ankara escort porno sex izle porno izle sex izle टीवी पत्रकार सुधीर चौधरी के फैन हैं तो पढ़ें ये इंटरव्यू, नापसंद करते हैं तो जरूर पढ़ें...

टीवी पत्रकार सुधीर चौधरी के फैन हैं तो पढ़ें ये इंटरव्यू, नापसंद करते हैं तो जरूर पढ़ें...

Tuesday, 25 October, 2016

बीते दिनों ‘जी न्यूज’ (Zee News)  दर्शकों का सबसे विश्वसनीय न्यूज चैनल बनकर उभरा है। हालही में ‘द ब्रैंड ट्रस्ट रिपोर्ट इंडिया स्टडी 2016’ के सर्वे में भी इस बात का खुलासा हुआ है। लेकिन इन सबके बीच ‘जी न्यूज’ और इसके एडिटर सुधीर चौधरी को कई विवादों का सामना भी करना पड़ा है। यहीं नहीं बीते दिनों चैनल की खबरों को भी पक्षपातपूर्ण और राजनीति से प्रेरित बताया जाता रहा है।

interview

समाचार4मीडिया के संपादकीय प्रभारी अभिषेक मेहरोत्रा और संवाददाता विकास सक्सेना ने जब इन्हीं मुद्दो पर गहराई से पड़ताल करने के लिए जी न्यूज के एडिटर सुधीर चौधरी से बातचीत की तो उन्होंने बड़ी ही सूझबूझ से हमारे सवालों के जवाब दिए। बड़ी बात ये है जहां आज के दौर में जब नेताओं का भी इंटरव्यू लिया जाता है, तो कह दिया जाता है कि फलां सवाल या अमुक विवाद पर सवाल मत कीजिएगा। पर सुधीर चौधरी से हमने कई कड़े और कुछ विवादों से जुड़़े सवाल भी किए, पर सुधीर ने किसी भी सवाल पर 'नो कमेंट' जैसा जवाब नहीं दिया।  यहां पढ़िए बातचीत के कुछ अंश:

यहां पढ़ें:  वरिष्ठ पत्रकार सुधीर चौधरी के ‘DNA’ का DNA टेस्ट…

dsc_0610जी न्यूज किस तरह से अन्य न्यूज चैनलों से अपने आपको कर रहा है अलग?

इस चैनल के परिसर में दो सबसे बड़े क्रांतिकारी कदम उठाए गए हैं, जिसमें पहला मोबाइल फोन पर बैन और दूसरा न्यूजरूम में अन्य चैनलों की बंदी। दरअसल मोबाइल फोन आपके सोचने की शक्ति को भटकाता है। हालांकि इसका कुछ लोगों ने विरोध भी किया, क्योंकि इसमें असाइनमेंट डेस्क और रिपोर्टर्स भी शामिल हैं और इनका कहना था कि फिर खबर कैसे पता चलेगी। दरअसल ऐसा न होता तो यहां के लोगों को ये कैसे पता चलता कि खबर की परिभाषा क्या है और कोई भी खबर 5 मिनट पहले चले या 5 मिनट बाद चले दर्शकों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। वहीं दूसरी तरफ असाइनमेंट और न्यूजरूम में लगे तमाम टीवी सेट्स पर दूसरे न्यूज चैनल लगाना भी मना है, क्योंकि हम किसी दूसरे को फॉलो नहीं करना चाहते हैं। और ऐसे में अब हमारी टीम को ये भी पता नहीं होता कि हमारे कंपटीशन में क्या चल रहा है। इस कदम को यदि नहीं उठाया जाता तो अन्य चैनलों को देखकर यहां के लोग प्रभावित होते और दूसरे से अलग दिखना बंद हो जाता। 'डीएनए' शो शुरू करने से पहले किए गए स्टडी टूर के दौरान ये बात सामने निकलकर आई कि न्यूज चैनल के जरिए लोगों को जानकारियां नहीं मिलती। इसलिए हमने चैनल पर जानकारी  देना भी शुरू किया, जिसमें खबरों के अंदर की जानकारियां दिखाई जाती हैं।

क्या मीडिया की विश्वसनीयता घटी है?

