स्मृतिशेष: जब बालकवि बैरागी ने बोली लगा कर 25 हज़ार में बिकवाई थी किताब

Wednesday, 16 May, 2018

जाने-माने कवि, लेखक और पूर्व सांसद बालकवि बैरागी का उनके गृह नगर मनासा में रविवार शाम निधन हो गया। वे 87 वर्ष के थे। उनके पुत्र गोरकी ने को बताया कि दोपहर में एक कार्यक्रम में शामिल होने के बाद वह घर लौटे। इसके बाद वह आराम करने के लिए अपने कमरे में चले गए, जिसके बाद नींद में ही उनका निधन हो गया। वरिष्ठ पत्रकार व कवि डॉ. राकेश पाठक ने कर्मवीर वेबपोर्टल उन्हें कुछ इस तरह से श्रद्धांजलित अर्पित की और पुराने दिनों को याद किया-

बाबा..मेरी किताब के विमोचन में बहुत रुलाया था आपने..


बाबा कहते थे कि-

झर गए पात..

बिसर गयी टहनी

करुण कथा जग से क्या कहनी।

लेकिन बाबा मैं आज करुण कथा जग से कहूंगा। कहूं भी क्यों नहीं..कितना रुलाया था आपने हम सबको..! सन 2006 की बात है। नवभारत में संपादक रहने के दौरान कोसोवो (पूर्व युगोस्लाविया) गया था। यूएन मिशन की रिपोर्टिंग करने बाद में नईदुनिया में संपादक बना तब इस यात्रा पर किताब छपी।

ग्वालियर में मेरी इस पहली किताब काली चिड़ियों के देश में’ (यूरोप का यात्रा वृतांत) के विमोचन समारोह में आप मुख्य अतिथि थे। वरिष्ठ साहित्यकार चित्रा मुदगल, भाषाविद प्रो. सत्येंद्र शर्मा और वरिष्ठ पत्रकार राकेश अचल साथ मंचासीन थे। कवि मित्र पवन करण संचालन कर रहे थे।

पहलौठीकिताब का विमोचन था सो बहुत उमंग थी। पवन ने औपचारिकताएं पूरी की ही थीं कि आपने अचानक माइक थाम लिया।

जोर से डांटते हुए कहाराकेश… (सब सन्न रह गए, मुझे कुछ समझ नहीं आया)

फिर आपने कहातेरी किताब का विमोचन है, तू मंच पर बैठा है और मां सामने श्रोताओं में….! जा मां को लेकर ऊपर आ।

मैं मां को लेकर आया मंच पर बिठाया।

बाबा फिर दहाड़े–  और उसे भी लेकर आ जिसके बिना तू अधूरा है.. बहूरानी को भी मंच पर साथ बिठा।

मैं प्रतिमा (अब स्मृतिशेष) को लेकर आया।

बाबा ने मेरे ही हाथों मां और पत्नी का स्वागत कराया। फिर भरपूर नेह से बोले- बेटा राकेश.. इन दोनों के बिना तू ये किताब लिख ही नहीं सकता था।

बाबा ने अपने भाषण में जो कुछ कहा वो सबको आंसुओं के समन्दर में डूबा देने को काफी था।

बाबा हर रचना लिखते समय कागज पर सबसे पहले मां‘  शब्द लिखते थे। अपनी मां को याद कर उन्होंने अपने भिखमंगे या मंगते होने की बात बताई।

(ये उनकी मां का आशीष ही है कि उन्होंने मातृ दिवसको प्रस्थान किया)

बाबा कहते हम लोग भिखारी नहीं भिखमंगे थे.. कहते भिखारी फिर भी थोड़ा अच्छा शब्द है मैं तो भिखमंगा थाहमारी मां ने हमें बनाया संवारा... वे ख़ुद को मां का सृजन कहते थे।

बाबा ने पूरी ज़िंदगी मांग कर ही कपड़े पहने.. कभी अपने पैसे से कपड़े नहीं खरीदे

कहते थे- मांग कर पहनता हूं ताकि भूल न जाऊं कि मैं मंगता हूं।

(बाबा की बहुचर्चित किताब का नाम– ‘मंगते से मिनिस्टर तकहै।)

बाबा सांसद, मंत्री सब रहे लेकिन अपनी ज़मीन से हमेशा जुड़े रहे।

  • बोली लगवा कर 25 हज़ार में बिकवाई किताब-

विमोचन समारोह में बाबा ने एक प्रति पर मेरे और सभी अतिथियों के दस्तखत करवाये। फिर खड़े होकर कहा कि - ये किताब वैसे तो सौ रु. की है लेकिन मैं इसकी नीलाम बोली लगवा रहा हूं। इसकी जो सबसे ज्यादा कीमत अदा करेगा उसे ये किताब मिलेगी। ये रकम गरीब बच्चों की पढ़ाई में खर्च होगी।

सभागार में होड़ लग गई। देखते देखते किताब की बोली हज़ारों में पहुंच गई।

आखिर में नगर निगम की जनसंपर्क अधिकारी आशा सिंह ने 25 हज़ार रु. की बोली लगाई। उन्होंने रुंधे गले से कहा कि ये किताब मैं ही खरीदूंगी... सारे सभागार में आंसुओं का सैलाब आ गयाबाबा, चित्रा मुदगल और हम सब रो रहे थे..।

बाबा ने रोते हुए कहा- इस बेटी के आंसुओं से ज्यादा मूल्यवान कुछ नहीं हो सकता... अब 25 हज़ार से ज्यादा भी कोई बोली लगाएगा तो किताब नहीं दूंगा। बाबा ने मंच पर बुलाकर आशा सिंह को किताब की प्रति भेंट की।

आप बहुत याद आओगे बाबा...

(साभार: karmveer.org)

 


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