पढ़िए, संदीप सिंह के पत्रकार से 'सरबजीत' के प्रड्यूसर बनने तक का सफर

Wednesday, 18 May, 2016

फिल्म पत्रकारिता से फिल्म प्रोडक्शन तक का सफर तय करने वाले प्रड्यूसर संदीप सिंह कम समय में ही अपना नाम कई बड़ी फिल्मों से जोड़ चुके हैं। हिंदी दैनिक ‘नवभारत टाइम्स’ की पत्रकार उपमा सिंह ने उनका इंटरव्यू किया, जिसे अखबार ने प्रकाशित किया, जिसमें उन्होंने अपनी अपकमिंग फिल्म ‘सरबजीत’ और पत्रकार से फिल्म प्रड्यूसर बननें के सफर के बारे में बताया। उनका पूरा इंटरव्यू आप यहां भी पढ़ सकते हैं:

  • आपका पत्रकार से फिल्म प्रड्यूसर बनने तक का सफर कैसा रहा?
मैंने अपना करियर नवभारत टाइम्स से ही शुरू किया था। साल 2000-2001 के दौरान मैं एनबीटी में फिल्म जर्नलिस्ट था। फिर रेडियो मिर्ची और दूसरे रेडियो स्टेशन्स में जॉब किया। फिर संजय लीला भंसाली सर ने मुझे जॉब ऑफर की, तो मैं उनकी प्रोडक्शन कंपनी का सीईओ बन गया। उनके साथ 'रामलीला', 'राऊडी राठौड़', 'मैरी कॉम' जैसी फिल्में बनाई। फिर मैंने अपनी प्रोडक्शन कंपनी शुरू कर ली। दरअसल, मुझे शुरू से ही डायरेक्टर बनना था, लेकिन मैं कोई इंडस्ट्री का लड़का तो था नहीं। मैं तो बिहार के मुजफ्फरपुर का था। मेरे पास न पैसा था, न सरनेम था। मुझे तो मेहनत करनी थी और मैंने वही किया। पहले मुझे अपना घर चलाना था, इसलिए मैं ट्यूशन टीचर बन गया। फिर जर्नलिज्म किया और कहानी आगे बढ़ती गई।
  • माना जाता है कि प्रड्यूसर्स को सबसे ज्यादा चिंता पैसों की होती है। ऐसे में 'अलीगढ़' और 'सरबजीत' जैसी फिल्में प्रड्यूस करना आपको रिस्की नहीं लगा?
ये एक भ्रम है। मैं उन फिल्मों को प्रड्यूस करता हूं, जिनमें मैं यकीन करता हूं। एक प्रड्यूसर के तौर पर मेरा काम सही फिल्म के लिए सही बजट और सही कास्ट अरैंज करना और फिर उस फिल्म को सही समय पर तैयार करवाना होता है। बजट का मामला मैं फिल्म प्रेजेंटर पर ही छोड़ देता हूं।
  • 'सरबजीत' का बीज कब और किसने रोपा?
यह फिल्म मेरी किस्मत में ही थी, क्योंकि पहले कई लोग इसे बनाने की कोशिश कर चुके थे। सुभाष घई भी इसे बनाना चाहते थे, लेकिन तब भी नहीं बनी। फिर मैंने पता किया कि इसके राइट्स किसके पास हैं। उनसे फिल्म के राइट्स खरीदे। फिर मैं ओमंग के पास गया, तो पहले ओमंग ने फिल्म डायरेक्ट करने से मना कर दिया, क्योंकि वो दोबारा बायोपिक डायरेक्ट नहीं करना चाहते थे। जैसे-तैसे उन्हें मनाया। फिर ऐश्वर्या के पास गया, तो उन्होंने 'हां' बोल दिया। इस तरह गाड़ी आगे बढ़ती चली गई।
  • पहले इस फिल्म के डायरेक्टर के तौर पर हंसल मेहता और एक्ट्रेस के लिए कंगना रनौत का नाम सामने आया था। फिर सब बदल कैसे गया?
देखिए, अच्छी चीज से सब जुड़ना चाहते हैं, लेकिन मैं इस फिल्म के लिए कंगना या प्रियंका में से किसी के पास नहीं गया। फिल्म के डायरेक्टर के लिए मैंने केवल ओमंग को अप्रोच किया था। वहीं दलबीर कौर के रोल के लिए मैं सिर्फ ऐश्वर्या के पास ही गया था।
