वरिष्ठ पत्रकार नूपुर बासु ने भावपूर्ण शब्दों में कुछ इस तरह गौरी लंकेश को किया याद...

वरिष्ठ पत्रकार नूपुर बासु ने भावपूर्ण शब्दों में कुछ इस तरह गौरी लंकेश को किया याद...

Friday, 08 September, 2017

गौरी लंकेश पत्रिका’ की संपादक गौरी लंकेश की बीते मंगलवार को अज्ञात हमलावरों ने हत्या कर दी। सच को निर्भीकतापूर्वक सामने रखने वाली गौरी की मित्र और वरिष्ठ पत्रकार नूपुर बासु ने भावपूर्ण शब्दों में उन्हें स्मरण किया है। उनका ये स्मरण हिंदी दैनिक अमर उजाला में प्रकाशित हुआ है, जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं-

सच कहने के लिए प्रतिबद्ध थी गौरी

वह काला मंगलवार था। जिस लड़की को मैं पिछले पैंतीस वर्ष से उसकी खूबसूरत मुस्कराहट और उसकी आंखों की शरारती जगमगाहट के लिए जानती थीवह हमारे जीवन से चली गई। यह बात मुझे फोन पर रोते हुए एक महिला पत्रकार मित्र ने बताई। मुझे लगाजैसे किसी ने मेरी जान निकाल ली हो।

उससे जुड़ी यादें जेहन में तैरने लगीं। मैं गौरी लंकेश को बीती सदी के अस्सी के दशक से जानती थीजब हमारा पत्रकारिता का करियर एक साथ गार्डन सिटी में शुरू हुआ था। हम युवाबेपरवाह थे और सोचते थे कि हम दुनिया को जीत सकते हैं। हमारे कामकाजी माहौल ने हमें इसी तरह सोचने का अवसर दिया था। उस समय की राजनीति भी हमें सवाल पूछने का मौका देती थी। वह युवा पत्रकारों के करियर के लिए एक अच्छा समय था और हमने खुद को उस स्वतंत्र माहौल में तैयार किया था। एक प्रतिबद्ध और मेहनती पत्रकार होने के साथ एक मजेदार व्यक्ति के रूप में गौरी मेरी स्मृतियों में है। अपने घर-परिवार की तरह वह हमेशा उदार थी। कई शाम हममें से बहुत से लोग उसके घर जाते थे और उसके पिता पी लंकेश को अन्य लोगों के साथ थियेटरफिल्मराजनीति पर बातें करते सुनते थे। गौरी के पास अपने दोस्तों के लिए हमेशा समय होता था। आम के मौसम में हम उसके फार्म हाउस पर जाकर आम का मजा लेते थे।

मौज-मस्ती और बेपरवाही के वे दिन तब खत्म हो गएजब उसके पिता का देहांत हो गया और उसने अपने पिता की विरासत लंकेश पत्रिके का दायित्व संभाला। यह लगभग वही समय थाजब बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद भारतीय राजनीति में बदलाव आने लगा था। गौरी ने स्पष्ट रूप से खुद को हिंदुत्व-विरोधी मंच की तरफ खड़ा किया था। पहला संकट तब आयाजब उसने कर्नाटक के चिकमंगलूर में हिंदुत्ववादियों के खिलाफ अपने कुछ दोस्तों के साथ मार्च निकाला और उसे गिरफ्तार कर लिया गया। मुझे याद हैउस समय एक अन्य पत्रकार मित्र ने फोन पर बताया था कि गौरी जेल में अस्वस्थ थी। मैंने तत्काल तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री एस एम कृष्णा के मुख्य सचिव को फोन करके कहा था कि अगर आप गौरी को रिहा नहीं करेंगेतो हम पत्रकार मुख्यमंत्री आवास के बाहर धरने पर पूरी रात बैठ जाएंगे। मात्र पांच मिनट के बाद मुझे फोन पर बताया गया कि आपकी दोस्त जेल से रिहा हो गई हैं। वह ऐसा दौर थाजब प्रशासन पत्रकारों के प्रति उत्तरदायी था। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गयाहालात बदतर होते चले गए। जब उसने भ्रष्टाचार के मामले उजागर करने की कोशिश कीतो भाजपा विधायकों ने उसके खिलाफ मानहानि का केस दर्ज कर दिया। जैसा कि महिला पत्रकारों के साथ होता हैउसे भी बर्बर तरीके से ट्रोल किया गया।

उस मनहूस मंगलवार के दिन वह लंकेश पत्रिकेजिसके प्रति वह प्रतिबद्ध थीके दफ्तर से घर लौट रही थी। वह कायरतापूर्ण घटनाजो उस रात उसके घर के बाहर दिखाई गईकेवल उस विद्रोहीमुक्त उत्साही पत्रकार को चुप करा सकती थीजो अपनी बात खुलकर बोलती थी। जब तक उसके हत्यारों को कानून के दायरे में नहीं लाया जातापत्रकारों और नागरिक समाज को गौरी के लिए एकजुटता प्रदर्शित करना चाहिएताकि यह सुनिश्चित हो सके कि अपराधी सजा से बच नहीं सकते।

अलविदा मेरी दोस्त गौरीहम तुम्हारी आंखों की जगमगाहट और सत्ता के समक्ष सच बोलने की तुम्हारी क्षमता को नहीं भूल पाएंगे। जीवन की लंबी योजना में तुम जीतींवे हार गए।



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