रमेश अग्रवालजी: तकनीक और कारोबार का समन्वय शिल्पी चला गया...

Thursday, 13 April, 2017

राजेश बादल एग्जियूटिव डायरेक्टर,  राज्यसभा टीवी ।।

शायद उन्नीस सौ अठहत्तर का साल था। मैंने बुंदेलखंड में ख़तरनाक़ बन चुकी डाकू समस्या पर एक लंबा आलेख तैयार किया। इसमें कुछ फरार डाकुओं के साक्षात्कार भी थे। आलेख दैनिक भास्कर को भेजा। छप गया। लेकिन मेरा नाम राजेश की जगह प्रकाश बादल छपा था। फुल पेज का आलेख- वह  भी गलत नाम से। मेरे दुःख और ग़ुस्से का ठिकाना न था। दो महीने तक भोपाल आने जाने का ख़र्च जमा किया। क़रीब सौ रुपए इकट्ठे हो गए तो राजनगर-भोपाल बस में बैठ गया। सुबह पहुंचा। सीधे भास्कर दफ्तर जा पहुंचा। पुराने भोपाल में। इतनी सुबह अखबार के दफ़्तर में भला कौन मिलता? बैठा रहा। आठ बजे के आसपास रमेश जी आए। वो शायद वहीं रहते थे। सबसे पहले पहुंचते होंगे शायद। मैं मिला और अपना ग़ुस्सा उतार दिया। रमेश जी ने ज़ोरदार ठहाका लगाया। मेरे घाव पर जैसे नमक छिड़क दिया। कुछ बोलने ही वाला था कि रमेश जी ने कहा, भाई जवान हो। पत्रकारिता में कलम से ग़ुस्सा निकालना सीखो। ज़ुबान से नहीं। ग़लतियां आदमी से ही होतीं हैं। मैं उनका मुंह ताक रहा था। रमेश जी के एक वाक्य ने जैसे मन्त्र दे दिया। उन्तालीस साल बाद रमेश जी की यह बात मेरे दिमाग़ में गहरे बैठी हुई है।

इस घटना के पांच-छह साल बाद उनसे फिर इंदौर में मुलाक़ात हुई। फिर ठहाका लगाया। बोले- कहिए प्रकाश बादल जी क्या हाल हैं? तब मैं नईदुनिया में सह संपादक हो गया था। इंदौर से भास्कर शुरू होने जा रहा था। रमेश जी चाहते थे कि मैं भास्कर जॉइन करूं। लेकिन तब तक राजेंद्र माथुर जी नवभारत टाइम्स के प्रधान संपादक हो गए थे और उसके कुछ क्षेत्रीय संस्करण निकालना चाहते थे। मुझे माथुरजी ने कहा था कि मैं अपनी नई भूमिका के लिए तैयार रहूं। मैंने रमेश जी को यह बात बताई। बोले, तब तो आपको नवभारत टाइम्स ही जाना चाहिए। राजेंद्र माथुर देश के सबसे अच्छे संपादक हैं। हमने तो उन्हें भास्कर में लाना चाहा था, लेकिन यह संभव नहीं हो पाया। इसके बाद कुछ साल हमारा संपर्क टूटा रहा। एक बार नवभारत टाइम्स जयपुर में मुख्य उप संपादक था तो रमेशजी से फिर मुलाक़ात हुई। संक्षिप्त सी। मैं उन्नीस सौ इक्यानवे में भोपाल दैनिक नईदुनिया में समाचार संपादक/विशेष संवाददाता के तौर पर काम करने जा पहुंचा। इसके बाद क़रीब बीस साल तक उनसे लगातार मुलाक़ातें होतीं रहीं। भास्कर में अद्भुत बदलाव के शिल्पी के रूप में रमेश जी का योगदान कभी नहीं भुलाया जा सकता। बेटों के सक्रिय सहयोग के दम पर भास्कर वाकई एक सूर्य की तरह मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में चमकने लगा। जब दूसरे राज्यों में भास्कर ने पंख फैलाए तो लोग दंग रह गए। आज भास्कर जिस स्थिति में है, उसके मूल में रमेश जी ही हैं। आधुनिकतम तकनीक और विलक्षण कारोबारी समझ ने उन्हें एक अनूठा संयोजक बना दिया था।

प्रिंट के बाद टेलिविजन के लिए जब भी मुझे कारोबारी ख़बरों के लिए विशेषज्ञ राय कैमरे पर रिकॉर्ड करनी होती तो उन्हें ही फ़ोन करता था। हरदम मुस्कराता चेहरा। जब भी मिलते, कहिए प्रकाश बादल जी! क्या हाल हैं? कहते - तुम्हारे टीवी में जाने से प्रिंट मीडिया का बड़ा नुकसान हुआ है। वापस लौट आओ। अफ़सोस! उनके रहते यह संभव नहीं हुआ। भोपाल उत्सव के ज़रिए उन्होंने अपने कुशल संयोजन और गहरी सांस्कृतिक समझ की छाप छोड़ी थी। चैंबर ऑफ कॉमर्स को उनका सदैव मार्गदर्शन मिलता रहा। बुंदेलखंड उनकी सांसों में बसा था। इस पिछड़े इलाक़े की सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियों को उन्होंने हमेशा संरक्षण दिया। उनका जाना देश के मीडिया जगत से तकनीक और कारोबार के समन्वय शिल्पी का जाना है।

रमेशजी को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि। अब मुझे प्रकाश बादल कोई नहीं कहेगा...

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