जब ऐसे लोगों को देखता हूं, जो पत्रकारिता के साथ-साथ पॉलिटिक्स जॉइन कर लेते हैं, तो लगता है कि हां, मीडिया की विश्वसनीयत कम हुई है और जब मैं स्टडी टूर कर रहा था तब भी भी यही मुख्य सवाल निकल सामने आया था। शत-प्रतिशत लोगों ने कहा था कि मीडिया की विश्वसनीयता नीचे गिर गई है और न्यूज चैनल्स व अखबारों में जो आता है हमें उस पर विश्वास नहीं रहा। ये कड़वा सच है कि पहले जिस तरह नेता के प्रति , फिर पुलिस्र प्रति भरोसा कम हुअ था, उसी तरह अब मीडिया से भी लोगों का विश्वास उठ गया है और यही कारण है कि फिल्में जिन्हें हम समाज का दर्पण मानते हैं,  वहां भी मीडिया पर फोकस है। अब मीडिया पर इतनी फिल्में बन रहू हैं और ज्यादातर फिल्मों में यही दिखाया जा रहा है कि आज का मीडिया कितना करप्ट हो गया है। इसलिए हो सकता है कि अगले चरण में फिल्मों में विलेन न्यूज चैनल या अखबार का एडिटर हो जाए।

अन्य न्यूज चैनलों की तरह क्या जी न्यूज के अनट्रेंड रिपोर्टर भी करते हैं आर्मी या हमले की रिपोर्टिंग?

दरअसल मान लिया गया है कि टीआरपी का सबसे सुरक्षित फार्मूला यही है कि 10 घंटे 10 रिपोर्टर, उरी पर 15 रिपोर्टर की फौज, आज हम 150 रिपोर्टर के जरिए ये खबर दिखाएंगे। और आज यही स्टाइल बन गया, क्योंकि ऐसा मान लिया गया है कि इससे टीआरपी आएगी। लेकिन ये बहुत बोरिंग है। जी न्यूज ने अपने कई रिपोर्टर्स की ट्रेनिंग इंडियन आर्मी से कराई है और इन्हीं लोगों को आर्मी या हमले की रिपोर्टिंग के लिए भेजा जाता है।

क्या सुधीर चौधरी प्रो बीजेपी हैं या कांग्रेसी?

देखिए, हमेशा ये आरोप मुझ पर लगता है कि प्रो बीजेपी हूं या प्रो मोदी हूं। लेकिन ऐसा नहीं है। भाग्यवश इसका सबसे बड़ी वजह ये है कि मैं राष्ट्रवादी हूं। लेकिन आज राष्ट्रवादी को लोगों ने बीजेपी से जोड़ दिया है। उदाहरण के लिए- यदि आप कहते हैं कि ‘I love India’ तो लोग यह जरूर कहेंगे कि आप भाजपा के समर्थक हैं और यदि आप यह कहते हैं कि यह देश किसी भी व्यक्ति के रहने के लिए सही जगह नहीं है तो आपके ऊपर सेक्यूलर होने का ठप्पा लग जाता है। इसलिए मैं न तो भाजपा और न ही कांग्रेस से जुड़ा हुआ हूं।

dsc_0648क्या सुधीर चौधरी कभी पॉलिटिक्स जॉइन करेंगे?

बिलकुल नहीं, हममें और बाकी पत्रकारों में फिर क्या फर्क रहेगा। वैसे तो ज्यादातर पत्रकार यही कर रहे हैं और लगभग सभी एडिटर्स में पॉलिटिक्स जॉइन करने की इच्छा रहती है और इसी के चलते वे अपने एक समय पर अपने कन्टेंट में मिलावट करना शुरू कर देते हैं और ये मिलावट उनके अपने अनुभवों से होती है। ये प्रक्रिया दो-चार साल तक चलती है फिर वे पॉलिटिक्स जॉइन कर लेते हैं। इसलिए अगर मैं भी वही करुंगा तो जिनकी आज हम आलोचना करते हैं, कल को कोई हमारी करेगा। इसलिए अपने फील्ड मे रहना चाहिए और यहीं कुछ करना चाहिए। और यदि ये सोचकर जाते हैं कि सोसायटी में कुछ करेंगे, तो फिर जब एडिटर रहकर सोसायटी में कुछ नहीं कर पाए तो पॉलिटिक्स में जाकर क्या कर लेंगे और वैसे तो पॉलिटिक्स से ज्यादा बड़ी ताकत तो अभी है कि एक एडिटर को 8-10 करोड़ लोग देखते हैं।

क्या अन्य पत्रकारों की तरह सुधीर चौधरी भी ट्रोलिंग होने पर ट्विटर से भागेंगे?

नहीं, ट्विटर पर मुझे भी गालियां पड़ती हैं, लेकिन मैं ट्विटर से नहीं भागूंगा। मेरा मानना है हर तरह से लोगों का सम्मान करना चाहिए। 6 महीने पहले ही मैं फेसबुक पर आया हूं।

कई अन्य पत्रकारों-संपादकों को आपसे शिकायत है कि आप उन पर तंज कसते हैं?

