‘राष्ट्रीय सहारा’ ने बताया- कुछ ऐसे थे वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर...

Wednesday, 06 June, 2018

पत्रकारिता में दशकों गुजारने के बावजूद राजकिशोर पर कोई आरोप नहीं लगा। वे बेदाग आए और बेदाग ही हमसे विदा हो गए।कुछ इस तरह अपने संपादकीय में हिंदी दैनिक राष्ट्रीय सहारा ने वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर को श्रृद्धांजलि दी, जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं-

विदा हुए राजकिशोर

हिंदी पत्रकारिता के मौजूदा दौर में अगर किसी एक लेखक के लेखन को सामने लाया जा सकता है, वह राजकिशोर हैं। उन्होंने पत्रकारीय लेखन में अपना मापदंड स्वयं स्थापित किया, जिसमें किसी की नकल नहीं थी। वे शब्दों और वाक्यों की संयोजन-कला में निष्णात थे। ऐसी अद्भुत लेखन शैली जिसे पढ़ने पर हमेशा कुछ न कुछ नया सीखने को मिलता था।

उनके लेखन की विशालता और विविधता को देखते हुए यह कहना मुश्किल है कि बुनियादी रूप से पहले वह रचनाकार थे या पत्रकार। हिंदी जगत ने देखा कि उनमें इन दोनों के अद्भुत संगम के साथ एक निर्लिप्त दार्शनिकता थी, जिसमें भारत की खोज के आगे उसे सुंदर बनाने की बेचैनी थी-भेदभावों से विलग लोकतांत्रिक-समतावादी-बहुलतावादी भारत की। एक पत्रकार और लेखक के रूप में उनका समाज एवं राजनीति पर अपने स्पष्ट विचार भी थे। स्त्री-पुरुष : कुछ पुनर्विचारतथा स्त्रीत्व का उत्सवनामक उनकी पुस्तकें महिलाओं की समस्याओं से लेकर उससे निकलने के बनते रास्ते तथा समाज में उनके स्थान पर ऐसी टिप्पणियां हमारे सामने लाती हैं, जो अन्यत्र उपलब्ध नहीं हैं। पत्रकारिता के परिप्रेक्ष्यनामक पुस्तक में पत्रकारिता के उन सारे पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है, जिनके बारे में हम बराबर चर्चा करते रहते हैं।

सामाजिक न्याय की राजनीति के समर्थक होते हुए भी उन्होंने इसके वर्तमान राजनीतिक पुरोधाओं की विसंगतियां उजागर करने में पीछे नहीं रहे। उनकी निर्भीकता केवल लेखन में ही नहीं, जीवन में झलकती थी। उनका राजनीतिक लेखन किसी पार्टी या नेता के प्रति झुकाव रखने वाला कभी नहीं रहा। वे विचार पुंज थे तथा अपने विचारों पर अंतिम समय तक दृढ़ रहे। उनके विचार से सहमत-असहमत होने वालों की संख्या लंबी है, पर उनके लेखन के सब कायल थे। राष्ट्रीय सहाराके जन्मकाल से ही वह इसके सम्पादकीय पृष्ठ और हस्तक्षेपपरिशिष्ट के लिए जैसे अपरिहार्य हो गए थे।

हाल-हाल तक वह परत दर परतस्तंभ के लेखक थे। पत्रकारिता में दशकों गुजारने के बावजूद उन पर कोई आरोप नहीं लगा। वे बेदाग आए और बेदाग ही हमसे विदा हो गए। उनके जाने के बाद उनकी पुस्तकें उनकी वैचारिक उपस्थिति का हमें अहसास कराती रहेंगी। ऐसे राजकिशोर जी को हमारी तरफ से विनम्र श्रद्धांजलि।

 

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