर से अपना करियर शुरू किया था और पहली पारी में आजतक के साथ अपना सफर पॉलिटिकल एडिटर पर खत्म किया। इसके बाद मैं डीडी में कंसल्टिंग एडिटर के तौर पर जुड़ा। फिर आजतक के साथ दूसरी पारी में मैं एग्जिक्यूटिव एडिटर बनकर आया। आजतक के साथ की दोनों ही पारियों का अनुभव बहुत ही अच्छा रहा।

आप ‘टिकटैक’ शब्द सुनते होंगेइसकी खोज मैंने ही की थी। उस समय हम दो कैमरे से शूट करते थे, उसे शूट करने में सुबह से रात हो जाती थी। तब मैंने सोचा एक ही कैमरे से क्यों न किया जाए। उसमें आपको माइक पकड़ना हैसामने वाले को खड़े रखना हैचार सवाल पूछने हैउससे ज्यादा सवाल टीवी पर चलने नहीं होते थे। बिना एडिट के सीधे लाइव प्ले कर दोजो ऑन-एयर जाएगा। जितने भी एक्सपेरिमेंट हैं फिर चाहे वह वॉयस ओवर को ऑडियो देना होस्क्रीन शॉट के साथ फोनो देना हो आदि मैंने ही शुरू किया था। फोनो तो होता था लेकिन लाइव विजुअल के साथ फोनो का प्रयोग मैंने आजतक में गुजरात से किया थाजिसे जनता ने काफी पसंद भी किया। इराक वॉर पर जब मैं वहां गया तब हमारी टीआरपी होती थी 6568 या 70यानी मार्केट शेयर का 70 प्रतिशत। बाद में और चैनल आएकम्पटीशन बढ़ाफिर टीआरपी टूटी और सभी की टूटी। मीडिया इंडस्ट्री के अंदर 90 प्रतिशत लोग आजतक की ही पैदाइश हैं।

आजतक की दूसरी पारी के बाद आप कहां गए?

आजतक के साथ मैंने अपनी दूसरी पारी 2008 तक खेली। इसके बाद मैं स्टार न्यूज (अब एबीपी न्यूज) गया और यहां 2013 तक रहा। यहां मेरा पद एडिटर (नेशनल अफेयर्स) का था। 2013 के बाद मैं आईटीवी नेटवर्क से जुड़ा।

तब स्टार न्यूज में आपकी बड़ी कामयाबी क्या रही?

उस दौरान भी बहुत एक्सपेरिमेंट किए। ‘जो कहूंगासच कहूंगा’ नाम से शो शुरू किया। इस समय जो शो चलते हैं जैसे ‘राजतिलक’, ‘किस्सा कुर्सी का’। इन सबका जनक उस समय का स्टार न्यूज ही था। इन शोज के लिए उत्तर-प्रदेश और उत्तराखंड के 2012 के चुनाव में मैंने लगातार 80 दिनों में 80 शो किए थे और वह भी अनगनित स्टोरीज के साथ। लोगों ने भी इन शो को काफी पसंद किया और आज भी करते हैं। आज भी चुनावों को दौरान न्यूज चैनल यहीं फॉर्मैट फॉलो कर रहे हैं। 

जिस वक्त आईटीवी लॉन्च हो रहा था, इसके साथ जु़ड़ना बड़ी रिस्की फैसला थीा।  डीडी न्यूज के गलत फैसले से भी क्या आप बाहर निकल पाए थे?   

सनक थी एक दिमाग में कि फिर से खुद को साबित करना है और करके भी दिखाया। अब काम पूरा हो गया। 25 साल हो गए पत्रकारिता को। इतना काम कर लिया है कि कभी-कभी 45 साल की उम्र में 60 साल का हो गया हूंऐसा लगता है।

तमाम ऐसे संपादक हैं जो आज खुद को मीडिया से दूर रखते हैं और इस फील्ड को लेकर अच्छी टिप्पणी नहीं करते हैं। काफी इनसिक्योर फील्ड कहते हैं इसे। 25 साल बाद आप मीडिया को कैसे देखते हैंक्या आपको कोई अफसोस होता है

नहींमुझे कोई अफसोस नहीं होता है। यही मेरी रोजी-रोटी है। जब मैं यहां काम करने के लिए आता हूंएक अच्छी स्टोरी करता हूं तो मुझे बहुत सुख मिलता है। जिस दिन मेरी स्टोरी अच्छी नहीं होती हैमेरा शो अच्छा नहीं जाता है उस दिन मैं बहुत ही खराब मूड में आ जाता हूं। लेकिन मैं अपने दर्शकों को कैसे समझाऊं कि मैं साल के 365 दिन एक ही तरीके से न तो दिख सकता हूंन बोल सकता हूं और न ही एक ही एक ही स्टाइल के साथ रोज सवाल दाग सकता हूं। 