देखिए, मैं किसी का नाम नहीं लेकर संबोधित नहीं करता बल्कि उन्हें डिजायनर पत्रकार कहता हूं। इसके पीछे एक कारण यह है कि ये सभी पत्रकार लुटियंस जोन से रिपोर्टिंग करते हैं। ये आईआईसी में बैठकर नार्थ जोन और साउथ जोन में अपने स्रोत से बात करके रिपोर्टिंग करते हैं, राष्ट्रपति भवन, संसद जैसी जगहों से रिपोर्टिंग करना चाहते हैं। लेकिन इनसे जब कहिए कि उरी चले जाएं, छपरा चलें जाएं जहां कुछ साल पहले कई बच्चे मर गए थे, तो वे ऐसी जगह जाकर रिपोर्टिंग  नहीं करना चाहेंगे। इसलिए मैं कहता हूं कि ये लोग दिल्ली से बाहर निकलना नहीं चाहते। मैं एक एडिटर हूं और मैं भी चाहूं तो यहां से बैठकर रिपोर्टिंग कर सकता हूं, लेकिन मैं ऐसा नहीं करता। इसलिए मैं शायद ही मीडिया में किसी एडिटर से बात करता हूं, क्योंकि मैं किसी भी एडिटर से प्रभावित नहीं हूं और मुझे मीडिया की पॉलिटिक्स से कुछ भी लेना-देना नहीं है। वैसे भी मीडिया पॉलिटिकल पार्टियों की तरह ही है और इसकी अलग ही पॉलिटिक्स है। अगर आप इस पॉलिटिक्स में हिस्सा लेते हैं तो आप पुरस्कारों की बौछार भी होती है, आपको लुटियंस जोन से पावर भी मिलती है। लेकिन मेरी कभी भी लुटियंस जोन से न तो राजनीति करने की इच्छा है, और न होगी।

आम आदमी पार्टी का आरोप है कि आप उनका विरोध करते हैं?

देखिए, शायद पार्टी ने ये नोट नहीं किया कि उन्होंने जो भी अच्छी चीजें कि हैं कि मैं उसकी तारीफ भी करता हूं, लेकिन उन्हें सिर्फ मेरी आलोचनाएं ही दिखाई देती है। मेरा मत यही है कि यदि उन्हें जनसमर्थन मिला है तो उन्हें इसके मुकाबले बहुत अच्छा काम करना चाहिए। विज्ञापनों की राजनीति से दूर हटकर, क्योंकि इससे कुछ मिलने वाला नहीं है। इसलिए मुझे जो ठीक लगता है मैं अपने दर्शकों को वही बताता हूं।

आजादी के 70 साल बाद क्या सरकार अब सही दिशा में काम कर रही है?

देखिए, सरकार कोई भी हो उसे कम बोलना चाहिए इसलिए मेरी अनबन आम आदमी पार्टी से रहती है। चाहे सत्ता में हो या विपक्ष में नेताओं को कम ही बोलना चाहिए। अब इस सरकार (एनडीए) के सामने भी यही समस्या सामने आ रही है। वे जानते थे कि जो बोल रहे वह संभव नहीं है जैसे- पाकिस्तान पर हमला करना। हां, ये अलग बात है कि पाकिस्तान के खिलाफ हमला तो नहीं कूटनीतिक कदम उठाए जा सकते हैं, जिन्हें कोई नहीं रोक सकता।

जेएनयू में पाकिस्तान के नारे वर्षों से लग रहे थे, तब मीडिया ये मान भी चुका था कि ऐसा तो होता ही है। तब उन्हें करंट नहीं लगता था, लेकिन जब फरवरी 2016 में जब हमने ये तय किया कि अब बहुत हो गया अब इसको रिपोर्ट करेंगे और ये सवाल उठाएंगे कि आप ऐसा कैसे कर सकते हो? लेकिन अब जब सवाल उठने शुरू हुए तो व्यवस्था बदलनी शुरू हो गई है।

जब पत्रकारिता क्षेत्र में आपने कदम रखा तो आपके आइडल कौन थे?

जब मैंने पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा तब शायद यहां कोई भी न्यूज चैनल नहीं था। तब मैं टीवी पर विनोद दुआ और रजत शर्मा को देखता था और उस समय इन्हीं के नाम मुझे याद थे। इसलिए यही दोनों मुझे अच्छे लगते थे, क्योंकि और कोई ऑप्शन उस वक्त नहीं था। इसके बाद धीरे-धीरे चैनलों की बाढ़ सी आ गई। वैसे मेरा मानना है कि एक एडिटर दूसरे एडिटर को कितना पसंद करता है, या एक एंकर दूसरे एंकर को कितना पसंद करते हैं ये अलग बात है, लेकिन ये सब दर्शकों पर छोड़ देना चाहिए। तभी पता चलेगा कि एक एंकर की पॉपुलैरिटी चार्ट कितनी है और यह तय करने का हक दिल्ली-मुंबई में बैठे बुद्धजीवियों को नहीं बल्कि आम जनता को तय करने देना चाहिए।

dsc_0687क्या लगता है कि जिंदल वाले मामले से आपकी छवि को नुकसान हुआ है?

