ankara escort porno sex izle porno izle sex izle मैं जुनूनी डिबेटर, नींद में भी कर सकता हूं डिबेट: अर्नब गोस्वामी

मैं जुनूनी डिबेटर, नींद में भी कर सकता हूं डिबेट: अर्नब गोस्वामी

Tuesday, 29 March, 2016

हिंदी अखबार 'दैनिक भास्कर' के एग्जिक्यूटिव एडिटर डॉ. भारत अग्रवाल ने उग्र शैली वाले वरिष्ठ पत्रकार अर्नब गोस्वामी का इंटरव्यू किया, जिसमें उन्होंने अर्नब की जिंदगी से जुड़े तमाम पहलुओं पर चर्चा की, जिसे आप यहां ज्यों का त्यों पढ़ सकते हैं: अर्नब गोस्वामी अपने प्रोग्राम में कई मुश्किल सवालों के स्पष्ट और सीधे जवाब लोगों तक पहुंचाने की कोशिश करते दिखते हैं। उग्र शैली वाले इस सेलेब्रिटी इंटरव्यूअर के साथ डॉ. भारत अग्रवाल का इंटरव्यू-

अर्नब गोस्वामी बोले- मैं जुनूनी डिबेटर, नींद में भी कर सकता हूं डिबेट

डॉ. अग्रवाल- अर्नब गोस्वामी का कोई सॉफ्ट पहलू भी है? गोस्वामी-6th क्लास से मैं डिबेटर रहा हूं। मैं तो केवल अपने जुनून, अपने शौक को ही आगे बढ़ा रहा हूं। ऐसा कुछ जिसका मैं हमेशा लुत्फ उठाता रहा हूं। स्कूल और कॉलेज में जिस चीज से मैं थोड़ा-सा पैसा कमा लेता था, उसी को मैंने आजीविका बना लिया। इसलिए मैं खुद को बहुत खुशकिस्मत मानता हूं कि मैं लगातार 20 साल बाद भी यही कर रहा हूं। असल में मैं बहुत जुनूनी डिबेटर हूं और नींद में भी डिबेट कर सकता हूं। डॉ. अग्रवाल- आपको यह स्किल कहां से मिली, मां से या पिता से? गोस्वामी- मुझे लगता है सब तरफ से। मैं स्कूल के दिनों में डिबेट में भाग लेता था। मैं दिल्ली में माउंट सेंट मेरी और फिर सेंट्रल स्कूल में पढ़ता था। मैं सेंट्रल स्कूल डिबेटिंग कॉम्पीटिशन में भाग लेता था। हम इटारसी, जबलपुर से भोपाल जाया करते थे। वहां नेशनल कॉम्पीटिशन होती थी। मैंने जिंदगी में जो बेस्ट डिबेट देखी वह दून स्कूल के खिलाफ नहीं, सेंट्रल स्कूल के खिलाफ देखी हैं। इसलिए मैं सोचता हूं कि सेंट्रल स्कूल की डिबेट में ही मैंने यह स्किल हासिल की है। सरकारी शिक्षा ने मेरी बहुत मदद की। arnab-goswami-finalडॉ. अग्रवाल- आपका परिवार सोशल मीडिया के जहरीले कमेंट्स को कैसे लेता है? गोस्वामी-कुछ भी हमेशा नहीं बना रहता। सफलता व असफलता दोनों को देखने का यह दार्शनिक तरीका है। भारत, सफलता हमेशा नहीं रहेगी, इसलिए इससे लगाव मत रखो, विफलता हमेशा नहीं रहेगी, इसलिए हताश मत हो। लोग आपको देखेंगे तो क्रिटिसिज्म तो होगी। कुछ लोग नापसंद करेंगे। आप तानाशाह होकर यह नहीं कह सकते कि मैं चाहता हूं हर कोई मुझे पसंद करे। फिर जर्नलिस्ट और फिल्म स्टार में फर्क ही क्या बचेगा। डॉ. अग्रवाल- क्या कभी अर्नब गोस्वामी नेता के रूप में दिखाई देंगे। एमजे अकबर, आशुतोष, अरुण शौरी आदि के नक्शे कदम पर चलेंगे?

