पत्रकारों की भावना को ख़रीदना आसान नहीं है: राजेश बादल, वरिष्‍ठ पत्रकार

पत्रकारों की भावना को ख़रीदना आसान नहीं है: राजेश बादल, वरिष्‍ठ पत्रकार

Thursday, 05 April, 2018

राजेश बादल

वरिष्‍ठ पत्रकार

अपयश का प्रेत भी पीछा नहीं छोड़ता  - 1 

केंद्र सरकार ने पत्रकारों से गलत खबर पर अधिस्वीकृति छीनने संबंधी सूचना प्रसारण मंत्रालय का परिपत्र वापस ले लिया। अच्छा किया। चुनाव के साल में इसके अलावा कोई विकल्प भी नहीं था। पत्रकारों की अधिस्वीकृति वापस लेने का यह कोई वैधानिक आधार नहीं था। अगर इस आधार पर पत्रकारों को दण्डित करना ही था तो इसके लिए एक पूरी प्रक्रिया का पालन करना होता, जो इतनी आसान नहीं थी। दिन भर देश भर के मीडिया सर्कल की हरारत और तपिश का पता लगाना सरकार के लिए कोई पेचीदा काम भी नहीं था। एडिटर्स गिल्ड और पत्रकारों के संगठनों की एकजुटता से एक और सन्देश सरकार को मिल गया है कि विज्ञापनों के दान से सब कुछ नहीं मिलता। बीते चार वर्षों में समाचारपत्रों और चैनल समूहों को उपकृत कर उनमें काम करने वाले पत्रकारों की भावना को ख़रीदना आसान नहीं है।

सवाल यह है कि फ़र्ज़ी ख़बर या ग़लत ख़बर कैसे सुनिश्चित होएक नेता जी भाषण देते हैं या मीडिया में कुछ बोलते हैं। अगले दिन या तो मुकर जाते हैं या कहते हैं कि पत्रकारों ने उनकी बात को तोड़ मरोड़ कर पेश किया है। क्या नेताजी के इस बयान के आधार पर कोई ख़बर ग़लत मान ली जानी चाहिएएक मुख्यमंत्री अपने राजनीतिक विरोधियों पर खुलेआम भ्रष्टाचार के आरोप लगाएं, उनकी प्रतिष्ठा गिराएं और बाद में माफ़ी मांग लें। मुख्यमंत्री की बात पर भरोसा करते हुए मीडिया उनके विरोधियों को भ्रष्ट लिखता या दिखाता है तो इस ग़लत ख़बर के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाएगा। चुनाव प्रचार के दौरान बयानबाज़ी इतनी गंदी और मर्यादाहीन होने लगी है कि अगर कोई पार्टी कोर्ट में जाए तो सौ फ़ीसदी दंड होगा। यह बयानबाज़ी मीडिया दिखाता है, अख़बार छापते हैं तो इस ग़लत के लिए कौन ज़िम्मेदार है?  इस साल अनेक विधानसभाओं और अगले साल लोकसभा के चुनाव होने हैं। हम सब देखेंगे कि नेताओं की ज़बान से गंदगी निकलती है या फिर फूल झरते हैं। 

मीडिया वही दिखाएगा या छापेगाजो बोला जाएगा। क्या इसका मतलब यह है कि अगले साल तक हिन्दुस्तान का सारा मीडिया बहुत सी ग़लत या फ़र्ज़ी ख़बरें दिखाने जा रहा है। इसका क्या इलाज़ है?  दंगों के दौरान मरने वालों की संख्या, कारण, अपराधियों की गिरफ़्तारी पर पुलिस या प्रशासन के बयान अक्सर ग़लत साबित होते रहे हैं। ऐसे में मीडिया किस पर भरोसा करेकिसान आत्महत्याएं करते हैं, ग़रीब भूख से दम तोड़ते हैं लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में एक भी किसान क़र्ज़ से आत्महत्या नहीं करता, एक भी ग़रीब भूख से नहीं मरता। इसका मतलब मीडिया की सारी ख़बरें फ़र्ज़ी थीं। नक्सलियों और डाकुओं से मुठभेड़ों की ख़बरों में अनेक तथ्य बाद में सच नहीं पाए जाते। ज़ाहिर है वे या तो बदल दिए जाते हैं या पहले छिपाए जाते हैं। मीडिया क्या करेभारत बंद में हुई हिंसा की जो कहानियाँ एक-दो दिन दिखाई गई या प्रकाशित की गईं, वे जांच के बाद काफ़ी हद तक बदल जाएंगी। क्या माना जाए कि मीडिया सिर्फ़ ग़लत ख़बरें ही दिखाता है। दरअसल यह अविश्वास की मानसिकता है। अनेक उदाहरण हैं कि विधायिका और कार्यपालिका मीडिया की खोजी और अन्वेषणात्मक नज़र को बर्दाश्त नहीं कर पाती। दोनों के हाथ में कार्रवाई का चाबुक होता है। वो पत्रकारों का उत्पीड़न करने पर आमादा हो जाती हैं। पत्रकारों को धमकाया जाता है,मालिकों को विज्ञापन बंद करने की चेतावनी दी जाती है और उनके ख़िलाफ़ फ़र्ज़ी मामले बनाए जाते हैं।

