‘IIMC’ के डीजी ने कहा, ‘फ्रीडम ऑफ स्पीच’ के नाम पर नहीं दी जा सकती इस तरह की आजादी

Thursday, 22 June, 2017

समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।।


देश के प्रमुख मीडिया शिक्षण संस्‍थान ‘इंडियन इंस्‍टीट्यूट ऑफ मास कम्‍युनिकेशन’ (IIMC) का दिल्‍ली स्थित मुख्‍यालय, जिसने देश को कई नामी पत्रकार दिए हैं, इन दिनों विवादों को लेकर चर्चा में है। हाल ही में छात्रों के एक वर्ग ने इस प्रतिष्ठित स्‍कूल पर भगवाकरण का आरोप लगाया है। इन सब आरोपों को लेकर आईआईएमसी के महानिदेशक केजी सुरेश ने tehelka.com से विस्‍तार से बातचीत की।


बातचीत के दौरान यह पूछे जाने पर कि हाल ही में कैंपस में हुए एक मीडिया ईवेंट में यज्ञ का आयोजन किया गया था, कुछ छात्रों ने आरोप लगाया है कि यह सब देश में हिंदुत्‍व को बढ़ावा देने के तहत किया गया था, केजी सुरेश ने बताया कि इस बारे में मीडिया संगठन ने उनसे सेमिनार और कॉंफ्रेंस के लिए संस्‍थान की जगह का इस्‍तेमाल करने की अनुमति मांगी थी।


केजी सुरेश के अनुसार, मीडिया संस्‍थान को ऑडिटोरियम का इस्‍तेमाल करने की अनुमति दी गई थी। साथ ही यह कहा गया था कि इससे संस्‍थान का शैक्षणिक वातावरण प्रभावित नहीं होना चाहिए। चूंकि मैं भी मीडिया इंडस्‍ट्री से हूं और कई मीडिया संस्‍थानों में काम कर चुका हूं, इसलिए मुझे पता है कि उनके पास न तो फंडिंग होती है और न बड़े स्‍पॉन्‍सर। यदि उन्‍हें बड़े स्‍पॉन्‍सर मिल भी जाएं तो वे वे प्रभावित हो सकते हैं। इन सब बातों को ध्‍यान में रखते हुए ही उन्‍हें स्‍पेस के इस्‍तेमाल की अनुमति दी गई थी। क्‍योंकि तब तक शैक्षणिक सत्र भी समाप्‍त हो चुका था और कैंपस में छात्रों के साथ ही कोई फैकल्‍टी मेंबर भी नहीं था। शनिवार होने के कारण वहां स्‍टाफ का भी कोई सदस्‍य मौजूद नहीं था, इसलिए इस तरह के आरोप बेकार हैं।


केजी सुरेश का कहना था कि हमने सिर्फ उन्‍हें जगह उपलब्‍ध कराई थी और वह कार्यक्रम हमारा नहीं था। यदि मैं यज्ञ कराता तो मैं वहीं बैठता और विभिन्‍न रस्‍मो रिवाज में भाग लेता लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। उन्‍होंने मुझे मीडिया से जुड़े रहने के नाते पैनलिस्‍ट के तौर पर आमंत्रित किया था। चूंकि यह एक मीडिया कॉन्‍फ्रेंस थी और आमंत्रण होने के कारण ही मैं वहां गया था। मैं अपने साथी पैनलिस्‍टों के वैचारिक रंगों को नहीं देखता क्‍योंकि मैं कभी भी वैचारिक छुआछूत में विश्‍वास नहीं करता हूं। पूर्व में मैं राजदीप सरदेसाई, रवीश कुमार और अन्‍य लोगों के साथ मंच शेयर कर चुका हूं, जिन्‍हें भाजपा की विचारधारा का विरोधी माना जाता है। मेरे लिए हर व्‍यक्ति के अपने विचार महत्‍वपूर्ण हैं और मैं उन्‍हें उसी रूप में देखता हूं।


