पढ़ें, किस तरह की धारदार हेडलाइंस लगाते थे पत्रकार से कवि बने प्रमोद तिवारी...

पढ़ें, किस तरह की धारदार हेडलाइंस लगाते थे पत्रकार से कवि बने प्रमोद तिवारी...

Wednesday, 14 March, 2018

उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में बीते सोमवार एक सड़क दुर्घटना में वरिष्ठ पत्रकार व कवि प्रमोद तिवारी का निधन हो गया। इस हादसे में उनके साथ अवध क्षेत्र के हास्य कवि के.डी. शर्मा हाहाकारी की भी मौत हो गई। हादसा लखनऊ-कानपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर अचलगंज थाना क्षेत्र के बदरका चौराहे पर सोमवार तड़के हुआ। ट्रक और कार की टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि कार के परखच्चे उड़ गए। वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद तिवारी अपने साथी कवि के साथ रायबरेली के लालगंज से कवि सम्मेलन में भाग लेकर वापस आ रहे थे। वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद तिवारी को याद करते हुए वरिष्ठ पत्रकार राजीव सचान ने उन्हें फेसबुक पोस्ट के जरिए कुछ यूं श्रृद्धांजलि दी। उनकी ये पोस्ट आप यहां पढ़ सकते हैं-  

कवि ही नहींपत्रकार के तौर पर भी याद रहने चाहिए प्रमोद जी

प्रमोद जी की स्मृति अब तक रह-रह कर कौंध रही है। उन्हें इतनी जल्दी नहीं जाना चाहिए था। प्रमोद जी को जानने और चाहने वाले आम तौर पर उन्हें कवि रूप में याद कर रहे हैं। यह स्वाभाविक भी हैक्योंकि बीते एक-डेढ़ दशक से वह कवि रूप में ही अधिक सक्रिय थेलेकिन वह केवल कवि या गजलगो ही नहीं थेवह कहानीकारव्यंग्यकार और प्रखर पत्रकार भी थे। उनकी एक कहानी धर्मवीर भारती के जमाने में धर्मयुग में प्रकाशित हुई थी। यह वह दौर था जब बड़े और नामी कथाकार भी धर्मयुग में मुश्किल से स्थान बना पाते थे। आज जब सभी उन्हें एक कवि के तौर पर अधिक याद कर रहे तब उनके पत्रकारीय मिजाज और अंदाज को भी याद किया जाना चाहिएक्योंकि एक पत्रकार के रूप में वह कुछ विशिष्ट गुणों और दृष्टि से लैस थे। उनकी जैसी सज-धज थी वैसी किसी और में मिलनी मुश्किल है।

कानपुर में दंगे (शायद 1994) के दौरान उनकी लिखी एक खबर का शीर्षक कुछ ऐसा था- “खुद भी जले दूसरों को जलाने वाले।” यह खबर इस बारे में थी कि किस तरह उपद्रवी तत्वों ने किसी दर्जी की दुकान यह मानकर जला दी कि यह तो मुस्लिम की है या फिर यह जानकर फूंक डाली थी कि ड्राईक्लीनिंग की यह दुकान तो किसी हिंदू की हैलेकिन इन दुकानों में सिलने या धुलने गए कपड़े तो खुद जलाने वालों के समुदाय के थे। दंगों के दौरान दुकानों में आगजनी की घटना को इस नजर से देखने और लिखने का काम प्रमोद जी ही कर सकते थे। एक और खबर का मजमून कुछ इस तरह था- “खबर बनने से बचे खबर देने वाले।” यह खबर भी उन दिनों की है जब शहर का माहौल खराब था। पत्रकारों की एक टोली किसी संवेदनशील इलाके में गई। वहां कुछ ऐसा हुआ कि लोगों ने पत्रकारों को घेर लिया और उन्हें मारने दौड़े। वे किसी तरह जान बचाकर भागे। इनमें प्रमोद जी के साथ शहर के अन्य अखबारों के भी पत्रकार थे। घटना के बाद शाम तक शहर भर के पत्रकारों के बीच यही चर्चा होती रही कि आज किस तरह उनकी जान पर बन आई थीलेकिन इस आशय की खबर लिखी अकेले प्रमोद जी ने। जिस दिन देश भर में गणेश जी और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां कथित तौर पर दुग्धपान कर रही थीं तो उन्होंने आईआईटी कानपुर से एमटेक कर रहे पृथ्वीपति ( जिन्हें हम सब पीपी कहते थे) को बुलाकर समझा कि सरफेस टेंशन क्या होता है। उन्होंने इस आशय की खबर भी की। इस प्रसंग की चर्चा इसलिएक्योंकि आम धारणा यह है कि केवल आज तक के एसपी सिंह ने ही लोगों को सरफेस टेंशन से परिचित कराया था।

