BW exclusive: आपके मन में आने वाले हर 'सवाल' का अरनब गोस्वामी ने दिया जवाब...

Monday, 03 April, 2017

वरिष्‍ठ पत्रकार अरनब गोस्‍वामी अपने आप में बड़ा नाम है। अरनब गोस्‍वामी की गिनती उन लोगों में होती है जो मार्केट में ट्रेंड स्‍थापित करते हैं। अपने फ्लैगशिप शो ‘Newshour’ को वह बुलंदियों पर ले जा चुके हैं और अपने समय में उनका चैनल ‘Times Now’ निर्विवाद रूप से मार्केट में लीडरशिप की पोजीशन पर रहा है।

arnab1अब अरनब अपना बहुप्रतीक्षित न्‍यूज वेंचर ‘Republic TV’ लॉन्‍च करने की तैयारी में है। आने वाले कुछ हफ्तों में ही इसके लॉन्‍च होने की उम्‍मीद है। अरनब के इस नए वेंचर के बारे में कहा जा रहा है कि यह पहला वेंचर होगा, जो पत्रकारों द्वारा चलाया जाएगा और इसका प्रबंधन भी पत्रकारों के हाथ में होगा। अरनब गोस्‍वामी ने अपने वेंचर के लिए जिन पत्रकारों को हायर किया है, उनकी औसत उम्र 25 साल है। इस बारे में अरनब का कहना है कि ये युवा ही देश का भविष्‍य हैं और इनमें भारत को बदलने की क्षमता है।

बिजनेसवर्ल्‍ड (Businessworld) के सुमन कुमार झा के साथ एक इंटरव्‍यू के दौरान अरनब ने कहा कि यह एक हिंग्लिश चैनल होगा। उन्‍होंने इन आरोपों को बेबुनियाद बताया कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कट्टर समर्थक हैं और कहा कि वह ललितगेट ‘Lalitgate’ जैसी स्‍टोरी करते रहेंगे। अरनब का कहना है कि कुछ चैनल नहीं चाहते हैं कि ‘रिपब्लिक’ शुरू हो, इसके लिए इन चैनलों ने तमाम तरह के हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए हैं और वे डिस्‍ट्रीब्‍यूटर्स से रिपब्लिक का प्रसारण एक माह के लिए बंद करने को कह रहे हैं। अरनब गोस्‍वामी का यह भी कहना है कि वह लुटियंस दिल्ली की पत्रकारिता से बंधकर नहीं रहने वाले हैं और इससे स्‍वतंत्र होंगे, जैसा कि मीडिया पिछले 70 वर्षों में नहीं कर पाई है। उन्‍होंने भरोसा जताया कि उनका वेंचर लोगों का न्‍यूज देखने का नजरिया बदल देंगा।

प्रस्‍तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश :

सबसे पहले लोग यह जानना चाहते हैं (the nation wants to know) ‘रिपब्लिक टीवी’ कब शुरू होगा। क्‍या आपने इसके लिए कोई तारीख तय कर रखी है ?

रिपब्लिक टीवी कब शुरू होगा, इसके बारे में मैंने कोई निश्चित समय तय नहीं किया है। लेकिन जिस हिसाब से हम इसको लेकर काम कर रहे हैं, उसके अनुसार उम्‍मीद है कि यह कुछ हफ्तों में शुरू हो सकता है। अब इसमें ज्‍यादा समय नहीं है और हम जल्‍द ही इसे लॉन्‍च करने के करीब हैं। चूंकि मेरा मानना है कि जब भी लॉन्‍च करो, आपका प्रॉडक्‍ट परफेक्‍ट होना चाहिए, ऐसे में मुझे काफी खुशी हो रही है कि हमने काफी अच्‍छा प्रॉडक्‍ट तैयार किया है और अब यह बनकर तैयार है। मैं हवा में बात करने वालों में से नहीं हूं बल्कि मैं काम करने में यकीन रखता हूं। जैसे ही हम इसकी लॉन्चिंग को लेकर तैयारी पूरी कर लेंगे, उसके बाद जल्‍द ही इसे लॉन्‍च कर दिया जाएगा।

आप मार्केट के लीडर रह चुके हैं। आपके फ्लैगशिप शो ‘Newshour’ ने भी काफी नाम कमाया। ऐसे में आप अपनी वही पुरानी पोजीशन arnab2हासिल करने के लिए किस तरह की योजना बना रहे हैं। क्‍या इसको लेकर आपने अपने मन में कोई लक्ष्‍य अथवा समय सीमा तय की है?

मुझे किसी पोजीशन पाने के चक्‍कर में नहीं पड़ना है। ‘Newshour’ के दौरान हम मार्केट में छाये हुए थे। हम एक बार फिर वापसी करेंगे और दोबारा से मार्केट पर छा जाएंगे। इस समय मार्केट में कोई लीडर नहीं है। जैसा कि आपको पता ही होगा कि अंग्रेजी टीवी न्‍यूज मार्केट भी पहले वाली स्थिति में नहीं है। इस समय सभी चैनल खुद के नंबर वन होने का दावा कर रहे हैं। इस बात से ही साफ पता चल जाता है कि इस समय मार्केट में कोई भी चैनल लीडर की भूमिका नहीं निभा रहा है। ऐसे में जब मार्केट पूरी तरह साफ है और कोई भी लीडर बनने की स्थिति में नहीं है तो मेरे लिए यह काफी सही स्थिति है। सच कहूं तो ‘Times Now’ की रेटिंग में 15-20 प्रतिशत की गिरावट को लेकर मैं खुश नहीं हूं क्‍योंकि यही वो चैनल है जिसका मैंने नेतृत्‍व किया था और उस समय हमारे और प्रति‍द्वंद्वियों के बीच 20 प्रतिशत का अंतर था। यही नहीं, सुपर प्राइम टाइम में तो हमारे और प्रति‍द्वंद्वियों के बीच में 50 प्रतिशत से ज्‍यादा का अंतर (gap) था। अब वह गैप दिखाई नहीं देता है। क्‍या मैं इस बात से खुश हूं?, नहीं बिल्‍कुल नहीं। क्‍या रिपब्लिक को लॉन्‍च करने का मेरे लिए यह उचित समय है? हां, इसलिए मुझे किसी तरह का एरिया वापस हासिल (recapture) करने की कोई जरूरत नहीं है। रिपब्लिक पहले दिन से ही मार्केट में लीडर होगा।

 आपकी प्रतिस्‍पर्द्धा किसके साथ है यानी आप किसे अपना प्रतिद्वंद्वी मानते हैं?