और कभी-कभी तो एक ही दिन में इतना वैरिएशन होता है कि दिमाग को कई बार ऑन-ऑफ करना पड़ता है। जैसे दिल्ली चुनाव के दौरान एक ही दिन में मुझे तीन इंटरव्यू करने थे अरविंद केजरीवालअमित शाह और अमिताभ बच्चन का। तो सोचिएमैंने अपने आपको कितनी बार स्विच ऑन-ऑफ किया होगा। हांमुझे अभी भी जर्नलिज्म में वही मजा आ रहा हैजो पहले आता था। हां, ‘इन-सिक्योरिटी’ आधे से ज्यादा पत्रकारों में होती है और ये हर प्रोफेशन में होती है। लेकिन ये शब्द मेरे मन में कभी नहीं आया। हांहो सकता है कि जो मेरे साथ काम करते हों उसके मन में ये बात रही हो।

लोग कहते हैं दीपक चौरसिया अब फिजकली फिट नहीं है?

हांकहते होंगे लोगपर एक इंसान के तौर पर हर आदमी कभी न कभी बीमार होता है। लेकिन इसके बावजूद भी मैं आज 16 से 18 घंटे तक काम करता हूं। कई बार रूकना भी पड़ जाता है। दूसराये कि मेरा एक बड़ा एक्सिडेंट भी हुआ थाजिसने मुझे लाइफ में काफी पीछे ढकेला। मैं डायबटिक हूं पर काम के प्रति पूरी ईमानदारी बरतता हूं और इसकी जानकारी आप मेरे न्यूजरूम से ले सकते हैं। हांबीच में कभी-कभी ऐसे फैसले आते हैं कि आदमी लो फील करता हैतब शायद मैं लोगों से न मिल पाउं और कुछ समय एकांत में चला जाउंलेकिन ये मेरा व्यक्तिगत निर्णय होता है।

लेकिन जो बात आप सुनते हैउसमें कई लोग नमक-मिर्च लगाकर भी आपके सामने पेश करते हैं, उसका तंदूरी-चिकन बना देते हैं। इसलिए मैं चाहूंगा कि उनका तंदूरी-चिकन लोग न खाए बल्कि सीधा मुझे ही फोन कर लें।   

दरअसलइंटरनेट पर आपको लेकर कई तरह के गॉशिप्स चलते हैं?   

देखिएइंटरनेट में गॉशिप ये भी है कि मैं 500 रुपए कमाता था और 5000 करोड़ का मालिक हूं। लेकिन मैं ये कह रहा हूं कि जो आदमी ये लिख रहा है वो मुझे 5000 करोड़ में से एक-दो करोड़ या फिर कुछ तो देकर चला जाए। हांऐसा एक बार चक्रपणि महाराज ने बोला था कि मेरे कप में ड्रिंक रहती है। दरअसल मैं अपने कप में फीकी गर्म चाय रखता हूंक्योंकि मेरे गले में प्रॉब्लम रहती है और यह मुझे राहत पहुंचाती है। और वैसे भी मुझे गर्म पानी पीना अच्छा नहीं लगता है।

इस तरह की गॉशिप्स जब इंटरनेट पर पढ़ते होंगे तो क्या आपको दुख तो होता है?

वैसे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं उन लोगों को जानता हूं कि जो मेरे प्रति इस तरह की धारणा क्रिएट करवाते हैं और मुझे पता है कि वो ऐसा क्यों करते हैं?   

शुरुआती दौर में आप पर जोक बनते थेआज खैर सभी पर बनते हैं। लेकिन तब आपको कैसा लगता थाक्या लगता था कि कोई आपको टार्गेट कर रहा है?

जोक एक ह्यूमर है और मुझे ह्यूमर से कोई फर्क नहीं पड़ता। न तो ह्यूमर और न ही रयूमर (Rumour) से कोई फर्क पड़ता है। मैंने तो ये भी सुना है कि नील आर्मस्ट्रॉन्ग जब चांद पर गएतो उन्हें वहां दीपक चौरसिया मिले थे।

पिछले कुछ वर्षों से हम राष्ट्रवादी और गैरराष्ट्रवादी की जो पत्रकारिता देख रहे हैंइस पर आप क्या कहना चाहेंगे?

देखिएइस पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करूंगा। इसका कारण यह है कि हर एडिटर की अपनी इंडिविजुअल चॉइस है कि वह अपने चैनल को किस तरह से चलाना चाहता है और उसका अपना एक एडिटोरियल नजरिया रहता है। इसलिए मैं न तो इस डिबेट में पड़ना चाहता हूं और न ही फंसना चाहता हूं।

सोशल मीडिया के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?