जब वह दैनिक जागरणदिल्ली में थे तो एनसीआर के किसी इलाके के लोग एक गुंडे से त्रस्त थे। चूंकि गुंडे को सत्ताधारी दल के किसी नेता का संरक्षण प्राप्त था इसलिए पुलिस भी उस पर हाथ डालने से बचती थी। जब प्रमोद जी को पता चला कि नेता जी सार्वजनिक रूप से यह कह देते हैं कि वह उस गुंडा तत्व को जानते ही नहीं तो उन्होंने खबर लिखी कि किस तरह एक शख्स नेता की “फर्जी आड़” लेकर गुंडई कर रहा है। “फर्जी आड़” वाली खबर छपते ही पुलिस के लिए उस गुंडे को सीधा करना बड़ा आसान हो गया। खबर को इस तरह लिखने का काम प्रमोद जी ही कर सकते थे। ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं। 

दैनिक जागरण या फिर प्रतिस्पर्धी अखबार में काम कर चुके पत्रकारों को ऐसे तमाम अनोखे उदाहरण अवश्य ही याद होंगे। वैसे भी उनका संरक्षणमार्गदर्शन और प्रोत्साहन पाने वाले पत्रकारों की कमी नहीं। वह नए पत्रकारों को उत्साहित और प्रेरित करने के साथ उनसे दोस्तों की तरह पेश आते थे और अपनी महफिल का साथी भी बनाते थे। वह ठेठ कनपुरिया अंदाज और मिजाज वाले ऐसे पत्रकार थेजो हर किसी की और यहां तक कि परिचित के परिचितों की भी मदद करने को तैयार रहते थे। एक बार एक परिचित की नौकरी छूटी और उन्हे पता चला कि वह तंगी में हैं तो उन्होंने बिना कहे उनके यहां दो महीने का राशन पहुंचवाया ताकि वह नई नौकरी न मिलने तक खाने-खुराक की चिंता से मुक्त रहें।

प्रमोद जी ऑफिस से काम खत्म करने के बाद दो-चार साथियों के साथ किसी न किसी जगह अड्डा जमा लेते थे। कभी हैलट अस्पताल के सामने स्कूटर और मोटर साइकिलों परकभी रावतपुर स्टेशन के पासकभी घंटाघर में रेलवे स्टेशन के निकट। दरअसल वह जहां होते वहीं महफिल जम जाती थी और अक्सर रात पार करके तड़के चार-पांच बजे ही खत्म होती थी। खबरोंअखबारों और इनसे इतर मसलों से जुड़े किस्सेनुमा प्रसंगों की कमी नहीं थी उनके पास। जब कभी चार-पांच बज जाते तो कहतेचलो पहले अखबार देख लिया जाए। इसके बाद वह अखबार वितरण केंद्र पहुंचकर सारे अखबार देखते और तब घर जाते।

कहना कठिन है कि वह कविता या गजल लिखनेगुनने का समय कब निकालते थेलेकिन जब कभी वह साहित्यकारों के बीच होते थे तो एक-एक मिसरे पर चर्चा करने में रात बिता देते थे। वह जब अपना पहला गजल संग्रह निकालने की तैयारी कर रहे थे तो एक रात आफिस से घर चलने को कहा और रात भर एक-एक कर सारी गजलें सुना डालीं। हालांकि मुझे कविता और गजल की बारिकियों की समझ न थीलेकिन वह यह कहते रहे कि कहीं कोई शब्द खटके तो बताना। याद नहीं कि मेरा कोई संशोधन प्रस्ताव टिका या नहींपहले वह इस गजल संग्रह का नाम कुछ और रखना चाह रहे थेलेकिन जब दिल्ली के एक पत्रकार की ओर से किसी और मकसद से भेजा गया वह फोटो उनके हाथ लगा जिसमें सलाखों पर मुखौटे से बने थे तो उन्होंने संग्रह का नाम रखा- सलाखों में ख्वाब। प्रमोद जी केवल कवि ही नहींपत्रकार और दोस्तों के दोस्त के तौर पर भी याद रहने चाहिए।

(साभार: फेसबुक वाल से)

 

 

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