मेरी प्रतिस्‍पर्द्धा पत्रकारिता में हमारे अपने इनोवेशंस (innovations) से है, जो मैं और मेरी टीम पिछले दस वर्षों में लेकर आई है। हमारी पत्रकारिता हमारे दिल में बसती है। ऐसे में हमारी किसी के साथ कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं है खासकर इंग्लिश न्‍यूज जॉनर (genre) में। हम पत्रकारिता का एक नया स्‍वरूप लेकर आने वाले हैं और इसे हम बहुत आगे के लेवल तक ले जाएंगे। इसमें आक्रामकता (aggression), जवाबदेही (accountability), जिम्‍मेदारी (responsibility), जांच-पड़ताल (investigations) और साक्षात्‍कार (interviewing) शामिल होगा। हम ये सब दोबारा से शुरू करने वाले हैं। आप जानते ही होंगे कि आप किसी दूसरे से मुकाबला नहीं कर सकते हैं। कहा जा रहा है कि टीवी दर्शकों में सिर्फ छह प्रतिशत लोग ही न्‍यूज जॉनर को देखते हैं। मैं इन छह प्रतिशल लोगों को लेकर किसी से कोई मुकाबला करने नहीं जा रहा हूं। मैं यहां अन्‍य 94 प्रतिशत लोगों के लिए काम कर रहा हूं। मेरा स्‍टाइल हमेशा से दर्शकों की संख्‍या बढ़ाने वाला रहा है, जैसा कि मैंने ‘Times Now’ में किया था। हमने इंग्लिश न्‍यूज जॉनर का विस्‍तार किया था और अब हम सभी जॉनर को आगे बढ़ाएंगे।

आपने न्‍यूज यूनिवर्स के विस्‍तार की बात कही है। बार्क (BARC) रेटिंग के अनुसार, पिछले एक महीने में अंग्रेजी न्‍यूज चैनल की व्‍युअरशिप में 45 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में आप क्‍या सोचते हं कि क्‍या यह आपके लिए शुभ संकेत हैं?

हां, ये हमारे लिए बहुत अच्‍छे संकेत हैं लेकिन मैंने हमेशा से कहा है कि अंग्रेजी न्‍यूज व्‍युअरशिप पूरी तरह से इन नंबरों से रिफ्लेक्‍ट नहीं होती है। मेरा मानना है कि जल्‍द ही यह नंबर 100 प्रतिशत का आंकड़ा पार कर जाएंगे। आज के समय में हिन्‍दी चैनलों के मुकाबले अंग्रेजी न्‍यूज जॉनर पांच से छह गुना आगे बढ़ रहा है। पांच साल पहले सिर्फ हिन्दी चैनल ही आगे बढ़ रहे थे। ऐसे में सवाल उठता है कि हिन्‍दी के मुकाबले अंग्रेजी न्‍यूज चैनल क्‍यों पांच गुना आगे बढ़ रहा हैं? इसका जवाब बिल्‍कुल साफ है कि लोग इन दिनों अंग्रेजी ज्‍यादा बोल रहे हैं1 वह हिंग्लिश में बातचीत करते हैं। मैं भी हिंग्लिश पर ही काम कर रहा हूं।

यदि हम अंग्रेजी न्‍यूज चैनलों की बात करें तो इनकी संख्‍या काफी है। आपको क्‍या लगता है, इनमें से कितने चैनल लंबे समय तक चल सकेंगे?

यदि मैं अपनी बात करूं तो मेरे लिए कोई भी खिलाड़ी नहीं है। मेरे लिए सिर्फ रिपब्लिक है और बाकी सब अलग हैं। आपको वो दिन याद ही होंगे जब मेरा शो आता था और अन्‍य शो भी आते थे। हमें 80-85 व्‍युअरशिप क्‍यों मिली? अब क्‍या चीजें समाप्‍त हो गई हैं? Times Now में अब क्‍या हो रहा है और क्‍यों यह आगे नहीं बढ़ पा रहा है? इसलिए हम किसी से भी अपनी प्रतिस्‍पर्द्धा मानकर नहीं चल रहे हैं। जहां तक इंग्लिश न्‍यूज जॉनर की बात है तो हमारे लिए एक बात बिल्‍कुल साफ है कि लोग ईमानदारी (honesty), स्‍पष्‍टवादिता (straightforwardness) और सीधे प्रहार (directness) को पसंद करते हैं। इसलिए एक तरफ हम हैं और दूसरी तरफ अन्‍य नकल करने वाले (copycats) लोग हैं। लोग ऐसे नकलचियों को देखना पसंद नहीं करते हैं। ये लोग आपस में ही लड़ते-झगड़ते रहेंगे। मैं उन्‍हें शुभकामना देता हूं। ऐसे लोगों से मेरी गुजारिश है कि अब तो समझ जाएं कि वो क्‍या कर रहे हैं, नकलची कभी सफल नहीं होते हैं। हालांकि असली (original) की गैरमौजूदगी में ऐसे लोग कुछ समय तक तो अपने आपको तीसमारखां समझ सकते हैं लेकिन कुछ हफ्ते बाद ऐसे लोगों की यह गलतफहमी दूर हो जाएगी।

अभी आपने इंग्लिश न्‍यूज चैनलों के विस्‍तार की बात कही थी लेकिन कई लोगों का मानना है कि यह कोई मुद्दा नहीं है और यदि हिन्‍दी न्‍यूज चैनलों के संदर्भ में देखें तो यह काफी असंगत है। ऐसे में आप इस धारणा को किस रूप में लेते हैं और क्‍या इसे बदला जा सकता है?

मैं इस तरह की धारणा को कोई चुनौती देना नहीं चाहता हूं। मैंने तो सिर्फ आपसे यह कहा था कि बार्क के जो आंकड़े आए हैं, उनके अनुसार हिन्‍दी न्‍यूज जॉनर के मुकाबले अंग्रेजी न्‍यूज जॉनर काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है। इसलिए मुझे नहीं लगता कि इस बात को चुनौती देने की कोई जरूरत है। नबरों ने अपने आप ही सारी चीजें स्‍पष्‍ट कर दी हैं। मैं हिन्‍दी न्‍यूज जॉनर के खिलाफ नहीं हूं और न ही उसके साथ मेरी कोई प्रतिद्वंद्विता है। इंग्लिश/हिंग्लिश न्‍यूज जॉनर का प्रभाव काफी बढ़ रहा है और बातचीत भी अब इसमें ज्यादा होती है। ऐडवर्टाइजर्स मेरे अनुसार किसी प्रॉडक्‍ट को लेकर अपनी अप्रोच नहीं बदलेंगे। आजकल ऐडवर्टाइजर्स ज्‍यादा से ज्‍यादा संवाद पर निर्भर हैं। वे भी देश के अच्‍छे नागरिक हैं, इ‍सलिए वे ऐसी न्‍यूज चाहते हैं जो देश में बदलाव ला सके। वे ऐसे न्‍यूज चैनल देखना चाहते हैं जिन पर महिला अधिकारों अथवा सामाजिक मुद्दों पर बातचीत हो। हमने लगातार ऐसा किया है और मुझे काफी खुशी होगी जब इस तरह की पत्रकारिता के लिए लोग मुझसे जुड़ेंगे। मैं यहां उन चीजों को कर रहा हूं, जिनका देश पर काफी अच्‍छा प्रभाव पड़े। अब टीवी न्‍यूज देखने वालों से अपील करूंगा कि वे मुझे देखें। मैं यहां पर देश के सभी टीवी न्‍यूज देखने वाले दर्शकों से अपील करूंगा कि वे मुझे देखें।

 arnab3आप इस बात पर जोर दे रहे हैं कि आप हिंग्लिश न्‍यूज जॉनर में यकीन रखते हैं, तो क्‍या यह मार्केट में बदलाव की वजह से है या आपने हमेशा से ही ऐसा किया है?

