हिंदी के विकास के लिए दूसरी भाषा के शब्दों से गुरेज नहीं : एन.के.सिंह

हिंदी के विकास के लिए दूसरी भाषा के शब्दों से गुरेज नहीं : एन.के.सिंह

Thursday, 14 September, 2017

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

हिंदी दिवस पर हम अक्सर हिंदी के विकास और प्रोत्साहन की बात करते हैं। जब इसके प्रयोग की चर्चा होती है तो कई विचार कों का विरोध होता है कि लोग हिंदी का प्रयोग शुद्ध रुप से नहीं करते हैं। हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी के शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। इस मुद्दे पर जब वरिष्ठ पत्रकार एन.के.सिंह से पूछा गया तो उनका कहना था कि हिंदी के साथ-साथ दूसरी भाषा के शब्दों के इस्तेमाल से कोई गुरेज नहीं होना चाहिए। उनका मानना है कि यही व्यावहारिक है।

एन.के.सिंह का कहना है कि अगर भाषा को विकसित करना है तो उसे लचीला बनाना होगा। हिंदी के साथ-साथ अगर जरूरत पड़ने पर अंग्रेजी और उर्दू के शब्दों का इस्तेमाल होता है तो इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इससे भाषा समृद्ध होती है। अगर हिंदी का प्रयोग कर रहे हैं तो क्रिया उसकी अपनी होनी चाहिए। इसके अलावा दूसरी भाषा के शब्दों के इस्तेमाल किया जा सकता है।

वरिष्ठ पत्रकार एन.के.सिंह से जब पूछा गया कि देश में अंग्रेजी संभ्रांत वर्ग की भाषा समझी जाती है तो इस पर उनका कहना था कि ये तो प्राचीन समय से ही होता रहा है। पहले भी संभ्रांत वर्ग की भाषा ऊर्दू और फारसी हुआ करती थी। भाषा पर भी अर्थ (वित्त) का दबाव पड़ता है। इसे विस्तार से समझाते हुए उन्होंने कहा कि 1990 के वैश्विकरण के बाद पूरी दुनिया एक हो गई है। ऐसे में जो आर्थिक रूप से मजबूत हैं उसकी भाषा भी ग्लोबल बनती है। यही कारण है कि अंग्रेजी ग्लोबल भाषा के रूप में इस्तेमाल हो रही है। अगर आप ये तर्क देते हैं कि देश में हिंदी-अंग्रेजी भाषी समान रूप से देखे जाएं, तो आपको अमीरी-गरीबी की खाई खत्म करनी होगी। आपको ऐसी व्यवस्था बनानी होगी कि एक ही स्कूल में अमीर और गरीब दोनों का बच्चा पढ़े।

 

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