'कैसे मीडिया में साहित्य पा सकता है अच्छा कवरेज, जानें फॉर्मूला'

Thursday, 19 April, 2018

समाचार4मी‍डिया ब्यूरो ।।

हिन्‍दी दैनिक 'हिन्‍दुस्‍तान', आगरा के एडिटर अजय शुक्‍ल का कहना है कि आज पत्रकारिता में साहित्‍य का उतना समावेश नहीं दिखाई देता है, जितना पहले दिखता था।

आगरा में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उन्‍होंने कहा कि आज के समय में बात जब पत्रकारिता या मीडिया और साहित्‍य की होती है यह विषादगी साफ दिखार्इ देती है। इस बात का अंदाजा यहां खाली पड़ी कुर्सियों से लगाया जा सकता है। उन्‍होंने कहा कि ऐसा लगता है कि या तो साहित्‍य के प्रति लोगों की अरुचि है अथवा व्‍यक्ति उसके प्रति उस तरह से अधीर नहीं है, जैसे होना चाहिए।

उन्‍होंने कहा कि यदि प्रिंट की बात करें तो इसका सर्कुलेशन पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ा है। एक समय ऐसा भी था जब लग रहा था कि इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया आया है, दूसरे मीडिया आए हैं, तो प्रिंट खत्‍म हो जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ, आज के दौर में पढ़ने की क्षमता बढ़ी है। हमारी सबसे बड़ी कमी होती है कि हम किसी भी चीज में पॉजीटिविटी कम जबकि निगेटिविटी ज्‍यादा ढूंढते हैं। हमें देखना चाहिए कि सोशल मीडिया के रूप में हमें एक बहुत अच्‍छा साधन मिला है। कई ऐसे साहित्‍यकार अथवा लोग हैं जो किसी कारण अखबारों में लिख नहीं पाते थे अ‍थवा छप नहीं पाते थे, उनके लिए यह काफी बेहतरीन प्‍लेटफॉर्म बनकर उभरा है। सोशल मीडिया के रूप में साहित्‍यकारों को ऐसा प्‍लेटफॉर्म मिला है, जिसके जरिये ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों तक पहुंचा जा सकता है। आप ये नहीं कह सकते हैं कि आपको जगह नहीं मिल रही है। सोशल मीडिया के जरिये ही आप ऐसी पहचान बना सकते हैं कि अखबार भी और टीवी चैनल भी आपसे आपको अपने प्रोग्राम में लेने के लिए या आपसे लेख लिखवाने के लिए आतुर होते हैं। ऐेसे में लोगों को सोशल मीडिया के सकारात्‍मक या रचनात्‍मक पक्षों को देखना चाहिए।   

उन्‍होंने कहा कि बगैर साहित्‍य के पत्रकारिता की शुरुआत नहीं हो सकती है। जब पत्रकारिता की शुरुआत हुई, तो साहित्‍य भी इसका पहलू है। हालांकि आज दोनों अलग हैं, लेकिन फिर भी देखा जाए तो एक हैं। आखिर इसके पीछे की वजह क्‍या है। हमारी नजर में इसकी वजह यह है कि आज के समय में मीडिया दिन-प्रतिदिन और मिनट-टू-मिनट दूसरे तरीकों से अपने आपको अपडेट कर रहा है। वक्‍त के मुताबिक आगे बढ़ रहा है। टेक्‍नोलॉजी भी अडॉप्‍ट कर रहा है, अन्‍य चीजें भी अडॉप्‍ट कर रहा है और इसके जरिये बहुत आगे निकल गया है। लेकिन साहित्‍य अभी भी 16वीं-17वीं शताब्‍दी के इर्द-गिर्द घूम रहा है। हालांकि इसमें कोई कमी नहीं है लेकिन इसे अपडेट करने की जरूरत है। इसे वक्‍त के मुताबिक बदलने की और एक प्रारूप देने की जरूरत है। आज जरूरत इस बात की है कि कैसे हम इसे विकसित करें और उसे आगे ले जाएं। हम उसे भाषाओं में बहुत ज्‍यादा जकड़ लेते हैं, क्लिष्‍ट कर देते हैं।


