प्रमोद जोशी की कलम से: सेल्फियों के दौर में मीडिया का ‘पीएम दर्शन’ देख हैरत नहीं होती

प्रमोद जोशी की कलम से: सेल्फियों के दौर में मीडिया का ‘पीएम दर्शन’ देख हैरत नहीं होती

Tuesday, 31 October, 2017

प्रमोद जोशी

वरिष्ठ पत्रकार

(ये लेख प्रमोद जोशी ने 2015 में लिखा था, पर जिस तरह पीएम का दीवाली मंगल मिलन चल रहा है, ऐसे में ये आज भी प्रासंगिक है)

भारतीय जनता पार्टी के दिवाली मिलन समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस साल भी पत्रकारों से मुलाक़ात की। यह कार्यक्रम पिछले साल भी हुआ था। पिछले साल इस कार्यक्रम के पहले तक अटकलें लगाई जा रहीं थीं कि शायद पत्रकारों के साथ जवाब-सवाल भी हों, पर ऐसा नहीं हुआ। लगता है कि यह परम्परा जारी रहेगी। यह जन-सम्पर्क का कार्यक्रम है। इसे मीडिया-मिलन के बजाय मीडिया-दर्शन कहना भी गलत नहीं होगा। कुछ राजनेताओं ने ‘जनता दर्शन’ का प्रयोग भी किया है। ऐसे कार्यक्रमों का जनसम्पर्कीय महत्व है। पिछले साल और इस साल भी कार्यक्रम में सेल्फी लेने और हाथ मिलाने की होड़ रही। ‘पत्रकारों’ का हाथ मिलाने को आतुर होना रोचक लगता है, पर जो है सो है। ऐसे कार्यक्रमों में औपचारिक दुआ-सलाम से ज्यादा कुछ हो भी नहीं सकता। इस कार्यक्रम में ऐसा कुछ नहीं था जिसका जीवंत प्रसारण होता, पर हुआ। मीडिया के नाम पर अब टीवी चैनलों के प्रतिनिधि ही ज्यादातर होते हैं। उनके अपने मूल्य और सिद्धांत हैं।
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हाल में कोलम्बिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जगदीश भगवती ने एक टीवी इंटरव्यू में कहा कि मोदी जी को लोगों से कुछ ज्यादा खुलकर मिलना चाहिए। हाल में असहिष्णुता को लेकर बने माहौल के संदर्भ में उनकी यह राय थी। यों भी राजनेता का अपने समय के लेखकों, पत्रकारों, कलाकारों से सम्पर्क होना चाहिए। पर ज्यादा खुलकर मिलना माने क्या? बेहतर मीडिया प्लानिंग? समय और समाज को समझने के लिए राजनेता का मन बनाने और राजनेता के मन की बात को पाठक के सामने सही संदर्भों में रखने में यह संवाद उपयोगी होता है। हमारे यहां भी परम्परा रही है कि बहुत सी बातें राजनेता पत्रकारों से शेयर करते रहे हैं। उनके साथ खुलकर बात करते रहे हैं। पर स्टिंग के दौर में यह खुलापन जाता रहा।

विश्वनाथ प्रताप सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी का पत्रकारों से, खासतौर से हिन्दी पत्रकारों के साथ करीबी रिश्ता था। मनमोहन सिंह के भी कुछेक पत्रकारों के अच्छे रिश्ते थे। पर वे अपने कार्यकाल में मीडिया से दूर ही रहे। अपने दूसरे कार्यकाल में वे कुल तीन बार चुनींदा मीडियाकर्मियों से रूबरू हुए। अलबत्ता उन्होंने अपने लिए मीडिया सलाहकारों की नियुक्ति की थी, मोदी ने इसकी जरूरत नहीं समझी। मोदी ने विदेश यात्राओं में अपने साथ पत्रकारों का दस्ता ले जाने की परम्परा भी खत्म कर दी। पीवी नरसिंह राव के कुछ पत्रकारों से काफी करीबी रिश्ते थे, बल्कि उन्होंने यदा-कदा छद्मनाम से लिखा भी। नेहरू तो खुद श्रेष्ठ लेखक थे। इंदिरा गांधी की सांस्कृतिक अभिरुचियों का आज के राजनेताओं से तुलना नहीं की जा सकती। आम आदमी पार्टी और अरविन्द केजरीवाल को तो मीडिया का उत्पाद माना जाता है, पर सत्ता में आने के बाद इस पार्टी को भी मीडिया से शिकायतें हैं।