यह पूछे जाने पर कि सेमिनार में बस्‍तर के पूर्व आईजी एसआरपी कल्‍लूरी को भी संबोधन के लिए बुलाया गया था। कल्‍लूरी पर मानवाधिकार उल्‍लंघन के आरोप लगते रहे हैं और सीबीआई ने भी सुप्रीम कोर्ट में उनके प्रतिकूल रिपोर्ट सौंपी थी, तो क्‍या ऐसे व्‍यक्ति को मीडिया कार्यक्रम में बुलाना उचित था, केजी सुरेश ने बताया कि उन्‍होंने कल्‍लूरी को आमंत्रित नहीं किया था। उन्‍हें कार्यक्रम के आयोजकों ने आमंत्रित किया था। मैंने उनका सेशन भी अटैंड नहीं किया था, संस्‍थान का महानिदेशक होने के नाते ही उन्‍होंने मुझे वहां बुलाया था। चूंकि वह आईपीएस अफसर हैं और सरकार ने उन्‍हें सस्‍पेंड भी नहीं किया है, इ‍सलिए बतौर औपचारिकता मैंने उनसे हाथ मिलाया था। रही बात सिद्धांतों की तो एक पत्रकार होने के नाते मुझे उनके विचारों को भी समझने की जरूरत है।


 पत्रकारों को सभी लोगों से बातचीत करनी चाहिए। वह पत्रकारों के सामने से आ रहे थे और लगभग 25-30 पत्रकार वहां पर थे। यहां तक कि रवीश कुमार भी वहीं थे। इसलिए इसमें कुछ गलत नहीं दिखा कि कल्‍लूरी पत्रकारों को संबोधित कर रहे थे और वे उनसे सवाल पूछ रहे थे। मैंने भी आयोजकों से उनसे सवाल पूछने को कहा था, यह उन पर निर्भर था कि वह जवाब दें या नहीं क्‍योंकि आप किसी को भी अपने सवाल का जवाब देने के लिए बाध्‍य नहीं कर सकते हैं। मेरा हमेशा से यही मानना रहा है कि पत्रकारों को हमेशा दूसरों से बातचीत करते रहना चाहिए। हमें सिर्फ एक पक्ष की ही नहीं सुननी चाहिए।


tehelka.comके इस सवाल पर कि पत्रकार होने के नाते क्‍या आपको लगता है कि जेएनयू के छात्र उमर खालिद और शेहला राशिद को रामजस कॉलेज में बोलने की अनुमति दी जानी चाहिए थी, केजी सुरेश ने कहा कि हमें सभी के विचारों को सुनना चाहिए। हम सवाल पूछ सकते हैं लेकिन हमें सुनना भी चाहिए। वहीं सेमिनार के टॉपिक ‘Nationalistic Media’ के बारे में उन्‍होंने कहा कि टॉपिक के बारे में गलत अफवाह फैलाई जा रही है, यह ‘national media’ था न कि  ‘Nationalistic Media’। कार्यक्रम में राष्‍ट्रीय प‍त्रकारिता कहा गया था, जिसका मतलब नेशनल मीडिया होता है। यदि यह नेशनलस्टि मीडिया होता तो इसे राष्‍ट्रवादी पत्रकारिता कहा जाता। वहां पर भारतीय पत्रकारिता के बारे में बात हो रही थी। दूसरी गलत खबर यह फैलाई जा रही है कि आरएसएस के मुखपत्र पांचजन्‍यके प्रकाशक हितेश शंकर ने कार्यक्रम का संचालन किया था लेकिन वह तो वहां आए ही नहीं थे। कार्यक्रम के संचालक जी न्‍यूजके विद्यानंद झा थे।   