मुझे नहीं पता कि लोग कभी-कभी इतने बड़े शब्‍दों का इस्‍तेमाल क्‍यों करते हैं।मुझे लगता है कि एंकर्स को ज्‍यादा महत्‍व देते हुए खुद को दर्शकों से अलग कर रहे हैं, जो पहले ऐसा कर चुके हैं। ऐसे लोगों को अपनी गलती सुधार लेनी चाहिए। कुछ एंकर्स जो अभी भी दून स्‍कूल की भाषा में बात करते हैं उन्‍हें यह समझ लेना होगा कि दून स्‍कूल की भाषा का न तो कोई वर्तमान है और न ही कोई भविष्‍य है, यह देश के लिए अब पुरानी बात हो चुकी है। लेकिन जो केंद्रीय विद्यालय हमारा अतीत है, वही अब देश का वर्तमान और भविष्‍य है। अब हमें उच्‍च वर्ग के उन झूठे दावों से ऊपर उठना होगा, जो कुछ सेक्‍शंस में अंग्रेजी न्‍यूज का प्रतिनिधित्‍व करते हैं।

मैं एक ऐसे ब्रॉड बेस्‍ट वर्जन की बात कर रहा हूं जैसा भारत होगा और यही कारण है कि मैं अंग्रेजी का विरोध नहीं कर रहा हूं। मैं हिंग्लिश की बात कर रहा हूं। इसलिए मेरी बातों का गलत मतलब न निकालें। मैं इंग्लिश में बात कर रहा हूं लेकिन मैं तीन-चार अन्‍य भारतीय भाषाओं में आसानी से माइग्रेट कर सकता हूं। यह मेरी ताकत है, न कि मेरी कमजोरी।

अभी तक पारंपरिक पत्रकार की छवि निर्विकार (faceless entity) की थी इसलिए वह सिर्फ रीडर और न्‍यूज के बीच एक माध्‍यम था। दूसरे शब्‍दों में कहें तो आपकी इमेज एक रॉकस्‍टार की बनी हुई है। ऐसे में आपको क्‍या लगता है कि अब पत्रकारों की भूमिका बदल चुकी है, जिसमें वह सिर्फ एक विषय बन गया है, जैसे विषय की वह जाच करता है ?

मैं खुद को रॉकस्‍टार नहीं मानता हूं। मैं यह नहीं सोचता कि पत्रकारों को फेसलेस अथवा नेमलेस होना चाहिए। हालांकि कुछ मीडिया संस्‍थान इसमें विश्‍वास रखते हैं। मैं आपको समझाता हूं, जैसे मैंने हमेशा से पत्रकारिता के लिए काम किया न कि किसी कॉरपोरेट मीडिया ग्रुप के लिए। जब मैं कॉरपोरेट मीडिया के साथ काम कर रहा था तो मैंने यह स्‍पष्‍ट कर दिया था कि मैं सिर्फ अपने प्रति जवाबदेह होऊंगा। इसलिए मैं फेसलेस रिपोर्टिंग में विश्‍वास नहीं रखता हूं। इसलिए एक रिपोर्टर को मजबूत बनाना चाहिए और उसका आदर करना चाहिए। कुछ मीडिया ग्रुप अपने एडिटर्स, एंकर्स और रिपोर्टर्स को लेकर क्‍यों असुरक्षित महसूस करते हैं, ये वही बेहतर जानते हैं। ये मीडिया मालिक बड़े इंस्‍टीट्यूट को रिप्रजेंट करते हैं। हालांकि उन्‍होंने इन इंस्‍टीट्यूशंस को बनाया नहीं है बल्कि यह उन्‍हें विरासत में मिला है। हमें रिपब्लिक अपने परिवार से विरासत में नहीं मिला है बल्कि हम इसे खुद तैयार कर रहे हैं। मुझे लगता है कि यह ज्‍यादा सम्‍माननीय कार्य है। जब हम एक-एक ईंट को जोड़कर किसी चीज का निर्माण करते हैं तो हमें उसमें काम करने वालों की कद्र भी होती है। ऐसे लोग मेरे कर्मचारी नहीं हैं, बल्कि वे मेरे पार्टनर्स हैं। उन्‍हें लेकर मेरे मन में कभी असुरक्षा की भावना नहीं रहती है। सभी सही सोच रखने वाले पत्रकारों से आज मैं अपील करता हूं कि वे मीडिया मालिकों से खुद को ऊपर उठाकर रखें। ऐसे मीडिया मालिकों के लिए काम न करें जो पत्रकारों को चलाते (run down) हैं, जो कंटेंट तैयार करने वालों को चलाते हैं। ऐसे मीडिया मालिक आपको पैसा तो दे सकते हैं लेकिन उनके साथ काम करने लायक नहीं है।

दिल्‍ली की मीडिया को आप कंप्रोमाइज्‍ड मीडिया (compromised media) कहते हैं। दिल्‍ली की मीडिया के बारे में आपकी यह सोच क्‍यों है?

आपको यह समझना चाहिए कि जब भी मैं लुटियंस मीडिया की बात करता हूं तो मैं इसकी नैतिकता के बारे में बात कर रहा होता हूं। दरअसल यहां की मीडिया के अंदर साहस की कमी है। उसके अंदर इतनी हिम्‍मत नहीं है कि वह भ्रष्‍टाचार के खिलाफ खड़ी हो सके, बस यही कंप्रोमाइज्‍ड मीडिया है। मैं ऐसी मीडिया को कभी भी सैल्‍यूट नहीं करूंगा। यदि कोई 70 साल का व्‍यक्ति है और वह गलत है तो किसी न किसी को उस व्‍यक्ति के खिलाफ खड़े होकर कहना चाहिए कि वह गलत है। मेरे मामले में भी लुटियंस मीडिया करीब 70 साल की हो चुकी है। ऐसे में सिर्फ उसकी उम्र को देखते हुए मेरे जैसा पत्रकार सिर्फ इसी नाते उसे सम्‍मान नहीं दे सकता है। मैं यह देखना चाहता हूं कि वे करते क्‍या हैं और सच्‍चाई यही है कि पिछले 70 वर्षों में उन्‍होंने कुछ भी नहीं किया है। सिर्फ यही कारण है कि मैं उन्‍हें कंप्रोमाइज्‍ड मीडिया कहकर बुलाता हूं।

आप भी मानते हैं कि ‘ओपिनियन’ पत्रकारिता का भविष्‍य है। ऐसे में कुछ लोग यह भी कहते हैं कि आप ज्‍यादा ज्ञान की बात करते हैं। इस बारे में आपका क्‍या कहना है?