राष्ट्रीय राजनीति में आज भी बहुत से राजनेताओं के पत्रकारों से करीबी रिश्ते हैं, पर मीडिया की विस्फोटक और कारोबारी भूमिका के कारण दोनों के बीच संशय बढ़े हैं। नरेंद्र मोदी के मीडिया-मिलन को लेकर पिछले साल उत्सुकता ज्यादा थी। लगता था कि 16 मई 2014 के बाद से उन्होंने जो दूरी बना रखी थी, वह शायद कम हो। ऐसा नहीं हुआ, बल्कि कई तरह से वह दूरी बढ़ी। पार्टी या मोदी की तरफ से ऐसा होने का सबसे बड़ा कारण है 2002 के गुजरात दंगे और राष्ट्रीय मीडिया की उस पर रिपोर्टिंग। यह विवेचन का विषय है कि सन 2002 से 2007 तक मीडिया की कवरेज किस प्रकार की थी। और यह भी कि उस दौरान मुख्यधारा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का स्वामित्व किसका था, प्रमुख पत्रकार कौन थे और उनकी आज भूमिका क्या है। ऐसा लगता है कि शुरू के दिनों में मोदी ने अपने पक्ष को रखने की कोशिश की, पर बात बिगड़ती गई। मोदी वास्तव में क्या चाहते थे? पत्रकारों का मंतव्य क्या वही था जो मोदी समझते थे? ऐसा क्यों हुआ? इसकी अच्छी वस्तुनिष्ठ पड़ताल अभी तक सामने नहीं आई है।

लोकसभा चुनाव के ठीक पहले मोदी ने कुछ चैनलों के प्रतिनिधियों से जरूर बात की, पर उन बातों में आत्मीयता कम थी, दूरी ज्यादा। और प्रचार की योजना। सन 2012 में मोदी ने उर्दू अख़बार ‘नई दुनिया’ के सम्पादक शाहिद सिद्दीकी के साथ इंटरव्यू के सवाल-जवाब से ज्यादा महत्वपूर्ण बात मीडिया पर इस विषय को लेकर हावी रही कि यह प्रकाशित क्यों हुआ। भाजपा चुनाव समिति का अध्यक्ष बनने के बाद 2013 में विदेशी समाचार एजेंसी रायटर्स के इंटरव्यू में मोदी के ‘कार के नीचे कुत्ते का बच्चा प्रसंग’ ने ऐसा तूल पकड़ा कि शेष सवाल-जवाब पीछे चले गए। अब मीडिया की पहचान मोदी के ‘दोस्त या दुश्मन’ के रूप में ज्यादा है। निष्पक्ष पर्यवेक्षक के रूप में कम। उनके रूपकों से गहरे निष्कर्ष निकालने का चलन खत्म नहीं हुआ है। और मोदी का महत्व जैसे-जैसे बढ़ रहा है वैसे-वैसे मीडिया में ‘प्रचारक’ या ‘प्रतिस्पर्धी’ बनने की होड़ है। ‘करीबी’ या ‘विरोधी’ बनने की कामना बढ़ी है। यह व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं का हिस्सा है और शायद चैनल की व्यावसायिक पहचान भी। पत्रकारीय कर्म को किसी ऊंचे मुकाम पर पहुँचाने की कामना नहीं। एक्सक्ल्यूसिव, विश्लेषण, पड़ताल और प्लांट का भेद खत्म हो चुका है। जो एक्सक्ल्यूसिव है, वह किसी ने कहीं से प्लांट कराया ही होगा। इसलिए सेल्फी पत्रकारिता देखकर हैरत नहीं होती।



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