वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर के निधन पर उन्हें कुछ यूं किया गया याद... वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर के निधन पर उन्हें कुछ यूं किया गया याद...

वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर के निधन पर उन्हें कुछ यूं किया गया याद...

Tuesday, 05 June, 2018

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

करीब दो महीने पहले ही अपने 40 वर्षीय बेटे विवेक को खो चुके वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर भी अब इस दुनिया से विदा ले चुके हैं। उनके करीबियों की मानें तो उन्हें बेटे की मौत का इतना गहरा सदमा लगा कि वे इससे उबर नहीं पाए थे। वैसे तो 71 वर्षीय राजकिशोर अपने फेफड़ों में संक्रमण से परेशान थे और पिछले करीब 20 दिनों से सांस लेने में भी तकलीफ महसूस कर रहे थे, लिहाजा उन्हें एम्स के आईसीयू में भर्ती कराया गया था और यहां सोमवार सुबह साढ़े नौ बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन पर कई वरिष्ठ पत्रकारों और लेखकों ने उन्हें कुछ इस तरह याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की-

कमर वाहिद नकवी, वरिष्ठ पत्रकार-

राजकिशोर जी के साथ लगभग डेढ़ साल तक रविवारमें काम करने का मौक़ा मिला। उनके साप्ताहिक कॉलम से उस दौरान बहुत सीखने को मिला। राजनीतिक-सामाजिक संरचनाओं, समस्याओं पर उनकी गहरी पकड़ और समझ बेजोड़ थी। उनके जैसे सामाजिक अध्येता, गम्भीर चिन्तक और गहन विश्लेषक को खो देना वाक़ई हिंदी पत्रकारिता की अपूरणीय क्षति है। विनम्र श्रद्धांजलि!


प्रियदर्शन, वरिष्ठ पत्रकार-

राजकिशोर नहीं रहे। आज सुबह एम्स में उन्होंने अंतिम सांस ली। सवा महीने पहले उन्होंने बेटे को खोया था। शायद यह शोक उनके फेफड़ों का‌ संक्रमण बन‌ गया। जिन‌ लोगों ने उन्हें पढ़ा‌ है, वही‌ ठीक से समझ सकते हैं, हमने क्या‌‌ खोया है। सतर्क, संतुलित और सुघड़ गद्य क्या होता है, यह हमने उनसे सीखा। उनके जाने का‌ शोक मेरे लिए इतना निजी है‌‌ कि कुछ भी कहना तत्काल संभव नहीं है।

रवीश कुमार, सीनियर न्यूज एंकर-

हम सबके लिए अनगिनत मसलों पर कितना लिखा। कभी भी कोई अख़बार खोलो राजकिशोर जी का लेख मिल ही जाता था। अब नहीं मिलेगा। अब वे हैं भी नहीं। लेख के ऊपरी कोने पर राजकिशोर का छोटे बक्से में समाया चेहरा अब नहीं दिखेगा। ऐसा कोई अख़बार है भी जिसने राजकिशोर को न छापा हो? आजीवन लिखते रहने वाला समाज की व्यापक स्मृतियों के किस कोने में रहता होगा?’

अरुण कुमार त्रिपाठी, वरिष्ठ पत्रकार-

राजकिशोर जी नहीं रहे। आज सुबह 9.30 बजे उन्होंने दिल्ली के एम्स में आखिरी सांस ली। उन्होंने हिंदी समाज को दिया बहुत ज्यादा लिया बहुत कम। हिंदी समाज और मेरे जैसे लेखक पत्रकार सदा उनके ऋणी रहेंगे। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

अविनाश दास, फिल्म निर्देशक-

राजकिशोर जी हमारे बनते हुए युवा दिनों के आइकॉन थे। वाणी प्रकाशन ने आज के प्रश्न नाम से एक श्रृंखला छापी थी, जिसके संपादक राजकिशोर जी थे। रविवार के उनके दिनों का किस्सा पटना के हमारे मित्र सुबोध जी सुनाते थे। वे लंबे समय तक नवभारत टाइम्स में थे, लेकिन विनीत जैन के हाथों में टाइम्स ग्रुप की कमान आई, तो एक बार वह हिंदी एडिटोरियल रूम में गए। किस्सा है कि राजकिशोर जी को देख कर उन्होंने कहा कि यह काला आदमी यहां क्या कर रहा है? और अगले दिन से राजकिशोर जी नवभारत टाइम्स का हिस्सा नहीं रह गए।

