श्रद्धांजलि: जब नर्गिस को देखकर नर्वस हुए थे दत्त साहब, रद्द करना पड़ा था इंटरव्यू

श्रद्धांजलि: जब नर्गिस को देखकर नर्वस हुए थे दत्त साहब, रद्द करना पड़ा था इंटरव्यू

Friday, 25 May, 2018

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

लीजेंड एक्टर सुनील दत्त बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। वे एक पत्रकार, अभिनेता, सामाजिक कार्यकर्ता होने के साथ-साथ राजनीतिज्ञ भी थे। सुनील दत्त 25 मई 2005 को दुनिया से रुखसत हो गए थे। आज उनकी पुण्यतिथि के मौके पर हम आपको उनसे जुड़ी कुछ रोचक बातें बता रहे हैं। 

सुनील दत्त ने फिल्मों के साथ-साथ सामाजिक जीवन में भी बहुत कुछ ऐसा किया जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने ड्रग्स और कैंसर के प्रति लोगों में जागरुकता लाने के लिए दो बार मुंबई से चंडीगढ़ तक पदयात्रा की थी। बंटवारे के बाद पाकिस्तान के हिस्से में चले गए झेलम ज़िले के खुर्दी नामक गांव में उनका जन्म हुआ। उनका असली नाम बलराज दत्त था।

सुनील जब पांच साल के थे, तभी उनके पिता की मृत्यु हो गई थी। मुंबई आने के बाद सुनील दत्त को अपने शुरुआती दिन फुटपाथ पर बिताने पड़े और मुंबई के जयहिंद कॉलेज की पढ़ाई के अलावा रोटी कमाने की जुगत में लगना पड़ा। यही वो दौर था कब सुनील दत्त ने एक तरह से पत्रकारिता में कदम रखा और यहीं से उनकी जिंदगी पूरी तरह पलट गई। उन्होंने ब्रितानी विज्ञापन कंपनी और रेडियो सिलोन के लिए काम करना शुरू किया। यहां उनका काम था फिल्मी कलाकारों के साक्षात्कार लेना। सुनील दत्त को प्रत्येक साक्षात्कार के लिए उन्हें 25 रुपए मिलते थे। रेडियो सीलोन दक्षिणी एशिया का सबसे पुराना रेडियो स्टेशन है। यहां काम करके उन्होंने काफी शौहरत हासिल की। लोग उनकी आवाज के दीवाने हो गए थे।

ये वो दौर था जब बॉलिवुड में नरगिस को टक्कर देने वाला कोई नहीं था। सुनील दत्त नरगिस के बहुत बड़े फैन थे और पत्रकार के रूप में उन्हें नरगिस से मुलाकात का जल्द ही मौका मिला। एक रोज सुनील को पता चला कि उन्हें नरगिस का इंटरव्यू लेना है। इसके लिए सुनील दत्त ने काफी तैयारी की, पर नरगिस का सामने आते ही वो सबकुछ भूल गए और एक भी शब्द नहीं बोल पाए, जिसके चलते इंटरव्यू ही कैंसिल करना पड़ा। एक सफल उद्घोषक बनने के बाद सुनील किसी नए क्षेत्र में हाथ आजमाना चाहते थे, इसलिए रेडियो की नौकरी छोड़कर वह फिल्मों में एक्टर बन गए।

मुंबई आने से पहले सुनील काफी समय तक लखनऊ में भी रहे। बाद में ग्रेजुएशन के लिए वह मुंबई चले गए। कम ही लोग जानते हैं कि जय हिंद कॉलेज में पढ़ाई के दौरान दत्त ने बस डिपो में चेकिंग क्लर्क के रूप में काम किया जहां उन्हें 120 रुपए महीना मिला करता था। वैसे तो सुनील दत्त ने अपने सिने करियर की शुरुआत वर्ष 1955 में प्रदर्शित फिल्म 'रेलवे प्लेटफॉर्म' से की। लेकिन उन्हें असल पहचान 1957 में प्रदर्शित फिल्म 'मदर इंडिया' से मिली। इस फिल्म में सुनील दत्त निगेटिव शेड में थे। 

मदर इंडिया ने सुनील दत्त के करियर के साथ ही व्यक्तिगत जीवन मे भी बहुत बड़ा बदलाव लाया। फिल्म की शूटिंग के दौरान नर्गिस आग से घिर गईं थीं और उनका जीवन संकट मे पड़ गया था। उस समय वह अपनी जान की परवाह किए बिना वे आग मे कूद गए और नर्गिस को लपटों से बचा ले आए। इस हादसे मे सुनील दत्त काफी जल गए थे। इसी घटना के बाद दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया था। डकैतों के जीवन पर बनी उनकी सबसे बेहतरीन फिल्म 'मुझे जीने दो' ने वर्ष 1964 का फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार जीता। इसके बाद 1966 में खानदानके लिए उन्हें फिर से फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार मिला।

अभिनेता के साथ-साथ सुनील ने कई फिल्मों का निर्माण भी किया, हालांकि ज्यादा सफलता नहीं मिली। 1981 में अपने पुत्र संजय दत्त को लॉन्च करने के लिए उन्होंने रॉकीका निर्देशन किया। यह फिल्म जबरदस्त हिट साबित हुई। फिल्मों में कई भूमिकाएं निभाने के बाद सुनील दत्त ने राजनीति में भी प्रवेश किया और कांग्रेस पार्टी से लोकसभा के सदस्य बने। 1968 में सुनील दत्त पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किए गए। उन्होंने लगभग 100 फिल्मों में अभिनय किया। 

 

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