वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी ने उठाया सवाल, क्या ग्रहण में है हमारी पत्रकारिता?

Thursday, 03 May, 2018

समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।।

मई की महीना वैश्विक और हिंदी पत्रकारिता की दो तारीखों के लिए याद किया जाता है हर साल 3 मई को दुनिया प्रेस-फ्रीडम डे मनाती है और 30 मई को हम हिंदी पत्रकारिता दिवसमनाते हैं दो दशक पहले तक भारतीय लोकतंत्र का दुनियाभर में गुणगान होता था खासतौर से न्यायपालिका और प्रेस की तारीफ थी संयोग से इन दोनों मामलों में अब हम आलोचना के केंद्र में हैं पश्चिमी देशों में हमारी छवि असहिष्णु-समाज की बन रही है

पिछले कुछ दिन से रायटर्स की एक रिपोर्ट चर्चा में है इसके अनुसार कुछ भारतीय पत्रकारों की शिकायत है कि बीजेपी या मोदी की आलोचना करने पर उन्हें धमकाया जाता है और बहिष्कार किया जाता है राजू गोपालकृष्णन की इस रिपोर्ट में प्रणय रॉयसागरिका घोषसिद्धार्थ वरदराजनरवीश कुमार और हरीश खरे वगैरह के विचार दर्ज हैं इन पत्रकारों का अपना दृष्टिकोण है सोशल मीडिया में इनके विरोधियों की तादाद काफी बड़ी है इनके नाम पर काफी गाली-गलौज होती है

ऐसा नहीं कि ये पत्रकार अकेले पड़ गए हैं इनके समर्थक भी हैं उनकी संख्या कम हो सकती है, पर सोशल मीडिया उनको अपनी बात कहने का मौका देता है सोशल मीडिया के अलावा इन पत्रकारों के पास अपना मीडिया भी है या ऐसे मंच हैं, जहाँ वे अपनी बात कह सकते हैंबेशक हम टकराव के दौर में हैं हम उस टकराव को रिपोर्ट करते हैं और कई बार उसमें शामिल भी हो रहे हैं परीक्षा हमारी व्यवस्था की है

दोष हमारी राजनीतिक-व्यवस्था का है, पर वह वस्तुगत सत्य है विदेशी मीडिया का निशाना पूरी व्यवस्था पर है हमें सरकार और भारतीय राष्ट्र-राज्य में भेद करना चाहिए कुछ समय पहले सरकार ने एनडीटीवी के प्रसारण पर अस्थायी रोक लगाई गई थी तब न्यायपालिका ने हस्तक्षेप किया था दिल्ली के प्रेस क्लब में हुई सभा ने गुस्सा ज़ाहिर किया था हमारी न्यायपालिका ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में हमेशाफैसले सुनाए हैं

हाल में पत्रकारों की अंतरराष्ट्रीय संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की रिपोर्ट ने भी दुनिया का ध्यान खींचा है इसके सूचकांक में भारत का दर्जा स्थान पिछले कुछ वर्षों में गिरा है इस साल वह 138वें स्थान पर है भूटान (94), कुवैत (105), नेपाल (106), अफगानिस्तान (118), मालदीव (120) और श्रीलंका (131) जैसे देश भारत से ऊपर हैं पाकिस्ता ठीक नीचे 118वीं सीढ़ी पर है अमेरिका 45वीं सीढ़ी पर है इसके पिछले साल वह 43वें स्थान पर था

इसमें सबसे नीचे के देश हैं वियतनाम (175), चीन (176), सीरिया(177) और उत्तरी कोरिया(180) मान लेते हैं कि चीन और उत्तरी कोरिया के अख़बार स्वतंत्र नहीं हैं, पर सूरीनाम (21), समोआ(22), घाना(23) और लात्विया(24) के अख़बार क्या ब्रिटेन (40) और अमेरिका (45) के अखबारों से ज्यादा स्वतंत्र हैं?

बहुत छोटे और एकांगी समाजों में टकराव वैसा नहीं होता जैसा भारत जैसे देश में है समोआ, घाना और भूटान की पत्रकारिता का सूचकांक हमसे ऊपर भले ही हो, पर क्या उनके पास ऐसा कुछ है, जिससे हम सीख ले सकें इन सूचकांकों के पीछे के नज़रिए को समझना चाहिए. बढ़ती व्यावसायिकता, सामाजिक-सांस्कृतिक वैमनस्य और राजनीतिक संकीर्णता की चुनौतियाँ हमारे सामने हैं, उनके बारे में सोचें

मीडिया में मोदी-समर्थकों और मोदी-विरोधियों की विभाजक रेखा साफ है नीर-क्षीर विवेचक प्रवृत्तियाँ कमजोर हैं, पर अनुपस्थित नहीं हैदिक्कत राजनीति में है, जिसकी प्रतिच्छाया पत्रकारिता पर भी है जरूरत साख बचाने और गुणवत्ता को स्थापित करने की है इसमें पाठक-दर्शक, पत्रकार, सरकार और सांविधानिक संस्थाओं के साथ मीडिया हाउसों की भूमिका भी है, उन्हें कारोबार और केवल कारोबार की मनोदशा से बाहर आना चाहिए

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