मुझे याद है कि जुलाई 1982 में बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र तो अपने पर भ्रष्टाचार के  आरोपों से इतने तैश में आए कि बिहार प्रेस बिल ले आए। वो तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरागांधी के बारे में छप रही खबरों से भी उत्तेजित थे।  इसके प्रावधान भी बेहद खतरनाक थे। दो से पांच साल तक की जेल हो सकती थी। देश भर के पत्रकार सड़कों पर उतर आए। आंदोलन हुए। दबाव यहां तक बढ़ा कि आलाकमान ने एक साल बाद 1983 में जगन्नाथ मिश्र को बिल की वापसी का निर्देश दिया। उस दौरान भी चुनाव एक-डेढ़ साल बाद थे। कुछ इसी तरह प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार भी सितंबर 1988 में विवादास्पद मानहानि विधेयक लाई थी। व्यापक विरोध के बाद उसे भी वापस लेना पड़ा था। उसके भी साल-डेढ़ साल बाद चुनाव थे। इसके बाद राजस्थान सरकार का पिछले साल का प्रेस विरोधी अध्यादेश भी वसुंधरा सरकार को वापस लेना पड़ा था। यह भी लोकसेवकों, मजिस्ट्रेटों और जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार की ख़बरें रोकने से संबंधित था।

तो क्या इसका अर्थ यह लगाया जाए की इम्तिहान नज़दीक आने पर तैयारी के बजाय अनुचित तरीकों से परीक्षा पास करने की मानसिकता हमारे राजनीतिक दलों में बढ़ती जा रही है। क्या यह अर्थ लगाया जाए कि आलोचना स्वीकार करने का संयम अब चुकने लगा है और अपने ख़िलाफ़ कुछ भी छपने पर पत्रकार को निपटाने की सामंती मानसिकता सरकारों में पनप रही है। हाल ही में मध्यप्रदेश, बिहार तथा देश के कुछ अन्य हिस्सों में पत्रकारों के उत्पीड़न की घटनाएं सामने आई हैं। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने इसे बहुत सामान्य ढंग से लिया है। 2018 के भारत में इसे कतई माफ़ नहीं किया जा सकता। सरकारों को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि कोई फ़ैसला वापस लेने से नुक्सान की भरपाई हो जाती है। बिहार प्रेस बिल के अपयश का प्रेत  अभी भी वयोवृद्ध जगन्नाथ मिश्र का पीछा नहीं छोड़ रहा है। कोई दस्तावेज़ अतीत बनकर दफ़न नहीं हो जाता। दस्तावेज़ के साइड इफेक्ट्स भी सरकारों को बाद में झेलने पड़ते हैं। 

अपयश का प्रेत भी पीछा नहीं छोड़ता - 2   

एक ज़माने में इंदौर को मिनी मुंबई कहा जाता था। हर फिल्म सारे देश से एक दिन पहले वहां रिलीज़ होती थी। इसका कारण यह था कि इंदौर में मराठी, गुजराती,राजस्थानी, मालवी और बड़ी संख्या में उत्तरप्रदेश से आए लोग बसे थे। उनकी रुचि में फिल्म चल गई तो यह अंदाज़ा लग जाता था कि संबंधित राज्यों में भी फिल्म के लिए संभावनाएं हैं। फिर उसी हिसाब से वितरण नीति बनती थी। आप कह सकते हैं कि यह एक टेस्ट होता था समाज की नब्ज़-दिलचस्पी टटोलने का। इसका आधार शायद राजाओं के ज़माने की परंपरा थी। राजा जब आम आदमी से जुड़ा कोई फैसला लेते थे तो उसके बारे में लोगों की प्रतिक्रिया जानने के लिए रात को वेश बदलकर निकलते थे और जानकारी हासिल करते थे। फिर निर्वाचित सरकारों ने भी यही सिलसिला शुरू किया। इसे आज की भाषा में फीडबैक कहते हैं। 

दरअसल, जब जगन्नाथ मिश्रा ने बिहार प्रेस बिल पेश किया तो उसके पीछे यही मंशा थी। उन दिनों इंदिरागांधी और उनकी पुत्रवधू मेनका गांधी के बीच टकराव की ख़बरें बढ़ा-चढ़ाकर मीडिया में छप रही थीं। देश के पहले परिवार की अन्तर्कथाएँ मसाले लगी होतीं थीं। प्रधामंत्री इससे खुश नहीं थीं। उन्होंने सूचना प्रसारण मंत्री वसंत साठे को प्रेस से निपटने का फॉर्मूला खोजने को कहा। इसके बाद दिल्ली दरबार के भरोसेमंद  क्षत्रप जगन्नाथ मिश्र को प्रेस विधेयक लाने का निर्देश दिया गया।  इससे यह पता लगता है कि वैचारिक रूप से बेहद सक्रिय खांटी हिंदी बेल्ट का यह राज्य क्या सोचता है और दो साल बाद होने वाले चुनाव में मीडिया कैसा व्यवहार करेगा। एक साल तक फीड बैक देखने के बाद विधेयक वापस ले लिया गया। यह अन्तर्कथा बताने के लिए जगन्नाथ मिश्र आज भी हमारे बीच मौजूद हैं। राजीव गांधी अपनी मां की तरह कूटनीतिक और राजनीतिक दांवपेंच में  माहिर नहीं थे। उन्होंने एक राज्य से फीडबैक लेने के बजाय सीधे ही मानहानि विधेयक लाने का फ़ैसला किया। चुनाव से ठीक साल डेढ़ साल पहले।