  • वाघा बॉर्डर पर फिल्म की शूटिंग के दौरान आप लोगों को परमिशन लेने में भी दिक्कतें झेलनी पड़ी। क्या-क्या और चैलेंज सामने आए?
सबसे बड़ा चैलेंज था फंड जुटाना। फंड के लिए मैं सबके पास गया। आप जिन भी स्टूडियोज का नाम सोच सकती हैं, उन सबके पास गया। किसी को यकीन नहीं था इस फिल्म पर। स्टूडियोज को सिर्फ कमर्शल सक्सेस और स्टारकास्ट से मतलब होता है, जबकि पब्लिक ने बता दिया है कि वो अब 'क्वीन', 'कहानी', 'मसान' और 'पीकू' जैसी फिल्में देखना चाहती है, जबकि दूसरी तरफ 'तेवर' जैसी फिल्म पिट जाती हैं। शूटिंग में थोड़ी दिक्कतें आईं, पर हमने अपने तय शेड्यूल के तहत 50 दिनों में शूटिंग पूरी कर ली।
  • दलबीर के रोल के लिए ऐश का सिलेक्शन थोड़ा हैरान करता है। आपको इस रोल के लिए ऐश ही क्यों सही लगी?
ऐश बेशक हमारी इंडस्ट्री की सबसे खूबसूरत एक्ट्रेस हैं, लेकिन इसी ऐश ने 'चोखेर बाली' और 'रेनकोट' जैसी फिल्में भी की हैं। ऐश को इस रोल में देखना ऑडियंस के लिए भी एक सरप्राइज होगा। अगर मैं तब्बू या कंगना को इस रोल में लेता, तो लोगों को ये नॉर्मल बात लगती क्योंकि ये दोनों ही ऐसी फिल्मों या किरदारों के लिए जानी जाती हैं। खुद ऐश भी इस रोल को लेकर शुरू में डरी हुई थीं। मैंने उन्हें काफी समझाया और बाद में उन्होंने अपने रोल पर बहुत मेहनत भी की।
  • फिल्म इंडस्ट्री इन दिनों अच्छे राइटर्स की कमी का रोना खूब रो रही है। शाहरुख जैसे बड़े स्टार्स भी कह रहे हैं कि बॉलिवुड में अच्छी स्क्रिप्ट्स की कमी है?
मेरा अनुभव इसके बिल्कुल उलट है। असलियत ये है कि अच्छी स्क्रिप्ट लिखने वाले इन स्टार्स तक पहुंच ही नहीं पाते। इंडस्ट्री के ज्यादातर सुपरस्टार्स केवल दोस्तों और रिश्तेदारों की फिल्में ही करते हैं। नए लोगों को उन्हें अपनी कहानी सुनाने का मौका ही नहीं मिल पाता। मैं तो चाहता हूं कि ये स्टार्स अच्छे सिनेमा पर यकीन करें। नए लोगों को चांस दें। मैं चाहूंगा कि शाहरुख 'सरबजीत' करते या फिर 'सत्या' या 'कंपनी' जैसी फिल्में करते। अगर एक्टर्स और फाइनैंसर्स सिनेमा के प्रति थोड़े सीरियस हो जाएं, तो हमारी फिल्म इंडस्ट्री बहुत आगे जा सकती है, लेकिन प्रॉब्लम ये है कि छोटे बजट वाली अच्छी फिल्म को स्टार्स मिल ही नहीं पाते, क्योंकि उनकी फीस ही इतनी ज्यादा होती है। आज फिल्म के बजट का 50 से 60 फीसदी हिस्सा तो एक्टर की फीस में ही चला जाता है। फिल्म बनाने के लिए बचता कितना है, सिर्फ 40 पर्सेंट। बड़े एक्टर्स को एक लाख रुपए रोज तो उनके हेयर और मेकअप के लिए चाहिए। उन्हें एक घंटे के लिए भी कहीं जाना हो, तो चार्टर्ड प्लेन चाहिए, जबकि वो स्पॉटबॉय जो सुबह से शाम तक काम करता है, उसे सिर्फ 1300 रुपए मिलते हैं।   (साभार: नवभारत टाइम्स)   समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडियापोर्टल exchange4media.com की हिंदी वेबसाइट है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो कर सकते हैं।  

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