गोस्वामी- एक बात मैं पूरे आत्मविश्वास से कह सकता हूं कि अंतिम दिन तक मैं जर्नलिस्ट ही रहूंगा। मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूं कि मैं कभी राजनीति में नहीं आऊंगा। मैं सिर्फ जर्नलिज्म करना चाहता हूं। मेरा एक एम्बीशन है कि हम, भारतीय मीडिया के सारे लोग किसी दिन कुछ ऐसा करें कि भारतीय मीडिया इंटरनेशनल हो जाए। मुझे लगता है कि अगला बीबीसी या सीएनएन भारत में बनाया जा सकता है। यह मेरी हसरत है। मैं राजनीति में कभी नहीं उतरूंगा। न तो आज और न 40 साल बाद।

डॉ. अग्रवाल- कुछ समय से मीडिया ट्रायल यानी मीडिया द्वारा मुकदमा चलाए जाने की बात की जाती है। आपकी राय में ज्यूडिशियल केसेस की तुलना में यह कहां ठहरता है? गोस्वामी- मेरा मानना है कि दोनों में कोई तुलना नहीं हो सकती। हमने जिन भी घोटालों का पर्दाफाश किया है- कॉमनवेल्थ, 2-जी, डेवस-इसरो, कारगिल मुनाफा, आदर्श, एयरसेल-मैक्सिस, ललितगेट और अब यह पूरा माल्यागेट; ये सारे मामलों का खुलासा उस हद तक किया गया कि वे अदालत में पहुंच पाएंगे। जब वे कोर्ट में पहुंच गए तो हम वहां पर समांतर दबाव नहीं डालते। जो भी हो, मैं मानता हूं कि अदालतें इतनी बुद्धिमान हैं कि वे अपना नतीजा निकाल सकती हैं। हालांकि, हमने यह सुनिश्चित करने में बहुत ही सक्रिय भूमिका निभाई है कि इनमें से कई मुद्‌दे अदालत के सामने पहुंच जाएं। पहले भी कोर्ट ने खुद ये कहा है कि मीडिया ने फैक्ट्स को उनके सामने लाने का अच्छा काम किया है। मैं नहीं सोचता कि मीडिया के बिना 2-जी या कोयला आवंटन जैसे मामलों में कोई जस्टिस होता। वास्तविकता तो ये है कि कोयला (आवंटन) मामले में फैक्ट्स पाए गए, क्योंकि उस समय हम सरकार के पीछे पड़े थे। इसलिए मैं सोचता हूं कि इसे मीडिया ट्रायल नहीं कहना चाहिए। ये तो सीरियस जर्नलिज्म है, गंभीर जांच-पड़ताल करने वाली पत्रकारिता है। जो लोग इससे प्रभावित होते हैं, वे इसे मीडिया ट्रायल कहते हैं। अभी विजय माल्या इसे मीडिया ट्रायल कह रहे हैं, तब सुरेश कलमाड़ी ने इसे मीडिया ट्रायल कहा था। उन्होंने मुझे मुकदमे की, कोर्ट में ले जाने और जेल में बंद करने की धमकी दी थी। अब माल्या भी यही वादा कर रहे हैं। मेरे लिए तो यह मीडिया ट्रायल नहीं है, मैं तो वास्तव में अपना काम कर रहा हूं। डॉ. अग्रवाल- आपने मोदी और राहुल गांधी के इंटरव्यू लिए हैं। आपको उनकी सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी कमजोरी कौन-सी लगी? गोस्वामी- मैं ताकत व कमजोरी के बारे में तो बात नहीं करूंगा, क्योंकि दोनों इंटरव्यू बिल्कुल अलग हालात में हुए थे। क्योंकि राहुल ने इसके पहले कभी इंटरव्यू (टीवी पर) नहीं दिया था और मुझसे बात करने के पहले मोदी कई इंटरव्यू दे चुके थे। ये दोनों ही अलग-अलग स्थितियां थीं। मेरा ख्याल है एक इंटरव्यू ने जनवरी 2014 में चुनाव अभियान की शुरुआत की और दूसरे ने मई 2014 में अभियान को खत्म किया। इसलिए लोगों के पास मौका था कि वे दोनों की तुलना कर खुद अपना मन बनाएं। मुझे लगता है कि इन इंटरव्यू का पहली बार उन क्षेत्रों में भी प्रभाव पड़ा, जहां हमारी बहुत कम व्यूअरशिप है। जिस क्षण राहुल ने मुझे इंटरव्यू दिया, यह एकदम साफ हो गया कि यह पर्सनैलिटी का कॉम्पीटिशन हो गया है। arnabडॉ. अग्रवाल- आप असम के सबसे फेमस शख्स हैं। अपने होम स्टेट की स्थिति के बारे में आपकी क्या राय है अौर इसके लिए क्या ख्वाहिशें हैं। कोई राजनीतिक झुकाव? गोस्वामी- मैं सबसे फेमस नहीं