मीडिया में ‘Neutrality’ के सवाल पर अरनब गोस्‍वामी ने दिया ये जवाब... मीडिया में ‘Neutrality’ के सवाल पर अरनब गोस्‍वामी ने दिया ये जवाब...

मीडिया में ‘Neutrality’ के सवाल पर अरनब गोस्‍वामी ने दिया ये जवाब...

Monday, 21 August, 2017

रुहैल अमीन व डॉली महायान ।।

तटस्‍थता यानी न्‍यूट्रिलिटी पत्रकारिता का बहुत ही महत्‍वपूर्ण अंग है लेकिन रिपब्लिक टीवी’ (Republic TV) के मैनेजिंग डायरेक्‍टर और वरिष्‍ठ पत्रकार अरनब गोस्‍वामी का मानना है कि मीडिया में यह सबसे बड़ा झूठहै। देश में जहां कई स्‍तरों पर ध्रुवीकरण हो रहा है, उन्‍हें तटस्‍थता के आइडिया पर सवाल उठाने में कोई गुरेज नहीं है। 

हाल ही में दिल्‍ली में हुए 11th INMA Annual South Asia conference’ में अरनब गोस्‍वामी ने कहा, ‘जब मैंने शुरुआत की थी तो मुझे अपनी पसंद के सवाल पूछने की आजादी नहीं थी और हम इसी को तटस्‍थता कहते थे। हमने तटस्‍थता का यह रूप भी देखा है और इसका हिस्‍सा भी रहे हैं। बोफोर्स सौदे का शिकार हुए लोग मुझे पत्रकारिता नहीं सिखा सकते हैं और न ही वे मुझे तटस्‍थता का पाठ पढ़ा सकते हैं। मेरा मानना है कि तटस्‍थता असंभव है। भारत और ग्‍लोबल मीडिया में तटस्थता की बात करना सबसे बड़ा झूठ है।’ 

गोस्‍वामी ने इस बात को भी स्‍वीकार किया कि सेफ खेलने से लेकर असहज करने वाले सवाल पूछने तक पत्रकारिता में काफी बदलाव आया है। खासकर पिछले दशक में हुआ यह परिवर्तन काफी अद्भुत है। वर्ष 2002 में लुटियंस दिल्‍ली की मीडिया में आठ साल गुजारने के बाद मैंने पत्रकारिता छोड़ने का निर्णय लिया था। मुझे लगा कि इसमें जोर नहीं है और न ही इसका कोई प्रभाव पड़ता है, हम सिर्फ ग्राफिक आर्टिस्‍ट बनकर रह गए हैं। तब टीवी और प्रिंट में कोई अंतर नहीं था। यह स्थिति काफी निराशाजनक थी। 

गोस्‍वामी के अनुसार, न्‍यूज मीडिया में दो दशक की पारी के दौरान उन्‍हें यह समझ में आ गया है कि कोई भी व्‍यक्ति सिस्‍टम से अलग नहीं है। उन्‍होंने कहा, ‘सिस्‍टम कभी भी व्‍यक्ति से बड़ा नहीं रहा है। मैंने कभी भी इसे उतना मजबूत महसूस नहीं किया, जितना आज के टेलिविजन और डिजिटल युग में है। बड़े व्‍यक्ति के लिए सभी सिस्‍टम संभव हैं।

अरनब का कहना है, ‘रिपब्लिक मीडिया के खिलाफ एक आंधी है।अरनब गोस्‍वामी की पत्रकारिता में सिस्‍टम से सवाल पूछने की आजादी है और इसे किसी भी रूप में दबाया नहीं जा सकता है।  

उन्‍होंने कहा, ‘यहां दो तरह के लोग हैं। एक तरह के वो लोग हैं जो मानते हैं कि वे सिस्‍टम का हिस्‍सा बनकर लाइफ जी सकते हैं जबकि दूसरे वे हैं जो मानते हैं कि जीवन में हमें कुछ अलग करना चाहिए। हमें दो कदम पीछे जाकर भी सिस्‍टम से सवाल पूछने के लिए तैयार होना चाहिए।’ 

गोस्‍वामी का मानना है कि देश में कोई भी व्‍यक्ति तटस्‍थ नहीं हो सकता है। उनका कहना है कि प्रिंट मीडियम में तटस्‍थ बनने का प्रयास किया और आज देखो यहां कहां आ गया है। उन्‍होंने कहा कि रिपब्लिक का उदय ही ऐसी फर्जी तटस्‍थता को रिजेक्‍ट करने के लिए हुआ है क्‍योंकि हम शुरुआत से ही न्‍यूट्रल नहीं रहे हैं और रिपब्लिक कभी भी गलत चीजों और मुद्दों पर न्‍यूट्रल नहीं रहेगा। अरनब ने कहा कि जिस तरह की पत्रकारिता वे करते हैं, उसमें शोरशराबा तो हो सकता है लेकिन यह सच्‍ची होती है। दरअसल, पत्रकारिता में तटस्‍थता की बात होनी ही नहीं चाहिए यह तो सिर्फ झूठ और सही के बीच चलने वाली एक सतत लड़ाई है।


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