जब भी हम कोई स्‍टोरी ब्रेक करते हैं तो उसमें तथ्‍य (Facts) बहुत जरूरी होते हैं और तथ्‍यों व गहरे विश्‍लेषण के आधार पर हमने कई स्‍टोरी ब्रेक की हैं। लेकिन मेरा मानना है कि फैक्‍ट्स तो उपलब्‍ध होते हैं और ओपिनियन बहुत अच्‍छी चीज है। लेकिन पिछले दस वषों में हमने लोगों को यह बताने के लिए पर्याप्‍त काम किया है कि हमारे तथ्‍य गलत नहीं हैं। मेरे कहने का मतलब है कि तथ्‍यों के मामले में हम इतने सही ह कि सिर्फ एक बार हमारे टीवी चैनल पर तथ्‍यों में गड़बड़ी पर मुझे कोर्ट में भी घसीटा गया। में ईमानदारी से कोर्ट में खड़ा रहा। मैंने सुप्रीम कोर्ट में भी पेश हुआ। कोर्ट में पेश होने के बाद मुझे यह अच्‍छी तरह समझ में आ गया कि फैक्‍ट्स काफी महत्‍वपूर्ण हैं। मुझे यह समझ में आ गया कि मुझे अपने तथ्‍यों को लेकर और ज्‍यादा सावधानी बरतनी चाहिए। मैं तब से इस तरह की बातों को लेकर काफी सतर्क हूं। लेकिन मेरा कहना है कि ओपिनियन ही पत्रकारिता का भविष्‍य है और इसे तथ्‍यों के खंडन की जरूरत नहीं है।

लेकिन पारंपरिक स्‍कूलों में पढ़ने वाले बहुत से लोग क्‍या कहेंगे ?arnab

मैं किसी तरह के पारंपरिक (conventional) स्‍कूल में भरोसा नहीं करता हूं। ये पारंपरिक स्‍कूल कौन हैं और ये मुझे पढ़ाने वाले कौन हैं। ये कहां से और क्‍यों आए हैं और इन्‍होंने ऐसा क्‍या किया है जो मैंने नहीं किया। इस देश के 85 प्रतिशत लोगों ने मुझे देखा है और ऐसे पारंपरिक स्‍कूल 15 प्रतिशत के साथ ही स्‍ट्रगल कर रहे हैं। मैं जो भी करता हूं, वे मेरी और मेरी टीम का स्‍टाइल है। मैं ऐसे नकल करने वालों को पारंपरिक स्‍कूल मानकर क्‍यों चलूं। अब नई तरह की पत्रकारिता की शुरुआत हो रही है और मैंने पुरानी वाली पत्रकारिता को नकार दिया है। आपको मुझसे इस तरह के स्‍कूलों के बारे में सवाल नहीं पूछने चाहिए। मैंने अपने आपको दिल्‍ली की मीडिया से अलग घोषित कर रखा है। इसलिए इसे इसी रूप में लें। यही मेरी इंडिपेंडेंस की घोषणा है। इसलिए पारंपरिक स्‍कूल के बारे में लगातार यह सवाल मेरी समझ से परे है।

आप ग्‍लोबल न्‍यूज एकत्रित करने के खिलाड़ी के रूप में भी रिपब्लिक को पेश कर रहे हैं। ग्‍लोबल न्‍यूज के बारे में हमारे पास कोई भारतीय दृष्टिकोण नहीं है। ऐसे में आप इस जर्नी के बारे में इतने भरोसे से कैसे कह रहे हैं ?

 इस बात को लेकर मुझे पूरा भरोसा है। जब हमने टाइम्‍स नाउ शुरू किया था तब हमने रॉयटर्स के पास जाकर चैनल को खड़ा करने के लिए कुछ इन्‍वेस्‍टमेंट की बात कही थी। मुझे यह बताते हुए काफी फख्र महसूस हो रहा है कि उस समय 15 देशों के लोगों को मैंने टीवी का प्रशिक्षण दिया था। इनमें से कुछ ग्‍लोबल न्‍यूज एडिटर्स को तो मुंबई के लोअर परेल स्थित हमारे न्‍यूजरूम में ट्रेनिंग दी गई थी। इस बात से मुझे यह भरोसा हो गया कि हम विभिन्‍न कल्‍चर और विविध माहौल में भी काम कर सकते हैं। इसलिए मुझे इस तरह की बातों से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है। सवाल सिर्फ यह है कि क्‍या हम इसे अकेले करेंगे अथवा हम इसमें दूसरों का सहयोग भी लेंगे? क्‍या हम इसे सिर्फ डिजिटल पर करेंगे अथवा इसे टीवी पर भी शेयर करेंगे ? हम कंटेंट कैसे जुटाएंगे, इसका नेचर कैसा होगा, इसे कहां तैयार किया जाएगा और कहां एडिट होगा, ये सभी सवाल आने वाले 6-12 महीनों तक मेरे दिमाग में हैं  और रिपब्लिक वर्ल्‍ड के साथ रिपब्लिक टीवी लॉन्च करने के बाद मैं अपना प्‍लान सबके सामने रख दूंगा। हम अपना बिजनेस कैसे बढ़ाना है, इसको लेकर हमारे पास कई इन्‍वेस्‍टमेंट ऑप्‍शंस हैं। मुझे लगता है कि अतिरिक्‍त सावधानी और कमिटमेंट के बल पर हम 2017-18 में इसे हासिल कर लेंगे। हालांकि हमने अभी इसके लिए कोई औपचारिक कॉरपोरेट घोषणा नहीं की है लेकिन यह सब दिमाग में है।

देखा गया है कि बिना सरकार के सपोर्ट के ग्‍लोबल मीडिया प्‍लेयर्स को मुश्किल से सफलता मिलती है। आपको लगता है कि यह एक व्यावहारिक विचार है?

मौजूद रहने और सफल होने में अंतर है। आप तभी सफल हो सकते हैं जब आप प्रतिस्‍पर्द्धी मार्केट में हों। इसलिए मार्केट में जब तक कॉम्प्टीशन नहीं होगा, तब तक आपकी सफलता का दावा उचित प्रतीत नहीं होगा। रही बात राज्‍य के सपोर्ट की तो यह बेकार की बात है।

आपका कहना है कि डिजिटल ऐड सेल्‍स ज्‍यादा है और प्रिंट की ऐड सेल्‍स कम है। टेलिविजन और डिजिटल को मिलकर काम करने की जरूरत है। इस बारे में रिपब्लिक का रोडमैप क्‍या है ?