कल सूचना प्रसारण मंत्रालय ने भी पत्रकारों को छोटी सी चिकोटी काटकर इस कार्रवाई के ज़रिये फीडबैक लेने का प्रयास किया था। स्मृति ईरानी तो पुरानी और चतुर अभिनेत्री हैं। उन्हें पता है कि फिल्म और टीवी इंडस्ट्री में पत्रकार अभिनेता -अभिनेत्रियों के बारे में कितना लिखते हैं और कोई चूं-चपड़ भी नहीं करता। इसलिए अपनी ओर से उन्होंने मीडिया को दण्डित करने का फॉर्मूला निकाला होवह भी चुनावी साल में,  इस पर यक़ीन नहीं होता। बीते दिनों एक कथित संत से चुभने वाले सवालों के कारण भाई पुण्य प्रसून वाजपेयी को वह संस्थान छोड़ना पड़ा। इस कारण मीडिया के अंदर की सोच पता लगाना और भी ज़रूरी था। बीते वर्षों में चैनलों और अखबारों में जिस तरह अपनी पसंद के चेहरे लाए गए, उनका साइड इफेक्ट तो होना ही है। शायद इस फीडबैक के ज़रिये पता लग गया होगा कि पत्रकार बिरादरी संपादक या मुखिया के बदल जाने से नहीं बदल जाती। बहुमत आज भी निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता करने वाले ख़बरनवीसों का है।

 इसे आप भूल नहीं सकते कि आज सोशल मीडिया का दौर है। यह वरदान भी है और अभिशाप भी। संचार के इस नए अवतार को हर राजनेता एकदम समझ लें, यह संभव नहीं। इस कारण हम देखते हैं कि हर राजनीतिक दल के नेता ने कुछ बेरोज़गार नौजवानों को पच्चीस -तीस हज़ार रुपये में नौकरी पर रखा हुआ है। ये नौजवान राजनीतिक दांवपेंच, कूटनीति और इतिहास के तथ्यों से वाक़िफ़ नहीं होते। वे इशारा पाते ही प्रशंसा के पुल बांध देते हैं या  निंदा का नाला खोल देते हैं।सोशल मीडिया के मंचों पर आपने देखा होगा कि भले ही आप नेक नीयत से अपनी  बात रखें। अगर वह किसी दल या नेता के ख़िलाफ़ है तो तुरंत आपके ऊपर तीखे, भद्दे और अश्लील व्यंग्य बाणों की बौछार होने लग जाती है। घंटे भर में तो सारी दुनिया यह समझने लगती है कि आप ही ग़लत थे। आप  माथा पीटने के अलावा कुछ नहीं कर सकते। आप कहते हैं- हे ईश्वर ! इन्हें माफ़ कर क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं। पर ये राजनेता ग़लतफ़हमी में हैं। यह एक ऐसा तीर है जो उलट कर उन्ही पर लग सकता है। बीते दिनों फेसबुक पर एक पोस्ट आई थी। एक युवक किसी राजनेता के यहां  काम कर रहा था। जब निंदा पुराण चरित्र हनन पर उतर आया तो उसने तीस हज़ार रुपये का जुआ उतार फेंका और मीडिया के मंच पर आकर नेताजी की पोल खोल दी। अब नेताजी सफाई देते फिर रहे हैं। उनपर कोई यक़ीन नहीं कर रहा। भेड़िया आ चुका है और उन्हें बचाने कोई नहीं आ रहा है।

 लब्बो लुआब यह कि असल में फेक न्यूज़ का उदगम तो सोशल मीडिया ही है। एक ख़बर फैला दीजिए। देखते ही देखते सांप्रदायिक उपद्रव शुरू हो जाएगा। बटन दबेगा दिल्ली से, दंगा होगा टिमबक टू में। तो अब बंदर अपनी वाली पर उतर आया है। उस्तरा उसके हाथ में है। अपना गला काटेगा और आपका भी। चुनाव अगले साल हैं। ऐसे राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए यह खतरे की घंटी है। आप सामने वाले पर प्रहार करेंगे, वह दोगुने वेग से आप पर प्रहार करेगा। आप सभी हमाम में खड़े हैं। हम तो दर्शक मात्र हैं। भारतीय लोकतंत्र के स्टेडियम में आपकी कुश्तियां अपने मनोरंजन के लिए देख रहे हैं। मूंगफली खाते हुए। इतने भी बेवकूफ़ नहीं हैं, जितना समझा जा रहा है।


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