ऐसी ख़बरें मीडिया की विश्वसनीयता को कम करती हैं… ऐसी ख़बरें मीडिया की विश्वसनीयता को कम करती हैं…

ऐसी ख़बरें मीडिया की विश्वसनीयता को कम करती हैं…

Monday, 14 May, 2018

नीरज नैय्यर ।।

एक जमाना था जब मीडिया में आई ख़बरों को पत्थर की लकीर माना जाता था। लोग आंख मूंद कर विश्वास कर लिया करते थे, लेकिन आजकल स्थिति विपरीत हो गई है। अख़बार या न्यूज़ चैनल पर आई खबर को लोग ये कहकर नज़रंदाज़ कर देते हैं कि मीडिया वाले तो कुछ भी लिखते हैं।इस नकारात्मक बदलाव के लिए कोई और नहीं बल्कि मीडिया और पत्रकार खुद दोषी हैं।

 

आजकल मीडिया सही और तथ्यपरख नहीं बल्कि महज ख़बरें पहुंचाने का माध्यम भर रह गया है। हालांकि ऐसा हरगिज़ नहीं है कि पूरी की पूरी मीडिया बिरादरी ही इस राह पर चल निकली है। कई संस्थान अभी भी पत्रकारिता के मूल्यों को जीवित रखे हुए हैं, लेकिन जिस तरह से सबसे आगे रहने की होड़ में बिना तथ्यों को टटोले ख़बरें सामने आ रही हैं वो पूरी बिरादरी के लिए शर्म की बात है।

 

अंग्रेजी अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया के 11 मई के अंक में फ्रंट पेज पर नीरज चौहान की बाइलाइन खबर छपी है। इस खबर में उन्होंने उन्नाव बलात्कार मामले में भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को दोषी करार दे दिया है। उन्होंने लिखा है कि सीबीआई की जांच में यह सिद्ध हो गया है कि सेंगर ने ही पिछले साल जून को उत्तर प्रदेश के माखी गांव के अपने घर पर पीड़िता के साथ बलात्कार किया थाजबकि उनकी महिला सहयोगी शशि सिंह कमरे के बाहर गार्ड बनकर खड़ी थी। इस खबर के सामने आने के बाद हड़कंप मच गया, जो स्वाभाविक भी था। आनन-फानन में कई अन्य मीडिया संस्थानों ने भी प्रमुखता से अपनी वेबसाइट पर इसे चस्पा कर दिया, बिना इस बात का पता लगाये कि क्या वास्तव में ऐसा है।


अमर उजाला, जीन्यूज और पत्रिका की वेबसाइट पर अभी भी ये खबर मौजूद है। जबकि सीबीआई ने उसी दिन यानी 11 मई को इसका खंडन किया था। जांच एजेंसी ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर स्पष्ट किया है कि उन्नाव गैंगरेप केस की जांच अभी जारी है। सीबीआई ने लिखा है, ‘उन्नाव मामले की जांच अभी भी चल रही है और अभी तक किसी भी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा गया है। सीबीआई ने इस केस को लेकर कोई नया अपडेट मीडिया को जारी नहीं किया है। इस संबंध में प्रकाशित/प्रसारित ख़बरें पूरी तरह से काल्पनिक हैं।

 

अब इस घटना को भेड़चाल नहीं कहा जाए तो क्या कहा जाए? क्या बाकी संस्थानों को टाइम्स ऑफ़ इंडिया की खबर को ज्यों का त्यों इस्तेमाल करने से पहले जांच-परख नहीं करनी चाहिए थी? इस घटना ने मीडिया को उपहास का पात्र तो बनाया ही साथ ही उसकी विश्वसनीयता को एक बार फिर से कटघरे में खड़ा कर दिया। इस प्रवृत्ति पर लगाम लगाना बेहद ज़रूरी है, वरना आने वाले दिनों में मीडिया में आने वाली ख़बरों को न तो तवज्जो मिलेगी और न ही कोई उस पर विश्वास करेगा।

 

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