यह पूछे जाने पर कि कुछ छात्रों ने उन्‍हें उस दिन कैंपस में न घुसने का आरोप लगाया है, केजी सुरेश ने कहा कि वहां मुश्किल से पांच छात्र थे जो इस तरह के आरोप लगाकर हंगामा कर रहे थे। जब हमने मीडिया संस्‍थान को जगह दी थी तो उन्‍हें ही निर्णय लेना था कि कार्यक्रम में कौन आएगा और कौन नहीं। मीडिया संस्‍थान ने ऑनलाइन रजिस्‍ट्रेशन प्रक्रिया रखी थी जिसमें कार्यक्रम में हिस्‍सा लेने के लिए 200 रुपये जमा करने को कहा गया था। इन पांच छात्रों ने ऑनलाइन रजिस्‍ट्रेशन नहीं कराया था। मैंने आयोजकों से किसी को भी बुलाने अथवा न बुलाने के लिए नहीं कहा था। इन पांचों छात्रों ने कहा था कि वे सेमिनार को बाधित करेंगे। दो ने तो मुझे इस बारे में लिखित में दिया था कि वे धरने पर बैठेंगे। ऐसे में यह मेरी जिम्‍मेदारी बनती है कि वहां पर कानून व्‍यवस्‍था की स्थिति न बिगड़े। कार्यक्रम में करीब 350 लोग थे। यदि वहां पर हंगामा हो जाता तो इसके लिए मुझे ही जिम्‍मेदार ठहराया जाता। इसलिए मैंने सिक्‍योरिटी से इन पांच छात्रों को बाहर बिठाने के लिए कहा था। मेरा मानना है कि जब लोगों को बीफ खाने का अधिकार मिलना चाहिए तो उन्‍हें हवन करने का भी अधिकार मिलना चाहिए, जिससे किसी को परेशानी न हो।


खुद पर लगे आरएसएस का आदमी होने के आरोपों के बारे में केजी सुरेश ने बताया कि इस कुर्सी पर बैठकर वह किसी खास विचारधारा को नहीं मानते हैं। निजी तौर पर देश के अन्‍य नागरिकों की तरह उन्‍हें भी अपने विचार व्‍यक्ति करने का अधिकार है। केजी सुरेश ने बताया कि उनके निजी विचार ऑफिसियली काम से अप्रभावित रहते हैं।


नरेंद्र राव को निकाले जाने के बारे में केजी सुरेश ने बताया कि कई मौकों पर आदेशों का पालन न करने पर उनके खिलाफ कार्रवाई की गई थी। इसके विरोध में वह हाईकोर्ट और कैट चले गए थे लेकिन राहत नहीं मिली। इस बात को छह महीने गुजर चुके हैं लेकिन अभी तक उन्‍हें कोई राहत नहीं मिली है।


मीडिया में केजी सुरेश के खिलाफ लिखने वाले छात्र को सस्‍पेंड करने के मामले में उन्‍होंने बताया कि रोहिन कुमार को इसलिए सस्‍पेंड किया गया था क्‍योंकि उसने एडमिनिस्ट्रिेशन से तथ्‍यों की पुष्टि किए बिना ऑनलाइन मीडिया में आर्टिकल लिखा था। इस‍के अलावा उसने ऐसे मामले पर लिखा था, जो न्‍यायिक क्षेत्र का मामला था। कुछ छात्र मेरे खिलाफ सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं। मैंने रोहित के अलावा किसी और को सस्‍पेंड नहीं किया। जिस तरह की भाषा ये छात्र इस्‍तेमाल कर रहे हैं, उसे कोई भी संस्‍थान बर्दास्‍त नहीं कर सकता है।  फ्रीडम ऑफ स्‍पीच के नाम पर छात्रों को अपने टीचर के खिलाफ इस तरह की गंदी भाषा का इस्‍तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।


 केजी सुरेश ने बताया कि 400 छात्रों में से कुछ चुनिंदा ही उनके खिलाफ इस तरह की गलत बातें बोल रहे हैं। इस छात्र इस वजह से मुझसे नाराज हैं कि सरकार ने मुझे नियु‍क्‍त किया है और ये लोग सरकार विरोधी है। केजी सुरेश के अनुसार, ‘यहां मैं नौकरी कर रहा हूं और मैं इस कैंपस का इस्‍तेमाल सरकार विरोधी, जनविरोधरी और देशविरोधी कामों के लिए नहीं करने दे सकता हूं। खास बात तो यह है कि मुद्दों को उठाने की जगह यहां पर राजनीति हो रही है।


केजी सुरेश ने कहा, ‘ मुझे अपने कॅरियर को लेकर किसी से सर्टिफिकेट लेने की जरूरत नहीं है। मुझे पता है कि मेरी साख क्‍या है और मैंने किस तरह की पत्रकारिता की है। यह सब सरकार को परेशान करने की साजिश चल रही है। इसमें कोरी राजनीति है, जिसका तथ्‍यों से दूर-दूर तक लेना-देना नहीं है।’ 

 

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