हूं। वे निस्संदेह भूपेन हजारिका हैं। मैं तो कहूंगा वे सबसे फेमस असमी हैं। आज भी युवाओं से पूछें तो वे कहेंगे कि मेरा गायक दोस्त पप्पोन मुझसे कहीं ज्यादा प्रसिद्ध है। मेरे विचार से असम बहुत सुंदर राज्य है और भारत का ऐसा क्षेत्र जहां कई कल्चर और जातीय समूह घुल-मिल जाते हैं। मेरे नाना गौरीशंकर भट्‌टाचार्य भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के शुरुआती फाउंडर्स में से थे। उन्होंने एक किताब लिखी है, ‘असम : द एपीटॉम ऑफ इंडिया'। अपने कल्चर, लैंग्वेज और डायवर्सिटी, रिलीजन में यह सबको घुलाने-मिलाने वाला पात्र है। इसलिए केंद्र सरकार को असम के विकास के लिए बहुत ज्यादा करना चाहिए। कभी-कभी लगता है कि दूरी के कारण इसे भुला दिया जाता है। जब राजनीति अहम हो जाती है, जैसे इन दिनों चुनाव के कारण हर कोई इसकी ओर देखता है, लेकिन मुझे लगता है इसमें बहुत पॉसिबिलिटी है। डॉ. अग्रवाल- भारतीय राजनीति में प्रशांत किशोर जैसी भूमिका के उदय के बारे में आपकी क्या राय है? गोस्वामी-यह बहुत ही रोचक ट्रेंड है, यदि प्रशांत किशोर कांग्रेस पार्टी के लिए काम करते हैं तो यह देखना रोचक होगा कि वे कितना काम करते हैं और उनका कितना इफेक्ट होता है। निश्चित ही यह उनके लिए बिहार की तुलना में बड़ी चुनौती होगी। मैं प्रशांत किशोर जैसे चलन को खारिज नहीं करूंगा और मुझे लगता है कि यह और बढ़ेगा, लेकिन यह देखना रोचक होगा कि परंपरागत राष्ट्रीय राजनीतिक दल अपने डिसीजन मेकर के रूप में काम प्रशांत किशोर जैसे लोगों को सौंपते हैं या नहीं। मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है कि राष्ट्रीय पार्टी की बजाय जेडीयू जैसी क्षेत्रीय पार्टियों के लिए काम करना उनके लिए आसान था। डॉ. अग्रवाल- क्या टेलीविजन चैनल निहित राजनीतिक स्वार्थ को बढ़ावा दे रहे हैं? गोस्वामी- कुछ तो हैं, लेकिन निश्चित ही हम नहीं हैं, बेहतर होगा कि लोग खुले रूप में यह घोषणा कर दें कि वे राजनीतिक रूप से कहां खड़े हैं बजाय इसके कि बात ठीक उल्टी हो। मैं मानता हूं कि इस देश में मीडिया को राजनीतिक हितों के मामले में अधिक स्वतंत्र होने की जरूरत है खासतौर पर विभिन्न राज्यों में। डॉ. अग्रवाल- आपने विनोद मेहता को दिल को छू लेने वाली श्रद्धांजलि दी थी और उनके बारे में कहा कि ऐसा एडिटर आपको फिर नहीं मिला। आप और किसी को अपने मेंटर के रूप में देखते हैं? गोस्वामी-नहीं, मेरा और कोई मेंटर नहीं है। डॉ. अग्रवाल- यह आमतौर पर कहा जाता कि आप खबरों को सनसनीखेज बनाते हैं? गोस्वामी- मैं वे ख़बरें, वे स्टोरीज़ उठाता हूं जो लोगों के लिए महत्वपूर्ण होती हैं, सार्वजनिक महत्व की स्टोरीज़। मुझे लगता है कि सार्वजनिक हित की खबरें उठाना उन्हें सनसनीखेज बनाना नहीं है, इसलिए मैं यह आरोप खारिज करता हूं। डॉ. अग्रवाल- क्या आपके कोई शागिर्द हैं, जिन पर आपको गर्व हो? गोस्वामी-बहुत से यंग्स्टर्स मेरे मातहत काम करते हैं और बहुत से सहयोगी हैं जिन पर मुझे गर्व है। मैं किसी को शागिर्द नहीं कहूंगा, हर व्यक्ति अपने आप में एक शख्सियत है। डॉ. अग्रवाल- राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में अकाउंटेबिलिटी और ट्रांसपेरेंसी पर क्या सोचते हैं ? गोस्वामी-मैं सोचता हूं कि पूरी ट्रांसपेरेंसी की जरूरत है और सारे भुगतान चेक से होने चाहिए और मेरा यह भी मानना है कि खर्च भी सार्वजनिक होना चाहिए। मेरे चाचा, दिनेश गोस्वामी वीपी सिंह सरकार में कानून मंत्री थे। उन्होंने