जाानें, आखिर क्योंं बढ़ सकते हैं अखबारों के दाम!

जाानें, आखिर क्योंं बढ़ सकते हैं अखबारों के दाम!

Monday, 05 February, 2018

समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।।

कागज निर्माताओं ने कच्‍चे माल के दामों में वृद्धि होने के कारण अपने प्रॉडक्‍ट की कीमतों में भी जनवरी से औसतन 2.5 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी कर दी है। तीन महीने के अंदर यह दूसरा मौका है, जब कागज की कीमतों में बढ़ोतरी की गई है। इससे पहले नवंबर में कागज के दाम बढ़ाए गए थे। इसके विपरीत सितंबर में कागज के दामों में एक प्रतिशत की कमी की गई थी।  

कागज निर्माताओं द्वारा विभिन्‍न क्षेत्रों में कुछ खास किस्‍म के कागजों की कीमतों में पांच प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की गई है। कीमतों में इस वृद्धि के बाद लिखने वाले कागज और छपाई वाले कागज की कीमतों में जनवरी में एक हजार रुपये से दो हजार रुपये प्रति टन तक की बढ़ोतरी हो गई है।

हालांकि भारत में न्‍यूजप्रिंट की ज्‍यादातर जरूरत आयात से पूरी होती है। मिलों में लिखने वाले और छपाई वाले कागज को लेकर ज्‍यादा प्रतिद्वंद्विता नहीं रहती है लेकिन कीमतें बढ़ने से आयात के लिए भी चुनौती हैक्‍योंकि घरेलू बाजार में कीमतें बढ़ने से आयात भी प्रभावित होगा। ऐसे में माना जा रहा है कि आने वाले समय में अखबारी कागज के दाम भी महंगे हो सकते हैं। इसका असर निश्चित रूप से अखबारों की कीमतों पर भी पड़ेगा।

देश भर की पेपर मिलें अपने कागजों की कीमतें आमतौर पर नवंबर से जनवरी के बीच बढ़ाती हैं, क्‍योंकि इस दौरान पब्लिशर्स के बीच बुक्‍स और नोटबुक्‍स की मांग बढ़ जाती है। हालांकि, चालू वित्‍त वर्ष के दौरान कागज निर्माताओं ने मांग को पूरा करने की तुलना में इस वजह से अपने प्रॉडक्‍ट की कीमतें ज्‍यादा बढ़ाई हैं, ताकि कच्‍चे माल की कीमतों में हुई वृद्धि को समायोजित किया जा सके।

अंग्रेजी अखबार बिजनेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित एक रिपोर्ट में इस बावत ‘जेके पेपर लिमिटेडके चीफ फाइनेंसियल ऑफिसर वी.कुमारस्‍वामी का कहना है, ‘हमने विभिन्‍न क्षेत्रों में अपने प्रॉडक्‍ट की कीमतों में अलग-अलग वृद्धि की है। अंतरराष्‍ट्रीय कीमतों में समान वृद्धि के लिए सभी प्रॉडक्‍ट पर औसतन दो प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई है। इससे पहले हमने नवंबर में एक प्रतिशत की बढ़ोतरी इसलिए की थी ताकि सितंबर में कीमतों में की गई कटौती को पूरा किया जा सके।

गौरतलब है कि कागज उत्‍पादन को लाभदायक बनाने के लिए जेके पेपर मिल ने बिजनेस में कई बदलाव किए हैं। बिजनेस को लाभ में पहुंचाने के लिए कंपनी ने पिछले कुछ वर्षों के दौरान कॉस्‍ट कटिंग के कई उपायों को अपनाया है। कुमारस्‍वामी का कहना है कि लिखने वाले और छपाई वाले कागजों की कीमतों में इस बढ़ोतरी का असर आने वाले तिमाहियों में देखने को मिलेगा। अन्‍य कागज निर्माताओं ने भी अपने बिजनेस की स्थिति को सुधारने के लिए तमाम तरह की कॉस्‍ट कटिंग को अपनाया है।    

बताया जाता है कि कागज निर्माण में इस्‍तेमाल होने वाले महत्‍वपूर्ण रॉ मटीरियल पेपर पल्‍पकी कीमतों में पिछले तीन माह में काफी बढ़ोतरी हो गई है। तीन माह पहले जहां यह 650 डॉलर प्रति टन थी, वह बढ़कर अब 780 डॉलर प्रति टन हो गई है। इसके अलावा कोयला भी पिछले कुछ समय में काफी महंगा हो गया है।

West Coast Paper Mills Ltd’ के वाइस चेयरमैन सौरभ बांगड़ का कहना है, ‘चूंकि पिछले कुछ महीनों में कोयला और केमिकल जैसा कच्‍चा माल काफी महंगा हो गया है। ऐसे में हमारे पास अपने प्रॉडक्‍ट की कीमतों को बढ़ाने के अलावा और कोई चारा नहीं था। हमने अपनी कीमतों में 2.5 प्रतिशत की वृद्धि तो जरूर की है लेकिन इसमें से सिर्फ 0.5 प्रतिशत ही हमारे प्रॉफिट में शामिल होगी। बाकी का दो प्रतिशत तो कच्‍चे माल की कीमतों में बराबर हो जाएगा। यदि कच्‍चे माल की कीमतों में लगातार वृद्धि जारी रही तो मार्च तक हम फिर अपने प्रॉडक्‍ट की कीमतों में इजाफा करेंगे। हालांकि यह वृद्धि मार्केट की स्थिति को ध्‍यान में रखकर की जाएगी।

वहीं, ‘इंडियन पेपर मैन्‍यूफैक्‍चरर्स एसोसिएशन’ (IPMA) के महासचिव रोहित पंडित का कहना है, ‘देश में पहली छमाही में करीब 1.9 मिलियन टन कागज आयात किया जा चुका है। माना जा रहा है कि दूसरी छमाही में भी यही स्थिति रहेगी। ऐस में कुल आयात चार मिलियन टन से भी ज्‍यादा होने की उम्‍मीद है जबकि पिछले साल यह तीन मिलियन टन ही था। ऐसे में पिछले साल के मुकाबले इसमें करीब 33 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसके अलावा केमिकल की कीमतें भी पिछले एक साल में लगभग दो गुनी हो गई हैं।’ 


 

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