जब कोई गौरी को एक दुस्साहसी कहता था, तो उसके पीछे की मंशा अच्छी होती थी...

जब कोई गौरी को एक दुस्साहसी कहता था, तो उसके पीछे की मंशा अच्छी होती थी...

Thursday, 07 September, 2017

पत्रकारिता जगत की एक बुलंद आवाज़ को खामोश कर दिया गया। कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू में पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या मंगलवार शाम हुई। उनकी हत्या के बाद पूरे देश की मीडिया में उनकी हत्या की खबरें सुर्खियां बन गई। देशभर में भारी आक्रोश है, लेकिन इस बीच उन्हें याद करते हुए उनके सहयोगी वरिष्ठ पत्रकार के.एस. दक्षिणमूर्ति ने भारी मन से अपने कलम के जरिए उन्हें श्रद्धांजलि दी। उनका ये एक लेख हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान में पब्लिश हुआ, जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं-  

स्मृति-शेष: एक दिलेर पत्रकार का दर्दनाक अंत

आप जब सुनते होंगे कि मेक्सिको सिटी, तुर्की, यूक्रेन व दूसरे तमाम सुदूर शहरों व देशों में पत्रकार मारे जा रहे हैं, तो एक गहरी सांस लेने के बाद अपनी जिंदगी में मसरूफ हो जाते होंगे। मगर जब हत्यारे आपके घर से चंद किलोमीटर की दूरी तक आ गए हों और उन्होंने एक ऐसी शख्सियत को मार डाला हो, जिसे आप वर्षों से जानते हैं और जिसकी दिलेरी के मुरीद रहे हों, तो आप स्तब्ध रह जाते हैं। अपनी प्रिय साथी गौरी लंकेश के कत्ल की खबर सुनकर मैं उसी स्थिति में पहुंच गया।

पिछले 35 साल में गौरी के साथ कॉफी पीते हुए खबरों, राजनीति और इधर-उधर की साधारण बातें मानो एक साथ गड्ड-मड्ड हो दिमाग में उमड़ आईं। यकीन ही नहीं होता कि उससे मिले इतना अरसा गुजर गया था। गौरी से मेरी पहली मुलाकात संडे मिड-डे  साप्ताहिक में हुई थी। तब मैंने उस अखबार में काम शुरू किया था, और वह वहां बतौर ट्रेनी काम कर रही थी। गौरी एक ठेठ पत्रकार थी- वह खबरों को सूंघ लेती थी व सभी तरह की खबरें करती थी, ज्यादातर लोगों की तरह वह खुशमिजाज शख्स थी। शादी के बाद वह कुछ वक्त के लिए दिल्ली शिफ्ट हो गई थी, पर जहां तक मुझे याद है, नब्बे के दशक में वह दिल्ली से बेंगलुरु लौट आई थी। यह उसकी जिंदगी का टर्निंग प्वॉइंट था। गौरी एक राजनीतिक एक्टिविस्ट-पत्रकार बन गई। यह गौरी अपने पहले के किरदार से बिल्कुल अलग थी। बाबरी विध्वंस के बाद वह अखबारों में सांप्रदायिकता की प्रखर विरोधी के तौर पर सामने आई।

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के खिलाफ वह खुलकर मोर्चा लेने लगी थी। फोरम फॉर कम्युनल हार्मनी की मुखिया के तौर पर गौरी लगातार मीडिया की सुर्खियों में रही। इन सबके बीच उसने अपने पिता, जो एक विख्यात पत्रकार थे, के अखबार लंकेश पत्रिका के मालिकाना हक की लड़़ार्ई भी लड़ी। आखिरकार कारोबार दो अखबारों में बंटा और गौरी उनमें से एक की संपादक बन गई। कर्नाटक में नक्सली आंदोलन का सीमित असर रहा है। गौरी इससे भी जुड़ी थी। वह राज्य में आदिवासियों के इंसाफ की लड़़ाई लड़ रही थी। अपने साथियों के साथ मिलकर उसने कई नक्सलियों को सशस्त्र आंदोलन छोड़ मुख्यधारा की राजनीति में लौटने को राजी किया था।

जब कोई गौरी को एक दुस्साहसी कहता था, तो उसके पीछे की मंशा अच्छी होती थी। वह आरएसएस-भाजपा और अन्य दक्षिणपंथी संगठनों का मुकाबला कर रही थी। इसमें कोई दो राय नहीं कि गौरी ने इन सब वजहों से काफी दुश्मन बना लिए थे। उसे अनेक बार अपने राजनीतिक विरोधियों के शाब्दिक हमलों का शिकार बनना पड़ा। मगर उसने कभी घुटने नहीं टेके। संघ परिवार के नाराज नेताओं ने उसके खिलाफ अवमानना के कई मुकदमे दर्ज कराए। मगर इस पत्रकार के लिए ये सब अनपेक्षित नहीं था। मुझ जैसा व्यक्ति, जो गौरी को इतने वर्षों से जानता था, आज यह स्वीकार करता है कि हम फेसबुक, वाट्सएप या सोशल मीडिया के किसी अन्य माध्यम पर दोस्त नहीं थे। उसके संपर्क में होने के लिए मैंने इनकी जरूरत ही नहीं महसूस की। इसके लिए वह या तो विभिन्न अखबारों में कॉलम लिख रही होती या हिंदुत्व ब्रिगेड की मुखालफत कर खुद खबरों का हिस्सा रहती या फिर किसी न किसी आयोजन का हिस्सा बनी होती थी।

गौरी उन लोगों में शामिल थीं, जिन्होंने मशहूर लेखक एमएम कलबुर्गी की हत्या की तीखी भत्र्सना की थी। उसे शायद इस बात का इलहाम भी न था कि एक दिन वह खुद इसी सनक का शिकार बनेगी, और एक बेहद भीड़भाड़ वाले मध्यवर्गीय इलाके राजाराजेश्वरी नगर में चार हथियारबंद अपराधी घर में घुसकर उसका कत्ल कर देंगे।

एक बात दावे के साथ कही जा सकती है कि कर्नाटक में हाल के वर्षों में गौरी जैसा कोई और पत्रकार नहीं हुआ, जो अपनी सोच के मुताबिक इतनी बेबाकी से लिखता-बोलता हो। गुजरात दंगों पर आधारित पत्रकार राना अयूब की किताब के विमोचन के मौके पर कुछ महीने पूर्व गौरी से मुलाकात हुई थी। कार्यक्रम खत्म होने के बाद उसने कहा था कि हमें साथ-साथ कॉफी पिए काफी वक्त बीत गया, जल्दी मिलते हैं, गपशप लड़ाएंगे। जैसा कि अमूमन ऐसे हालात में होता है। हमारी वह योजना अभी अधूरी ही थी। और अब तो काफी देर हो गई।


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गौरी लंकेश की हत्या के बाद आयोजित विरोधसभा के मंच पर नेताओ का आना क्या ठीक है?

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