देखिएमीडिया की तरह सोशल मीडिया भी एक दोधारी तलवार है। उनको एक कैरेक्टर उठाना रहता हैजिसे वो हीरो बनाते है और फिर उसी हीरो को धीरे-धीरे गिराते हैं। फिर एक नया हीरो बनता है और फिर एक नया हीरो गिरता है। जैसे हर दौर मे नायक और महानायक उभरते हैंठीक वैसे ही सोशल मीडिया करता है। यह समाज के लिए कोई अपवाद नहीं है।

जो खबरें टीवी से ब्रेक होनी चाहिएवो अब डिजिटल से हो रही हैंतो ऐसे में क्या मेनस्ट्रीम मीडिया के लिए चुनौती है?    

बिल्कुल भी नहींऔर वैसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। डिजिटल मीडिया हमें थोड़ी सतही जानकारी देता हैजबकि टीवी आपको विजुअल्स के जरिए असली घटनाओं से रूबरू कराता है। दोनों में बहुत अंतर है।

टीवी पर अब हमेशा ये आरोप लगता है कि वह ‘शैलो जर्नलिज्म’ करता है फिर चाहे वह आसाराम का मामला होहनीप्रीत या श्रीदेवी की मौत पर रिपोर्टिंग ही क्यों न होइस पर आपकी राय क्या है?

मैं नहीं मानता कि टीवी ‘शैलो जर्नलिज्म’ करता है। प्रिंट के संपादक यदि ऐसा बोलते हैं तो वो बोलने के लिए स्वतंत्र हैं। टीवी जर्नलिस्ट जो करता है वो अगर प्रिंट के जर्नलिस्ट को करना पड़े तो उनकी हालत खराब हो जाए। हम जब नरेंद्र मोदी और यूएस प्रेजिडेंट ट्रंप की बातचीत को कवर करने जाते हैं तो सुबह से खड़े रहते हैं। मुलाकात हुईक्या बात हुई इसके लिए 10-1012-12 घंटे खड़े रहते हैं, क्या इसे आप ‘शैलो जर्नलिज्म’ कहेंगे?

फिर तो चैनल वाले आमिर खान की शादी में भी 10-10 घंटे खड़े रहते हैंतो इसे आप क्या कहेंगे?

ये व्यक्तिगत चॉइस है चैनल की। हमने ऐसे कामों के लिए मना किया है। ऐश्वर्या राय को जब बेटी हुई थीतो एक भी चैनल नहीं गया उसे कवर करने। जो गलतियां हुईं थीं उसे ब्रॉडकास्ट मीडिया ने सुधारा है। लेकिन मैं फिर भी मानता हूं कि एक सेलेब्रिटी की शादी न्यूज है। अगर ऐसा नहीं है तो फिर इंटरनेट पर किस-तिस तरह की पिक्चर्स के आधार पर न्यूजगैलरीज बनती हैंक्यों बनती हैं मैं इस पर सवाल नहीं करूंगालेकिन किस तरह की बनती हैं ये सवाल है? इंटरनेट पर किस तरह की टिप्स स्टोरीज चलती हैं? कौन सी टिप्स सबसे ज्यादा पाठक पढ़ते हैं? यह सभी जानते हैं। इसलिए यहां कहना चाहूंगा कि गिराना बहुत ही आसान हैजो लोग किसी को गिराने की कोशिश करते हैंवो बहुत ही आसान काम हैलेकिन फिर से खड़ा होना और निरंतर खड़े रहना बहुत मुश्किल काम है।

आसाराम के मामले में आपके चैनल ने एक स्टैंड लिया और एक मुहिम की तरह चलायाऐसा क्यों?

मैंने आसाराम पर ही नहीं, राम रहीम पर भी स्टैंड लिया। ये मेरा एडिटोरियल जजमेंट हैंक्योंकि एक तथाकथित संतजो अपने आश्रम में रहने वाली छोटी सी बच्ची के साथ यौन शोषण करता है, उसके खिलाफ जीरो एफआईआर होती है। उसको कोई कोर्ट बेल देने को राजी नहीं है। फिर भी उसके फेवर में लोग खड़े होते हैंउसके खिलाफ लोग खड़े होते हैं। इस पर मैंने एक बहस कराई तो इसमें मैंने कौन सा अन्याय कर दिया। आसाराम को चाहिए था कि वे अपने लोगों को भिजवातेअपने को डिफेंड करवा पाते। मेरी कोई भी डिबेट उठाकर देख लीजिएउसमें किसी में ऐसा नहीं है कि आसाराम से जुड़ा हुआ कोई आदमी उस डिबेट में बैठा न हो। अगर कोई गलत चीज हो रही हो तो उसके खिलाफ कैंपेन चलाना क्या सही नहीं हैक्या मीडिया की ये जिम्मेदारी नहीं है कि समाज के गलत लोगों को समाज के सामने सही आईना दिखाएंअगर ऐसा नहीं है तो देश की सबसे बड़ी सभा अखाड़ा परिषद क्यों तथाकथित साधुओं को निकाल रही है एक के बाद एक?