2017 में कई प्रिंट कंपनियां कम हुई हैं। अधिकांश कंपनियां मुद्रास्‍फीति की दर (rate of inflation) से कम दर पर आगे बढ़ रही हैं और कई एडिशंस बंद हो रहे हैं। मेरा मानना है कि स्‍थानीय भाषा की प्रिंट मीडिया की लाइफ ज्‍यादा है। मेरा यह भी मानना है कि अंग्रेजी प्रिंट मीडिया के सामने काफी चुनौतियां हैं और ऐडवर्टाइजर्स भी अपने विकल्‍पों का बहुत चालाकी से आकलन कर रहे हैं। मेरे विचार से पहुंच और प्रभाव के मामले में प्रिंट, खासकर इंग्लिश प्रिंट में काफी कमी आई है। मेरा आशय दूसरों के बारे में बात करना नहीं है लेकिन डिजिटल और टीवी को आगे बढ़ाना है।

आप कहते हैं कि टीवी के लिए डिजिटल दूसरी सबसे बड़ी पहचान होगी। लेकिन आप सोशल मीडिया पर एक्टिव नहीं हैं। टाइम्‍स नाउ या रिपब्लिक का भले हो लेकिन आपका अपना ट्विटर अकाउंट नहीं है ?arnab-final

मेरे पास इतना समय नहीं है कि मैं ट्विटर पर ज्‍यादा सक्रिय रह सकूं और मैं नहीं चाहता कि यह वनवे होकर रह जाए। मैं किसी भी माध्‍यम का मिसयूज नहीं करना चाहता हूं। रिपब्लिक ने ट्विटर पर अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज कराई है। जब हमने इसे लॉन्‍च किया था तो 45 मिनट में ही इसके 40000 फॉलाअर्स हो गए। मैं इस सपोर्ट का बहुत सम्‍मान करता हूं। प्रत्‍येक मिनट पर हजारों लोग इसे फॉलो कर रहे हैं और मैं इसका सम्‍मान करता हूं। मैं ट्विटर पर नहीं हूं क्‍योंकि मेरा पूरा ध्‍यान इस समय रिपब्लिक पर लगा हुआ है लेकिन रिपब्लिक जल्‍द ही सभी तरह के डिजिटल मीडिया पर तेजी से एक्टिव होगा।

रिपब्लिक के बारे में बात करें तो आप कहते हैं कि आप देश के 1.3 बिलियन लोगों की आवाज बनेंगे, ऐसे में आपकी बातें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसी लगती है?   

 इसमें कौन सी गलत बात है कि आप लोगों की बात करते हैं। क्‍या यह प्रत्‍येक पत्रकार की जिम्‍मेदारी नहीं है कि वह लोगों की आवाज बने और उनके हक के लिए खड़ा हो। त‍ब तो आप यह भी कहेंगे कि मेरी टीम के सभी मेंबर्स नेताओं की तरह बात करते हैं। मेरा कहना है कि हमें लोगों की भावानाओं को समझना चाहिए और उनकी आवाज बनकर खड़ा होना चाहिए कि उनके लिए क्‍या सही है और क्‍या गलत। इसमें राजनीति जैसी कोई बात नहीं है। मेरे पास कुछ बड़ी मीडिया कॉरपोरेट कंपनियों जितना पैसा नहीं है इसलिए मैं लोगों के बीच जा रहा हूं और अपनी बात रख रहा हूं। इसका हमें अच्‍छा रिजल्‍ट भी मिल रहा है। दुर्भाग्‍य से मुझे यह कहते हुए भी काफी पीड़ा हो रही है कि कुछ लोग डिस्‍ट्रिब्‍यूटर्स के पास जाकर कह रहे हैं कि वे उन्‍हें छह से आठ महीने की डिस्‍ट्रीब्‍यूशन फीस देंगे ताकि वे रिपाब्लिक का एक महीने  तक ब्रॉडकास्‍ट से रोक सकें। मुझे लगता है कि यह ठीक नहीं है। यह काफी गलत बात है कि लोग डिस्‍ट्रिब्‍यूटर्स के पास जाकर इस तरह की बात कर रहे हैं।

वे डिस्‍ट्रिब्‍यूटर्स से कह रहे हैं कि रिपब्लिक का प्रसारण एक महीने के लिए रोक दिया जाए, क्‍या यह पूरी तरह शर्मनाक नहीं है। सच्‍चाई यह है कि वे ईमानदार पत्रकारिता से डरे हुए हैं। आप जानते ही है कि पत्रकार कंटेंट क्रिएटर्स होते हैं और हमें इस प्रफेशन पर गर्व है। मैं इस प्रफेशन में लंबे समय से हूं ऐसे में यदि कुछ लोग सोचते हैं कि वे मुझे इस तरह एक महीने अथवा छह महीने के लिए रोक लेंगे तो मैं पर्दे से गायब हो जाऊंगा, ऐसे लोग गलत सोचते हैं। आप देश के लोगों को नहीं रोक सकते हैं। इ‍सलिए जब मैं 1.3 बिलियन लोगों की बात करता हूं तो मुझे पता है कि वे भी हमें चाहते हैं। आखिर में मैं यही कहूंगा कि कंटेंट क्रिएटर्स की जीत होगी और जिन लोगों को यह सब चीजें विरासत में मिली हैं और उन्‍होंने कोई मेहनत नहीं की है, ऐसे लोगों की हार होगी।

क्‍या आप ऐसे लोगों का नाम बताएंगे ?

लोग उनका खुद ही पता लगा लेंगे। मैं आपके जरिए उन लोगों को ये संदेश देना चाहता हूं कि मेरा यही कहना है कि आप लोग अपने आपको शर्मिंदा मत कीजिए और इंडस्‍ट्री में इस तरह के कार्यों को करने से बचना चाहिए। हालांकि रिपब्लिक की लॉन्चिंग को लेकर ऐसे लोग परेशान है और ऐसे लोग रोजाना रिपब्लिक  को लॉन्‍चिंग को लेकर इंटरव्यू दे रहे हैं, पैसा खर्चा कर रहे हैं। ये उन लोगों की घबराहट का प्रतीक है।

आपने एक अलग तरह की क्रेडिबिलिटी तैयार की है, जिसे ज्‍यादा लोग हासिल नहीं कर सकते हैं लेकिन कई लोगों का कहना है कि आप नरेंद्र मोदी को पसंद करते हैं और उनके लिए सॉफ्ट रहते हैं। इस तरह के आरोपों पर आपकी क्‍या प्रतिक्रिया है ?

