कैसै टूटते हैं पत्रकारिता मे आकर रुमानी ख्वाब, बताया वरिष्ठ पत्रकार गीताश्री ने...

Friday, 03 June, 2016

समाचार4मीडिया ब्यूरो आज की हिंदी पत्रकारिता की दुनिया की चर्चित महिला पत्रकार और साहित्यकार गीताश्री ने बीते दिवस यूरोपियन यूनियन द्वारा आयोजित एक सेमीनार में हिंदी मीडिया की दशा और दिशा पर खरी-खरी बात की। गीता ने कहा कि जब हम पत्रकारिता में आते हैं तो बहुत रुमानी ख्याल और फौलादी इरादे साथ लाते हैं।  उन्होंने अदम गोंडवी के इस शेर के जरिए उस ख्याल को कुछ यूं पेश किया... भूख के अहसास को शेरो सुखन तक ले चलो या अदब को मुफलिसों की अंजुमन तक ले चलो जो गजल माशूक के जलवो से वाकिफ हो गई उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो... लेकिन जब यही हम करने चलते हैं और असलियत से साबका पड़ता है, तो सारी रुमानियत भरभरा कर गिर जाती है। इरादे टूट जाते हैं और यथार्थ की कठोरता हमें बदल देती है। Geetashreeहम पत्रकारिता में अभिव्यक्ति की आजादी, नैतिकता जैसी सीख लेकर आते हैं और जब ये करना शुरु करते हैं तो सच्चाई कुछ और दिखाई देती है। अभिव्यक्ति की आजादी संपादक की बंद अलमारी में खुली किताब की तरह होती है। हमें लगता था कि हमारे लिखने से दुनिया बदल जाएगी पर सच्चाई ये कि जो लिखते हैं उससे मैनेजमेंट की दुनिया बदलती है, समाज का कुछ नहीं। आप जरा सी उसकी नीतियों के खिलाफ गए और तलवार से आपका सिर कलम। नैतिकता आदि सैद्धांतिक बातें हैं जो प्रयोग के धरातल पर खंडित हो जाती है, सच कुछ और दिखाई देता है। पत्रकार नैतिकता का निर्वाह करे कि वह लिखे जो लिखने को कहा जा रही या जो उसे डिक्टेट किया जा रहा है। सच को छुपा कर नया सच गढने की गंदली कोशिश होती रहती है लगातार, आप सब सच नहीं लिख पाते क्योंकि अखबार पत्रिकाएं ब्रांड हैं। आप मैनेजमेंट के चंगुल में दबे हुए पपेट (कठपुतली) हैं। आपकी आवाज मैनेजमेंट की नीतियों के अनुसार निकलती है। आप अपनी राह पर नहीं चल सकते। सारी क्रांतियों की धूल गर्द ओ गुबार उडती रहती है। पत्रकारिता में कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम ने बहुत बेडा गर्क किया है। ऐसे में जेनुइन पत्रकार अपनी नौकरी बचाए कि नैतिकता। वे कहती है कि जब वे रिपोर्टर के तौर पर काम करती थी, तो उन्हें लगता था कि संपादक के निर्देश के चलते कई गड़बड़िया की जा रही है, पर जब वे स्वंय दो साल के लिए संपादक बनी तो उन्हें एहसास हुआ कि वाकई संपादक कितना बेचारा होता है। वे तो मार्केट और मैनेजमेंट के बीच पिस रह होते है। उसके मुंह से कोई और बोल रहा होता है। geeta.अंग्रेजी और हिंदी पत्रकारिता में भी काफी फर्क है ये बात पुरजोर तरीके से उठाते हुए गीता ने कहा कि जो अंतर भारत और इंडिया के बीच है, उतना ही बड़ां अंतर दोनों भाषाओं की पत्रकारिता की बीच स्पष्ट तौर पर दिखता है। वे पत्रकारों के प्रति प्रशासन की भूमिका पर बात करते हुए कहती है कि वे पत्रकारो को सुविधाएं देता है और उसे अपना गुलाम बनाना चाहता है। आप उसके खिलाफ लिखेंगे तो मारे जाएंगे या दरबदर की ठोकर खाएंगे। दुनिया भर में पत्रकार इसीलिए तो मारे जा रहे कि वे बेखौफ अपनी नैतिकता बचाना चाहते हैं, सच लिखना चाहते है, प्रशासन का भोंपू  नहीं बनना चाहते। वे कहती है कि पत्रकार आज कई तरह के दबावों में काम करता है। कई कारक हैं जो उसके काम को प्रभावित करते हैं। ठेका सिस्टम, मैनेजमेंट की पॉलिसी, अपनी नैतिकता कायम रखने का संकल्प, प्रशासन का भय, बंटा हुआ समाज, ये सब मिल कर उसके लेखन पर दबाव बनाते हैं। ऐसे में इन सबके बीच संतुलन बैठाने के चक्कर में विचारधाराएं उसके लिए बहुत बडी बाधक बनती है। आज मीडिया जनता के बीच सबसे अधिक संदिग्ध है। उन्होंने कहा कि सार यही है कि बड़ा सवाल उठता है कि पत्रकारिता के मूल्य कैसे बचे ? EU   समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडियापोर्टल exchange4media.com की हिंदी वेबसाइट है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो कर सकते हैं।



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