सरोकार का पत्रकारिता को आप किस तरह देखते हैं?

सरोकार और परोपकार मुझे जर्नलिज्म में तो समझ में नहीं आता हैक्योंकि ये सिर्फ बड़ी-बड़ी बाते हैं। जर्नलिज्म, जर्नलिज्म होता है और वो एक होता है। जर्नलिज्म में सिर्फ एक चीज होनी चाहिए कि How to inform people और कुछ नहीं। जरूरी नहीं कि जो मैं सोचता हूं, वो मेरा व्युअर्स भी सोचते हों। वो मुझसे 10 चैनल ज्यादा देखकर10 चीजें अधिक सोचकर अपना ओपिनियन बनाए बैठा होता है, इसलिए व्युअर्स को इतना मूर्ख न समझें।

कहा जा रहा है कि टीवी एडिटर्स ओपिनियन मेकर्स बन गए हैंइस पर आपकी क्या कहना चाहेंगे?

देखिएहम ओपिनियन नहीं बनाते हैं। हम एक विषय को लेकर खड़े हो सकते हैं। हम एक विषय को डिबेट में कनवर्ट कर सकते हैं। हम एक विषय पर बात कर सकते हैं। कोई एडिटर अपनी एडिटोरियल लाइन दे सकता हैलेकिन अंतिम फैसला तो व्युअर्स को करना हैजनता को करना है।

दूसरे संपादकों की तरह आप सोशल मीडिया पर इतने एक्टिव क्यों नहीं है?

आप क्या चाहते हैं कि मैं भी सोशल मीडिया पर किसी की अमर्यादित आलोचना करूंकिसी की बुराई करूंकिसी पर व्यक्तिगत टिप्पणी करूंकिसी के बारे में ऊल-जलूल लिखूं। मैं वो नहीं कर सकता। आप ये भी मान सकते हैं कि शायद मुझमें ये सब करने के विचार ही नहीं है। आपस में झगड़ने के अलावा बड़े-बड़े पत्रकार सोशल मीडिया पर करते क्या हैं?

आपकी बात अपनी जगह ठीक हैलेकिन अगर कोई गलत हैतो क्या आप सोशल मीडिया परउसकी आलोचना नहीं कर सकते हैं?

आलोचना करने के लिए मेरे पास टीवी का प्लेटफॉर्म है। वो (चैनल) जो कह रहा हैसोशल मीडिया भी मैं वही कहता हूं। मेरे टीवी और सोशल मीडिया पर विचारों में कोई अंतर नहीं है। मैं यहां कुछ कहूं और वहां कुछ और लिखूं तो मैं ये दोहरी बात नहीं कर सकता।

इंटिग्रेटेड न्यूजरूम के कॉन्सेप्ट को किस तरह से देखते हैं?  

अच्छा कॉन्सेप्ट हैयदि लोग आपस में सहयोग भावना से काम कर सकेटीम भावना से काम कर सकेंतो मुझे नहीं लगता कि इसमें कोई बुराई है।

इन सब चीजों के बीच आपकी फैमिली कितना सफर करती है?

फैमिली की बात न करें तो ज्यादा अच्छा होगाक्योंकि वाकई यहां तो मैं न्याय नहीं कर पा रहा हूं। जब मैं घर पहुंचता हूं तो दोनों बेटियां सो रही होती हैं और जब मैं उठकर घर से निकलता हूं तो दोनों बच्चियां स्कूल जा चुकी होती हैं। हमने न तो अपनी फैमली को टाइम दियान ही खुद को टाइम दिया। टाइम दिया तो सिर्फ काम को। जो लोग फिटनेस से लेकर, मेकओवर करते रहते हैंवो लोग दिन में कितने घंटे काम करते हैंकितना कर पाते हैंवो पता कर लीजिएगा।

पत्रकारिता में आगे बढ़ने के लिए तीन टिप्स क्या है?

पढ़नालिखनासीखना और फिर आगे बढ़नायहीं तीन चीजें बहुत जरूरी हैं।

 

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