मैं अपने व्‍युअर्स के अलावा किसी अन्‍य को जवाब नहीं देता हूं। मेरे व्‍युअर्स मेरे बारे में जानते हैं और वे मुझ पर भरोसा करते हैं। मेरा अपने व्‍युअर्स के साथ एक अलग नाता है और इस तरह की बातें करने वाले लोगों के लिए मैं कोई जवाब देना उचित नहीं समझता हूं।

मैं भी एक व्‍युअर हूं। यदि मैं यह पूछूं कि नरेंद्र मोदी के प्रति आपका रवैया सॉफ्ट है आर राहुल गांधी के मामले में ऐसा नहीं है तो आप क्‍या कहेंगे ? arnab1

इसके जवाब में मैं आपसे यह जानना चाहूंगा कि कृपया ऐसे पत्रकार का नाम बताएं जिसने ललितगेट स्‍टोरी का खुलासा किया हो। इसके अलावा किसी भी ऐसे पत्रकार का नाम बताएं जिसने पिछले दो साल में इस तरह की स्‍टोरी ब्रेक की हो। ऐसे एक पत्रकार का नाम बताएं जिसका सभी राजनीतिक दलों ने बहिष्‍कार (boycotted) किया हो। मेरे अपने विचार हैं और मैं ऐसे लोगों को सपोर्ट नहीं करता हूं जो ‘भारत की बर्बादी’ की बात करते हैं। मैंने अपनी अभिव्‍यक्ति की आजादी का इस्‍तेमाल ऐसे घोटाले और भ्रष्‍टाचार जैसे कॉमनवेल्‍थ गेम और ललितगेट जैसे मामलों को उजागर करने के लिए करता हूं। पिछले 20 साल में मैंने अपनी इंडिपेंडेंट पत्रकारिता को सिद्ध किया है। आप चाहते हं कि मैं लुटियंस ब्रिगेड को जवाब दूं जिसके पास मेरे खिलाफ बोलने के लिए कुछ नहीं है लेकिन वे मुझ पर कीचड़ उछालते हैं। रिपब्लिक एक अभियान है और अब यह नहीं रुकने वाला है। मेरे लिए अपनी पत्रकारिता को साबित करना जरूरी नहीं है।

जब आपके विरोधी दावा करते हैं कि आपके भाजपा से लिंक हैं और आपनी नीतियों अथवा प्रॉडक्‍ट में भी उसकी छवि दिखती है तो क्‍या आप परेशान नहीं होते हैं ?

जिन लोगों को तथ्‍यों की जानकारी नहीं होती है, मैं उनकी बातों का जवाब नहीं देता हूं लेकिन जब आपने मुझसे यह सवाल पूछा है तो मैं आपकी बात का जवाब दूंगा। क्‍या आपने मुझसे इस तरह का सवाल पूछने से पहले कोई रिसर्च की है? क्‍या आप मेरे दादाजी गौरीशंकर भट्टाचार्य के बारे में जानते हैं जो बड़े नेता थे और उन्‍होंने अपना कुछ काम शुरू करने के लिए पार्टी छोड़ दी थी? इन परिस्थितियों में उनके बैकग्राउंड को देखें और जानें कि वह फ्रीडम फाइटर के रूप में कितने समय तक अंडरग्राउंड रहे। मेरे एक और दादाजी रजनीकांत गोस्‍वामी भी कांग्रेस के बड़े नेता थे जिन्‍होंने आजादी के बाद अपनी राजनीति छोड़ दी थी। मेरे अंकल दिनेश गोस्‍वामी भी एक क्षेत्रीय पार्टी के नेता थे और वह लंबे समय तक राज्‍यसभा में रहे। यदि आप किसी चीज के बारे में बात करते हैं तो आपको इसके बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए। हालांकि मेरा यही कहना है कि मैं सिर्फ एक पत्रकार हूं और मैं इन सवालों की तह में नहीं जाना चाहता हूं।

चलिए अब आपके इन्‍वेस्‍टर्स की बात करते हैं। आपको कितना फंड मिला है और भविष्‍य में कितना और मिलने की उम्‍मीद है ?

मेरे सभी इन्‍वेस्‍टर्स की लिस्‍ट इंटरनेट पर है और मेरे सभी इन्‍वेस्‍टर्स का मेरी पत्रकारिता में भरोसा है। मेरे जितने भी इन्‍वेस्‍टर हैं वे सभी मेरे व्‍युअर्स हैं। व्‍युअर्स ने ही मेरे वेंचर में पैसा लगाया है और वे नजर भी रखते हैं। सच कहूं तो यह प्रॉडक्‍ट उनका भरोसा है। मैं इस ऑर्गनाइजेशन को एक आंदोलन (movement) के रूप में शुरू कर रहा हूं न कि बिजनेस के रूप में। आपको यह समझना चाहिए और रिपब्लिक को एक पारंपरिक रूप में नहीं देखना चाहिए।

यदि सीधे शब्‍दों में मैं आपके सवाल का जवाब दूं तो वह यह है कि मेरा इन्‍वेस्‍टमेंट पब्लिक के बीच से है। मैं आपकी कंपनी समेत सभी मीडिया कंपनियों से अपील करता हूं कि वे मेरे इन्‍वेस्‍टमेंट को लेकर किसी भ्रम में न रहें। वे इसके एक-एक रुपये का हिसाब देख सकते हैं और इसे साप्‍ताहिक आधार पर अपडेट भी कर सकते हैं। एक मीडिया कंपनी से लोग यही अपेक्षा करते हैं। मैं वादा करता हूं कि रिपब्लिक में जितना भी निवेश हुआ है वह पब्लिक से हुआ है और यह पब्लिक की ओर से ही रहेगा। लेकिन मैं आपसे कहता हूं कि आप दूसरी बड़ी मीडिया कंपनियों से उनके इन्‍वेस्‍टमेंट के बारे में पूछें और जानें कि उनके रीयल इन्‍वेस्‍टर कौन हैं। यदि आपको इन सब बातों का जवाब मिल जाए तो आप वापस आकर रिपब्लिक की फंडिंग की इससे तुलना करें। इस तरह आपको अपने सवाल का जवाब आसानी से मिल जाएगा।

    इस वेंचर में आपकी हिस्‍सेदारी (stake) कितनी है ?

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यह वेंचर इस तरह की चीजों से अलग है। यदि आप इन्‍वेस्‍टमेंट के पैटर्न को देखेंगे तो इसे समझना आसान होगा। यह हमारा ऑर्गनाइजेशन है। यह पहला ऐसा वेंचर है जिसे पत्रकार चलाते हैं, जिसका स्‍वामित्‍व पत्रकार के पास है और पत्रकार ही इसे मैनेज करते हैं। यानी सभी कुछ पत्रकारों के हाथ में है। मैंने पैसे के लिए कभी भी काम नहीं किया है। मैं अपने काम में यकीन करता हूं।

आपका रेवेन्‍यू मॉडल क्‍या होगा। आप खुद को लंबे समय तक कैसे मार्केट में टिका पाएंगे, क्‍या आप ऐडवर्टाइजिंग का सहारा लेंगे ?

आज के मीडिया बिजनेस पर ऐडवर्टाइजिंग का काफी प्रभाव है। आज के समय में मीडिया सबस्क्रिशन से ज्‍यादा ऐडवर्टाइजिंग की वजह से चल रहा है। मेरा मानना है कि हमें भी इसी ट्रेंड का पालन करना होगा।

आपको ऐडवर्टाइजर्स से किस तरह की प्रतिक्रिया मिली है ?