दिल्ली में राजकिशोर जी से मित्रता हुई और बहुत अच्छी घनिष्टता रही। साम्यवाद को लेकर उनके विचार बहुत उदार नहीं थे और हमारे बीच जमकर कहासुनी भी होती रही। लेकिन जब भी मिले, बराबरी महसूस कराने वाले उनके बर्ताव ने मुझ पर हमेशा जादुई असर किया। दिल्ली में मैं एक वेबसाइट मॉडरेट किया करता था, मोहल्ला लाइव। थोड़े दिनों तक उसका दफ्तर मातासुंदरी रोड में था। हम एक दिन वाणी प्रकाशन में मिले और वहां से चल कर मोहल्ला लाइव के दफ़्तर तक आये। उस दिन उन्होंने एक राजनीतिक पार्टी बनाने का प्रस्ताव रखा, जिसे मैंने उनकी भावुकता से भरा हुआ प्रस्ताव माना। उस दिन मैंने उन्हें घर तक छोड़ा था, जहां दिलीप मंडल के साथ एक बार मैं जा चुका था। 

बाद में एक दिन उन्होंने फ़ोन किया और बेटी के विवाह को लेकर चिंता प्रकट की। फिर उन्हीं के आग्रह पर मैंने मोहल्ला लाइव में एक विज्ञापन भी प्रकाशित किया था। दिल्ली के प्रेस क्लब में एक दिन उनके बेटे से भी मुलाक़ात हुई लेकिन राजकिशोर जी के ज़िक्र पर वह बहुत उत्साहित नहीं दिखा। थोड़े दिनों पहले उसी बेटे की मृत्यु के बाद वह शायद टूट गए और आज उनके निधन की ख़बर ने मुझे अंदर से हिला कर रख दिया। अभी उनके जाने की उम्र नहीं थी। उनसे लगभग दस साल बड़े मेरे पिता अभी भी स्वस्थ और सानंद हैं। आप बहुत याद आएंगे राजकिशोर जी।

जयशंकर गुप्ता, नेशनल ब्यूरो चीफ व एग्जिक्यूटिव एडिटर, देशबंधु

एक अत्यंत दुखद और अंदर से हिला देनेवाली सूचना मिली है। समाजवादी सोच के वरिष्ठ पत्रकार-संपादक राजकिशोर जी का आज सुबह 9.30 बजे निधन हो गया। पिछले कुछ दिनों, 21 मई से यहां एम्स के आईसीयू में उनका इलाज चल रहा था। मष्तिकाघात के साथ ही उन्हें निमोनिया भी हो गया था।

अभी कुछ ही दिनों पहले उनके युवा पत्रकार पुत्र विवेकराज का असामयिक निधन हो गया था। राजकिशोर जी और हम सब उस दुख से उबर ही रहे थे कि राजकिशोर जी भी हम सबको छोड़कर पुत्र विवेक का अनुसरण करते हुए अनंत की यात्रा पर चले गए। उनके निधन से भारतीय हिंदी पत्रकारिता और खासतौर से समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष धारा की पत्रकारिता को अपूरणीय क्षति हुई है। 

राजकिशोर जी के साथ हमारे संबंध सरोकार 1977-78 में रविवार के प्रकाशन के समय से ही बन गए थे लेकिन 1982 हम जब कोलकाता में रविवार की संपादकीय टीम के साथ स्वयं भी जुड़ गए तो हमारे संबंध और भी प्रगाढ़ होते गए। रविवार के साथ ही नवभारतटाइम्स टाइम्स में भी हम लोग कुछ समय एक साथ काम किए। 
यह कितना दुखद है कि रविवार के संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह, उदयन शर्मा और योगेंद्र कुमार लल्ला जी के बाद अब राजकिशोर जी भी नहीं रहे। पिछले दिनों, उनके बीमार पड़ने से पहले हम और गीता उनके निवास पर गए थे। काफी देर तक सम सामयिक राजनीति, पत्रकारिता और फिर अतीत के झरोखों को साफ करते हुए रविवार, नवभारत टाइम्स, एसपी सिंह, उदयन,राजेंद्र माथुर जी के बारे में बातें होती रहीं। उनका ह्यूमर भी पूर्ववत सामने था। सोशल मीडिया पर उनकी चुटीली टिप्पड़ियां भी पूर्ववत जारी थीं।
कतई नहीं लगा कि वह इतनी जल्दी हम सबको अलविदा कहनेवाले हैं लेकिन नियति को शायद यही मंजूर था। उनके परिवार, खासतौर से पत्नी, विमला भाभी, पुत्री गुड़िया, बहू और उसके बच्चों पर तो दुखों का पहाड़ सा टूट पड़ा है। असह्य दुख और शोक की घड़ी में हमारी सहानुभूति और संवेनाएं उनके साथ हैं। ईश्वर राजकिशोर जी की आत्मा को शांति और विमला भाभी, गुड़िया और बहू-बच्चों को इस दुख को भी बर्दाश्त करने का साहस और धैर्य प्रदान करे।

राजकिशोर जी को अश्रुपूरित विनम्र श्रद्धांजलि और उनसे जुड़ी स्मृतियों को प्रणाम।

 

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