अपने पुराने दिनो को याद करते हुए शुक्ल कहते है कि 'दैनिक भास्‍कर' से एक चीज सीखने को मिलती है। वो जब चंडीगढ़ पहुंचे तो चंडीगढ़ में हिन्‍दी अखबार की रीडरशिप नहीं थी जबकि आज दैनिक भास्‍कर वहां का सबसे ज्‍यादा बिकने वाला अखबार है। आप अमर उजाला देखते हैं और उसमें 'माई सिटी' एक पार्ट देखते हैं, इत्‍तेफाक से उसका सिटी एडिटर मैं था। अमर उजाला का सर्कुलेशन उस समय वहां पर 22 हजार कॉपियों के आसपास हुआ करता था। मैंने एक आइडिया निकाला और एक प्रोजेक्‍ट बनाकर अपने एडिटर-इन-चीफ शशि शेखर जी के पास ले गया, जो एक साहित्‍यकार भी हैं, इतिहासकार भी हैं और हिन्‍दी पत्रकारिता में बड़ा नाम हैं। उस समय बरेली के एडिटर अतुल माहेश्‍वरी हुआ करते थे, उन्‍होंने इसे देखा और अप्रूव कर दिया। इसके बाद हमने माई सिटी लॉन्‍च किया। हमने ऐसा इसलिए किया क्‍योंकि हमें चंडीगढ़ में अखबार की स्‍वीकार्यता बढ़ानी थी। चंडीगढ़ की भाषा देखी जाए तो हिंग्लिश है, इसलिए हमने इसे वहां लॉन्‍च किया ताकि यह हर किसी की समझ में आ जाए। दरअसल, हमारी सोच ये है कि हमें किसी भी राज्‍य की भाषा के अनुसार अपने अखबार की भाषा रखनी होगी ताकि यह ज्‍यादा से लोगों को कनेक्‍ट कर सके। इसके बाद हम 22 हजार कॉपियों से मात्र छह महीने में 'अमर उजाला' को 64 हजार कॉपियों तक ले गए।

उन्‍होंने कहा कि साहित्‍य में इस बात की जरूरत है कि कैसे हम उसकी कनेक्टिविटी बढ़ाएं। कैसे आमजन में उसकी स्‍वीकार्यता बढ़े, हम इसके बारे में सोचें। हमें स्‍वान्‍त: सुखाय से ऊपर उठकर लिखना होगा। हम बहुत अच्‍छा लिखते हैं लेकिन उस लिखने का कितना कनेक्‍ट करते हैं, यह भी देखना होगा।

उन्‍होंने कहा, 'मैं सुबह जब रिपोर्टरों की मीटिंग लेता हूं तो सबसे पहले यही पूछता हूं कि यह खबर कौन पढ़ेगा, क्‍यों पढ़ेगा और उसे इस खबर से क्‍या फायदा होगा। यदि इस सवाल का हमारे पास जवाब नहीं है तो ये खबर बेकार है और उसे छापने से मना कर देता हूं।

इसलिए मेरा कहना है कि जब भी आप साहित्‍य की रचना करें तो यह जरूर सोचें कि आप किसे कनेक्‍ट कर रहे हैं किसको मेसेज दे रहे हैं और उससे आप समाज को क्‍या-क्‍या देंगे। जब आपके पास इन सब सवालों के जवाब होंगे तब तो ठीक है लेकिन यदि इन सवालों के जवाब आपके पास नहीं हैं और इस साहित्‍य से आप समाज को कुछ देने वाले नहीं हैं, तो हम आपको क्‍यूं पढ़ें। इसलिए यदि हमें अपनी पठनीयता बढ़ानी है तो उस कनेक्‍शन को खोजना होगा। यदि हम वह कनेक्‍शन खोज लेंगे तो साहित्‍य को निश्चित रूप से मीडिया बहुत बड़ा स्‍थान देगा।