ऐडवर्टाइजर्स से हमें काफी जबरदस्‍त रिस्‍पॉन्‍स मिला है। लगभग सभी ऐडवर्टाइजर्स बड़े संस्‍थानों को छोड़कर रिपब्लिक की तरफ आ रहे हैं। कई बड़े नाम रिपब्लिक से बतौर स्‍पॉन्‍सर जुड़े हैं। यदि आप ये पूछते हैं कि वे ऐसा क्‍यों कर रहे हैं और रिपब्लिक के साथ बड़े ऐडवर्टाइजर्स क्‍यों जुड़े हैं तो इसका सीधा सा जवाब है कि उन्‍हें हमारे ऊपर पूरा भरोसा है। वे मेरे शो देख चुके हैं और वे जानते हैं कि मैं किस तरह की पत्रकारिता करता हूं। ऐडवर्टाइजर्स के साथ मेरे रिश्‍ते काफी निजी और भावनात्‍मक स्‍तर पर हैं। इसी तरह का कनेक्‍ट हमारे पास होना चाहिए। मैंने उन्‍हें यह भी बताया है कि देश को बदलने की इस प्रक्रिया में उनका भी योगदान होगा। ऐडवर्टाइजर्स भी व्‍युअर्स हैं और वे भी देश को बदलना चाहते हैं।

आपको क्‍या लगता है, कितनी जल्‍दी आप इन सब चीजों को कर लेंगे ?

भगवान के आशीर्वाद से और लोगों के सपोर्ट से हम जल्‍द ही यह सब कर लेंगे। मैं इन सब चीजों को लेकर ज्‍यादा नहीं सोचता हूं। जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूं कि मैं कोई बिजनेसमैन नहीं हूं। मैं कंटेंट के बारे में ज्‍यादा चिंता करता हूं। मेरा मानना है कि यदि कंटेंट सफल रहा तो ऐडवर्टाइजिंग उसे फॉलो करेगा और ऑर्गनाइजेशन बहुत अच्‍छा चलेगा। लेकिन मैं आपको एक बात और बता दूं कि हमारे ऑर्गनाइजेशन में कई लोग कम सैलरी पर आए हैं। इन लोगों ने सिर्फ इसी वजह से हमारे ऑर्गनाइजेशन को जॉइन किया है कि उन्‍हें मेरी पत्रकारिता पर भरोसा है। मैं उन्‍हें पैसे से नहीं तौलता हूं और न ही वे ऐसा करते हैं। आज के माहौल में हमें रिपब्लिक को दूसरे तरह के ऑर्गनाइजेशन के रूप में देखना होगा।

 आप इंडस्‍ट्री में काफी बड़ा नाम हैं। आप अपने वेंचर में बड़े नाम क्‍यों नहीं जोड़ रहे हैं ?

हमने अभी तक पब्लिकली कोई घोषणा नहीं की है। ऐसे में आप लोग कैसे अंदाजा लगा सकते हैं कि हमारे साथ कौन जुड़ा है और कौन नहीं। ये बात बिल्‍कुल सही है कि अपनी मजबूत एडिटोरियल टीम के बिना हम अपने वेंचर को लॉन्‍च नहीं करेंगे। इसके लिए हम एक मजबूत एडिटोरियल टीम तैयार कर रहे हैं और कई अच्‍छे पत्रकार इसमें शामिल हो चुके हैं।

बोफोर्स मामले का खुलासा करने वाली जर्नलिस्ट चित्रा सुब्रमण्यम हमारी एडिटोरियल एडवाइजर हैं और मुझे उन पर गर्व है। इसके अलावा निरंजन नारायणस्‍वामी ने न्‍यूजडेस्‍क पर बतौर एडिटर जॉइन किया है। वह टाइम्‍स नेटवर्क से आकर हमसे जुड़े हैं और उनके अंदर बहुत प्रतिभा है। इसके अलावा चारु ठाकुर को हमने प्रेजिडेंट आफ कंटेंट और चीफ एग्जिक्‍यूटिव प्रॉड्यूसर बनाया है। मुझे बहुत गर्व है कि उनके जैसा टैलेंट हमारी टीम में शामिल है।

इसके अलावा थांथी टीवी के लोकप्रिय एंकर भी जल्‍द हमारे साथ जुड़ने वाले हैं। हमारी टीम में मेजर (रिटायर्ड) गौरव आर्य भी स्‍ट्रेटजिक अफेयर्स एक्‍सपर्ट के बतौर जुड़े हैं। देश में पत्रकारिता का यही भविष्‍य है और हम कांट्रिब्‍यूटर्स, प्रॉड्यूसर्स, एडिटोरियल स्‍टाफ और रिपोर्टरों का एक बहुत विशाल पूल बनाने जा रहे हैं। अभिषेक कपूर दिल्‍ली में हमारे एग्जिक्‍यूटिव एडिटर हैं और वह एक बहुत ही कमाल के पॉलिटकल जर्नलिस्‍ट हैं। पीटीआई के स्नेहेश एलेक्स फिलिप ने भी हमारी टीम को जॉइन किया है। यही पत्रकारिता का भविष्‍य है।

आपके चैनल में एक इन्‍वेस्‍टर राजीव चंद्रशेखर हैं। वह केरल में एनडीए के पदाधिकारी भी हैं। सभी लोग जानते हैं कि उनका ऑर्गनाइजेशन अपने कर्मचारियों को लेटर लिखकर बताता है कि उनकी एडिट लाइन कैसी होनी चाहिए। कुछ लोग कहते हैं कि आप भी उसी एडिट लाइन पर चलते हैं। क्‍या आपको लगता है कि आपकी एडिट लाइन भी इस तरह की फिलॉसफी से निर्देशित होनी चहिए ?

:सबसे पहले तो मैं आपको बता दूं कि मेरा सेना , देश और राष्‍ट्र की तरफ झुकाव(pro-military, pro-India, pro-nationalist) है ।  मुझे लगता है कि लुटियंस मीडिया ने इस तरह की फिलॉसफी फैला रखी है कि जो लोग सेनाप्रेमी अथवा राष्‍टप्रेमी होते हैं वे राइट विंगर्स होते हैं। देश में 99 प्रतिशत ऐसे लोग हैं जबकि सौ प्रतिशत लोगों को ऐसा होना चाहिए।

Arnab-Goswamiमुझे एशियानेट ऑनलाइन प्राइवेट लिमिटेड से मिले निवेश पर बहुत गर्व है। एशियानेट देश का सबसे पुराना न्‍यूज चैनल है। राजीव चंद्रशेखर हमारे बड़े इन्‍वेस्‍टर्स में से एक हैं और इस बात पर भी मुझे काफी गर्व है। उनकी तरह दूसरे इन्‍वेस्‍टर्स भी हमारी पत्रकारिता में यकीन रखते हैं और हमारी पत्रकारिता अपनी कहानी खुद बयां कर देगी।

आप कहते हैं कि आप सेना का बहुत सम्‍मान करते हैं और हमेशा उसके पक्ष में होते हैं। इस तरह के बयान देने पर कुछ लोग आपकी आलोचना भी करते हैं। आप इन आलोचनाओं का सामना किस तरह करते हैं ?