एक मशहूर अध्ययन किया था, जिसे चुनाव सुधार पर दिनेश गोस्वामी समिति की रिपोर्ट कहा गया। वह रिपोर्ट इस विषय को बिल्कुल स्पष्टता से प्रस्तुत करती है। मुझे लगता है इसे स्वीकार किया जाना चाहिए। arnabडॉ. अग्रवाल- विदेश से काला धन लाने के वादा पर क्या मोदी नाकाम हुए ? गोस्वामी- काले धन के वादे पर मुझे कोई भरोसा नहीं था। इसे लेकर मेरा रवैया हमेशा ही घोर नकारात्मकता का रहा और मैं सही साबित हुआ। डॉ. अग्रवाल- प्रमुख मुद्‌दों पर प्रधानमंत्री की चुप्पी बनाम पहले हर मुद्‌दे पर बातचीत पर आप क्या सोचते हैं ? गोस्वामी- मौजूदा प्रधानमंत्री कई मुद्‌दों पर पूर्ववर्ती की तुलना में कहीं ज्यादा मुखर हैं। वे जो कहते हैं, उससे कोई सहमत या असहमत हो सकता है, लेकिन निश्चित ही वे महत्वपूर्ण मुद्‌दों पर अत्यधिक मुखर रहे हैं। डॉ. अग्रवाल- क्या आपको लगता है कि राहुल गांधी ट्रांसफॉर्म्ड पर्सन हैं? अगर हां, तो किस चीज ने या शख्स ने यह किया है? गोस्वामी- राहुल गांधी निश्चित ही तब से बदल गए हैं जब मैंने उनका इंटरव्यू लिया था। बाकी तो मुझे तब मालूम पड़ेगा, जब फिर उनका इंटरव्यू लूंगा। डॉ. अग्रवाल- आप मौजूदा वित्तमंत्री अरुण जेटली और उनके पूर्ववर्ती पी. चिदंबरम की तुलना किस तरह करेंगे? गोस्वामी- मैं विशेषज्ञ तो नहीं हूं, लेकिन वे दो भिन्न परिस्थितियों में काम करते रहे हैं। जेटली तब काम कर रहे हैं, जब तेल की कीमतें कम हैं और परिस्थितियां बिल्कुल भिन्न हैं। मुझे लगता है सरकार के आर्थिक प्रदर्शन का आंकलन 2018 के आसपास किया जा सकता है, आज नहीं। लेकिन पिछले बजट से एक बात मुझे स्पष्ट है कि सरकार राजनीतिक मुद्‌दे और राज्यों के आगामी चुनाव देखते हुए बहुत साहसी फैसले नहीं लेगी। (यह बजट पिछले दो बजट से बिल्कुल अलग है) हां, उन्हें अपनी राजनीतिक हित भी ध्यान में रखने होंगे। डॉ. अग्रवाल- क्या आरबीआई को फाइनेंस मिनिस्ट्री के दखल से मुक्त रखा जाना चाहिए? गोस्वामी- दोनों में बैलेंस की जरूरत है। आप रिजर्व बैंक के भीतर सारे कार्यों को जरूरत से ज्यादा केंद्रीकृत नहीं कर सकते। मैं प्राय: खुद से पूछता हूं, विजय माल्या के लिए किसे दोष दिया जाना चाहिए, रिजर्व बैंक या फाइनेंस मिनिस्ट्री? जहां सरकार और मिनिस्ट्री को दोष देने की आम प्रवृत्ति होती है, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मौजूदा आरबीआई गवर्नर अौर उनके पूर्ववर्ती ने एपीए के पूरे झमेले को सुलझाने के लिए ज्यादा कुछ नहीं किया है, जो पिछले 10-15 वर्षों में इकट्‌ठा हो गया है। इसलिए मैं नहीं मानता कि आरबीआई जो भी करता है वह अच्छा है और सरकार जो भी करती है, बुरा है। डॉ. अग्रवाल- अच्छे दिन आएंगे या आ गए हैं? ‘राष्ट्र जानना चाहता है’ कि इस पर आपकी राय क्या है? गोस्वामी- यदि आप बजट के बाद वेतनभोगी मध्यवर्ग से पूछेंगे तो वे कहेंगे अच्छे दिन नहीं आए। किंतु यदि आप किसी किसान या निम्न आयवर्ग के व्यक्ति से पूछो तो वे कहेंगे कि स्थिति अब बेहतर है। इसलिए मुझे लगता है कि हमें 2-3 साल रुककर देखना चाहिए कि ये अच्छे दिन कहां जाते हैं। (साभार: दैनिक भास्कर)   समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडियापोर्टल exchange4media.com की हिंदी वेबसाइट है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो कर सकते हैं।  

पोल

आपको समाचार4मीडिया का नया लुक कैसा लगा?

पहले से बेहतर

ठीक-ठाक

पहले वाला ज्यादा अच्छा था

Copyright © 2017 samachar4media.com