उन्‍होंने कहा कि आखिर समय के साथ यह स्‍थान क्‍यों कम होता गया, इसकी समीक्षा करने की जरूरत है। जब देश की आजादी की लड़ाई लड़ी जा रही थी और तमाम सामाजिक आंदोलन चल रहे थे, उस दौर में मुंशी प्रेमचंद्र ने साहित्‍य की रचना के साथ पत्रकारिता भी की। मुंशी प्रेमचंद्र को लेकर अक्‍सर ये सवाल होता है कि वे विशुद्ध रूप से साहित्‍यकार थे या पत्रकार थे लेकिन मैं बता दूं कि वो वास्‍तव में दोनों थे और उन्‍होंने दोनों चीजें कीं। देश में जब 1924 में हिन्‍दुस्‍तान अखबार लॉन्‍च हुआ था, उस समय देश की आजादी की लड़ाई लड़ी जा रही थी। उस समय यह था कि हमें देश की आजादी के लिए लड़ना है तो उस समय साहित्‍यकारों को भी उसमें स्‍थान था। मदन मोहन मालवीय जब संपादक थे तब उन्‍होंने यह तय किया कि हम इस अखबार को देश की आजादी की लड़ाई के लिए इस्‍तेमाल करेंगे, उसके बाद देश के निर्माण के लिए इसका इस्‍तेमाल करेंगे, तब उसकी संपादकीय नीति बनाई। यह भी तय हुआ कि इसमें हम अपनी भाषागत चीजों को कैसे तय करेंगे। इसी बात को लेकर हिन्‍दुस्‍तान ग्रुप ने 'कादंबिनी' मैगजीन शुरू की। बच्‍चों के लिए 'नंदन' शुरू की गई। साप्‍ताहिक हिन्‍दुस्‍तान शुरू किया और तमाम सारी चीजें भी शुरू कीं। आज डिजिटल मीडिया की तरफ भी आप देखेंगे तो तमाम चीजें आपको मिलती हैं। आखिर आप क्‍यूं नहीं कनेक्‍ट होते हैं। एक बात तय है कि जब आप लोगों से कनेक्‍ट करेंगे तभी ज्‍यादा से ज्‍यादा पढ़े जाएंगे।

कार्यक्रम में उन्‍होंने कहा, 'आप सोशल मीडिया का इस्‍तेमाल कीजिए। सोशल मीडिया आपका इस्‍तेमाल करे, इसके लिए नहीं है बल्कि आप उसको इस्‍तेमाल कीजिए। आप साहित्‍य को आगे ले जाइए और इसे आगे ले जाने के लिए आपको कम्‍युनिकेशन के जो माध्‍यम मिलते हैं, आप उनका इस्‍तेमाल कीजिए। आप अपने आपको अपडेट कीजिए। यदि आप 21वीं सदी में 17वीं सदी की बात करेंगे तो साहित्‍य निश्चित रूप से उपेक्षित होगा।

अजय शुक्‍ला का कहना था कि पढ़ने की लगन हर व्‍यक्ति में होती है बस उसे वह सामग्री मिलनी चाहिए। आप लोगों को सामग्री उपलब्‍ध करा देंगे तो निश्चित रूप से उसकी पठनीयता होगी और मीडिया आपको इग्‍नोर नहीं कर पाएगा। इसका कारण है कि जब आप उसके रीडर को कनेक्‍ट करते हैं तो वो कैसे आपको भूल सकता है।

अभी जब मीडिया को देखते हैं तो साहित्‍य सबसे छोटी पंक्ति में नजर आता है। लेकिन यदि रीडर कनेक्‍ट होगा तो साहित्‍य भी आगे बढ़ेगा। इसे इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि टैगौर थिएटर में अभी आगरा की मूल नाट्य प्रतिभा थी, उसे थिएटर के माध्‍यम से शुरू किया गया। नए सिरे से आगे बढ़ाया गया, जिसका फायदा मिला और वह पुनर्जीवित हो गई। आप भी उसी तरह से अपने आप को अपडेट कीजिए। आप साहित्‍य को आगे लेकर आइए, उसे प्‍लेटफॉर्म दिलाइए, टेक्‍नोलॉजी आदि चीजों से अपडेट कराइए। ऐसे साहित्‍य की रचना कीजिए जो लोगों को कनेक्‍ट करे, फिर देखिए हर आदमी आपके पीछे घूमेगा।

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