जिंदल वाला जब मामला हुआ था तो इससे पहले मैं यही सोचता था कि मीडिया दुष्प्रचार करता है, जैसा कि मैं सुनता रहता था और ये भी सुनता था कि मीडिया आपकी बात नहीं सुनता, जो उसके मन में आता है वही करता है। या यूं कहे कि मीडिया एक अंधी दौड़ है। लेकिन मैंने ये नहीं सोचा था कि मैं खुद उसका सब्जेक्ट बन जाउंगा। बिना वैरिफाइ करके खबर चलाने की मीडिया की जो परंपरा है, एक दिन मैं खुद उसका शिकार बन गया और मेरे बारे में बिना अनवैरिफाइड खबरें चलनी शुरू हो गईं। लेकिन बहुत छोटा सा वर्ग ऐसा था कि जिसे लगता था कि दाल में कुछ काला है ऐसा नहीं हो सकता। लेकिन वर्ग इस पर सारे दिन डिबेट्स करता था। इसलिए उस दौरान मीडिया जितना दुष्प्रचार कर मेरा नुकसान करना चाहता था, किया। लेकिन उस समय किसी ने ये नहीं सोचा था कि मैं वापस भी आउंगा। मैं वापस आया और इसके बाद मैंने ये ‘डीएनए’ लॉन्च किया और इसकी सफलता ही आलोचकों के लिए सबसे बढ़िया जवाब साबित हुई। क्योंकि आम दर्शकों ने मुझे स्वीकार किया, मेरा प्रोग्राम पसंद किया, जी न्यूज को पसंद किया। आज जी न्यूज कल्ट व्युअरशिप है। यानी जी न्यूज की आज लोग कसम खाते हैं। ऐसी लॉयल व्युअरशिप है जी न्यूज की। इस बात से यही साबित होता है कि मीडिया जो कहता है, जो करता है जरूरी नहीं लोग उसे फॉलो करें या उसे माने। मीडिया की सबसे बड़ी गलतफहमी यही है कि उसे लगता है कि वह किसी को भी बना सकता है और किसी को भी बिगाड़ सकता है। और इसका सबसे बड़ा उदाहरण मैं हूं। इसीलिए आज मैं मीडिया की जितनी अनऑफिशियल असोसिएशंस है, नेशनल ब्रॉडकास्ट असोसिएशन को छोड़कर, मैं किसी न तो मेंबर हूं और न ही किसी के नियमों को फॉलो करता हूं और न ही किसी से बात करता हूं और फिर मैं हूं और चैनल भी है। ऐसा इसलिए कि मेरे लिए सबसे बड़ी ताकत मेरे प्रमोटर (सुभाष चंद्रा) हैं। अगर मैं किसी अन्य चैनल में होता तो शायद ये सब नहीं कर पाता। मेरे लिए तो सबसे बड़ी खुशकिस्मती यही रही कि चाहे वो जिंदल का मैटर रहा हो, या फिर बदलाव के पीछे की विचारधारा, इसका इनक्रेजमेंट मुझे मेरे प्रमोटर सुभाष चंद्रा जी से मिला। हमने कश्मीर पर जो भी कुछ किया, जेएनयू मामले पर जो कुछ किया, बाकी जगह हमारा जो स्टैंड रहा हो, इन सबको लेकर जितना साथ हमारे डायरेक्टर ने दिया उतना शायद ही कोई कर पाता। अगर वो नहीं होता तो शायद बहुत मुश्किल हो जाता। इसलिए आपको ये भी देखना जरूरी होता है कि आपके टॉप पर जो बैठा आदमी क्या वो इन सबको स्वीकार करता है और उसकी विचारधारा कैसी है।

जी न्यूज को अलविदा कहेंगे सुधीर चौधरी?

सुधीर चौधरी ने इस सवाल के जवाब में कहा, ‘पहली बार समाचार4मीडिया के माध्यम से ये बता रहा हूं कि मुझे लेकर चेयरमैन सुभाष चंद्रा पहले ही ट्वीट कर चुके हैं और मैंने भी इन बातों का खंडन किया है। दरअसल ऐसा कुछ नहीं है और जी न्यूज मेरे डीएनए में है, तो इसे मैं कैसे दूर कर सकता हूं। मैं जो भी कुछ यहां करना चाहता हूं, मुझे मौका मिला है।

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