मैं इन बातों की परवाह नहीं करता हूं। ऐसे लोगों ने मेरे बारे में कहीं कुछ नहीं लिखा है, फिर मुझे उनकी चिंता क्‍यों करनी चाहिए। ऐसी आलोचनाओं का जवाब देने के लिए मेरे पास समय नहीं है। ऐसे लोग बैठे-बैठे कुछ न कुछ बोलते रहते हैं और वे ऐसा करते रहेंगे लेकिन मैं इनकी बातों पर गौर नहीं करता हूं। मैं उनसे अलग हूं। अब नई पत्रकारिता का जन्‍म हो रहा है और यह ज्‍यादा कॉन्फिडेंट है। हमें ऐसे लोगों की चिंता ज्‍यादा नहीं करनी चाहिए।

आपका कहना है कि राजीव चंद्रशेखर के निवेश को आप बहुत वैल्‍यू देते हैं लेकिन ऐसे में भाजपा के साथ संबंधों को लेकर क्‍या आप चिंतित नहीं हैं ?

मैं इस सवाल का पहले ही साफ-साफ जवाब दे चुका हूं कि मैं उनके इन्‍वेस्‍टमेंट को बहुत वैल्‍यू  देता हूं लेकिन मेरा प्रत्‍येक इन्‍वेस्‍टर मेरी पत्रकारिता के बारे में जानता है और इसे लेकर मैं बहुत खुश हूं। अब हम सभी को मिलकर चैनल लॉन्च करना है।

क्‍या आपको लगता है कि भारतीय मीडिया ने कहीं-कहीं अपना पुराना तेवर यानी सरकार विरोधी रवैया छोड़ दिया है। क्‍या आपको इससे चिंता होती है?

मैं उस भारतीय मीडिया का हिस्‍सा नहीं हूं। कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स, टू जी, निर्भया कैंपेन, अन्‍ना कैंपेन, ललित गेट आदि स्‍टोरी इस बात की गवाह हैं कि हमारा किसी भी रूप में अपना रवैया बिल्‍कुल नहीं बदला है। इसलिए मुझे नहीं पता कि आप किस मीडिया की बात कर रहे हैं। मैं पहले ही बता चुका हूं कि मैंने फर्जी मीडिया से खुद को अलग घोषित कर रखा है। यह नई तरह की मीडिया की शुरुआत है। क्‍या आपको लगता है कि मैं फेक मीडिया से सहमत हो सकता हैं? मैं ऐसा नहीं कर सकता हूं। क्‍या फेक मीडिया मुझे पसंद कर सकती है? नहीं, वे मुझे बिल्‍कुल पसंद नहीं करेंगे। यहीं पर सारी बात समाप्‍त हो जाती है और इसके आगे एक-दूसरे के बारे में कमेंट करने का कोई मतलब नहीं है।

आप एक एडिटर होने के साथ-साथ एक एंटरप्रिन्‍योर भी हैं। ऐसे में क्‍या आपको चिंता नहीं रहती क्‍योंकि एंटरप्रिन्‍योर के साथ कई तरह के रिस्‍क भी होते हैं ?

रिस्‍क मुझे काफी जोश दिलाते हैं। इसमें चिंता करने वाली कोई बात नहीं है। मैं सभी चीजों को चैलेंज के रूप में लेता हूं। रिपब्लिक को लेकर लोग बहुत उत्‍साहित हैं क्‍योंकि ये उनके साथ भावात्मक रूप से जुड़ा। मैं आपको बता दूं कि हमारे सीईओ विकास खनचंदानी के नेतृत्‍व में हमारे पास एक बहुत ही बेहतरीन मैनेजमेंट टीम है। इसके अलावा टाइम्‍स नेटवर्क में सीएफओ रह चुके एस सुंदरम को हमने सीएफओ बनाया है। वहीं जय चौहान कंपनी के डिजिटल डिपार्टमेंट के चीफ ऑ‍परेटिंग ऑफिसर बनाए गए हैं। वह टेक्‍नीकल कार्यों की कमान संभालेंगे। जब आपके पास इतनी अच्‍छी टीम हो तो इसके भविष्‍य की चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। आपको याद होगा कि जब मैंने टाइम्‍स नाउ छोड़ा था तो मैंने कहा था कि ‘खेल अब शुरू हुआ है’(game has just begun)।

आपकी टीम में शामिल लोगों की औसत उम्र 25 साल है और डिजिटल के लिए ये 22-23 वर्ष हैतो क्‍या यह बदलते भारत की तस्‍वीर को दर्शाता है ?

हां, ऐसा ही है और मैं इससे बहुत खुश हूं। जहां कंप्रोमाइज्‍ड मीडिया मुझे पसंद नहीं करती वहीं यह टीम मुझे मोटिवेट (motivates) करती है। इस नई मीडिया ने मेरा स्‍वागत किया है और वे जानते हैं कि मैंने अकेले ही यह लड़ाई शुरू की थी लेकिन अब मैं अकेला नहीं हूं। आज मेरे साथ हजारों युवा पत्रकार हैं। आप सही कह रहे हैं कि इनकी औसत उम्र 20 साल के आसपास है। मुझे उनसे काफी कुछ सीखने को मिला है और मैं इन लोगों के साथ अगले दस साल से ज्‍यादा समय तक काम कर सकता हूं। मुझे लगता है कि इन लोगों ने मेरे पैरों में एक नई जान फूंक दी है और मेरा मानना है कि इसी कारण रिपब्लिक को काफी सफलता मिलेगी।

aranb4आपने अपने समय में टाइम्‍स नाउ को काफी ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। क्‍या हमें अब अरनब का नया अवतार देखने को मिलेगा या हमें वही पुराना अरनब देखने को मिलेगा ?

जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि मैं यहां पर सिर्फ छह प्रतिशत लोगों के लिए नहीं बैठा हूं बल्कि मैं 94 प्रतिशत लोगों के लिए काम कर रहा हूं। देश में अभी भी बडी संख्‍या में ऐसे लोग हैं जो न्‍यूज नहीं देखते हैं। ऐसे लोगों को न्‍यूज देखने के लिए प्रेरित करना मेरी जिम्‍मेदारी है। जहां तक मेरा संबंध है, जिधर हवा बह रही है, मैं तो उसी तरह चलूंगा, बाकी देखते हैं कि क्‍या होता है।

 यह कहा जाता है कि एडिटर होने के साथ आप मार्केटिंग को भी काफी समय देते हैं जैसे क्‍या काम हो रहा है और कैसे हो रहा है?

ऐसा नहीं है। मैं सिर्फ एडिटोरियल से संबंधित बातों में ही रुचि लेता है। मैं प्रोमोज और ग्राफिक्‍स को लेकर ज्‍यादा सक्रिय रहता हूं लेकिन हमारे पास एक बेहतर टीम है जो यह काम कर रही है। इसलिए अब मैं अपना पूरा समय एडिटोरियल के कामों को दे रहा हूं। यहां पर मैं यह भी बताना चाहूंगा कि मुझे अपने एडिटर होने पर काफी गर्व है और मैं वही बने रहना चाहता हूं। ‘रिपब्लिक’ में मैं एडिटर-इन-चीफ हूं और मेरा पहला व आखिरी काम है। इसके बाद के सभी बिजनेस रोल मेरे लिए सेकेंडरी हैं।

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