यहां पढ़ें गीताश्री के हसीनाबाद की समीक्षा, पुस्तक मेले में रहेगा चर्चा में...

यहां पढ़ें गीताश्री के हसीनाबाद की समीक्षा, पुस्तक मेले में रहेगा चर्चा में...

Friday, 29 December, 2017

वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार गीताश्री का पहला उपन्यास हसीनाबाद इस बार जनवरी में दिल्ली में आयोजित होने वाले पुस्तक मेले में चर्चा का विषय रहेगा। पिछले महीने लखनऊ में जागरण संवादी के दौरान इसका कवर लॉन्च हुआ था और फिर बरेली साहित्य उत्सव में ये पाठकों के हाथों में आया था। इस पहले उपन्यास की समीक्षा आप यहां पढ़िए और फिर पुस्तक मेले में जाकर उपन्यास का पूरा लुफ्त उठाइए...

हसीनाबाद उपन्यास अपने शुरुआती अंश में समाज द्वारा बहिष्कृत और हाशिये पर धकेली अस्मिताओ को पुनः केंद्र में लाने की एक सुगढ़ वैचारिक परिपाटी के साथ रचा बसा है, जिसकी पात्र सुंदरी संकल्पबद्ध होकर अपने हाथों अपनी नियति स्वयं लिख रही है। यह अदम्य आत्मसम्मान और निर्भीकता की पराकाष्ठा ही है कि सुंदरी; छोटी सी गोलमी को पोटली में बांधे ठाकुर की हवस के गढ़ से सदा के लिए मुक्ति पा जाती है क्योकि वह अपनी बेटी के भविष्य के आईने में अपने अतीत की परछाई नही देखना चाहती। वह अपनी एक अलग सुरक्षित दुनिया बसाती है,जिसके आसमान में गोलमी पंख फैलाकर अपने सपने पूरे करे क्योंकि गोलमी सपना देखती नही बुनती है।

पात्र गोलमी पूरे उपन्यास की कथावस्तु की कसावट है, उसका होना उपन्यास के शिल्प और भाषा में वाकपटुता को आश्रय देता है, जिससे कड़ी दर कड़ी उपन्यास आगे बढ़ता है। स्त्री किसान होती है, वह जाते जाते अपने सपना दूसरी स्त्री की आँखों में रोप जाती है। गीताश्री जी की ये पंक्ति उपन्यास का प्लाट है। यह उपन्यास और कुछ नही सपनों की रोपाई ही है।

सच में... कितना कुछ कहती हैं गोलमी की आँखें!!!  उसकी आँखों मे वही चाह है मानो जैसे छोटा बच्चा चांद छूना चाहता हो। इसी जिजीविषा के चलते वह सामंती समाज मे रहते हुए भी, स्टेज डांसर से पॉलिटिक्स में एंट्री तक का सफर तय कर अपने कैरियर के प्लेटफॉर्म को उस आयाम तक पहुँचा देती है, जहाx पॉलिटिशियन अपनी वोट बैंक की राजनीति को खेलने के लिए उस से हाथ मिलाने की जुगत करते नज़र आते है। पर पता नही क्यो अपने सामाजिक जीवन मे पितृसत्ता को ठेंगा दिखाने वाली सुंदरी की बेटी गोलमी राजसत्ता के आगे घुटने टेक देती है। उसे सत्ता के गलियारों का माहौल रास नही आता और वह थकी-हारी सी अपने पंख समेटे अपनी उस दुनिया मे वापस लौट जाती है, जहां उसके घर की खिड़कियां खुलती है।

और उपन्यास के अंत मे ... सच मे वह उस चिड़िया जैसी ही प्रतीत होती है, जो दिन भर कड़ी मेहनत कर अपने लिए दाना-पानी इकठ्ठा करती है पर अंधेरा घिरने से पहले अपने घरोंदों में भी वापस लौटना चाहती है। बस इसीलिए मैं गोलमी को एक मैसेज देता हूँ... मिलिये गीताश्री.. बनिये गीताश्री.. व्यवस्था के इतिहास की परतों को अन्वेषण करता और उसमे यथार्थ के सपनों को रोपता एक जीवंत उपन्यास रचने के लिए कथाकार को शुभकामनाएं।

शुभम मोंगा

युवा रचनाकार




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