जब पत्रकार के रोल ने दिलाया शशि कपूर को एक्टिंग का पहला नेशनल अवॉर्ड... जब पत्रकार के रोल ने दिलाया शशि कपूर को एक्टिंग का पहला नेशनल अवॉर्ड...

जब पत्रकार के रोल ने दिलाया शशि कपूर को एक्टिंग का पहला नेशनल अवॉर्ड...

Tuesday, 05 December, 2017

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

ये शशि कपूर जैसे बड़े एक्टर के साथ नाइंसाफी ही कही जाएगी कि अपने 36 साल के करियर में 85 से भी ज्यादा फिल्में करने के बावजूद उन्हें एक्टिंग के लिए कोई नेशनल अवॉर्ड नहीं मिला था। न्यू देल्ही टाइम्स, ये नाम है उस फिल्म का जिसने शशि कपूर को उनको पहला नेशनल अवॉर्ड दिलवाया। इस फिल्म में शशि कपूर का बड़ा ही सीरियस रोल था, एक अखबार के सम्पादक बने थे शशि कपूर। बीच शूटिंग में बीवी की मौत, दो-दो कोर्ट केस और बेहद ही कम बजट। शशि कपूर के लिए इस फिल्म में काम करना कोई आसान काम नहीं था, अलग-अलग वजहों से सालों लटकी रही ये फिल्म। लेकिन जब रिलीज हुई तो नेशनल अवॉर्ड के रूप में उनकी मेहनत वसूल हो गई। इस फिल्म को तीन-तीन नेशनल अवॉर्ड मिले थे।

सत्यम शिवम सुंदरम, जब जब फूल खिले, दीवार, सुहाग, आवारा, क्रांति, वक्त, नींद हमारी ख्वाव तुम्हारे, हसीना मान जाएगी, बॉम्बे टॉकीज, शर्मीली, आ गले लग जा, रोटी कपड़ा और मकान, कभी कभी, फकीरा, त्रिशूल, ना जाने कितनी सुपरहिट और कई अंग्रेजी फिल्में भी करने के बावजूद जब शशि कपूर को कोई नेशनल अवॉर्ड नहीं मिला तो ये बात उन्होंने कई दोस्तों से डिसकस की। उस वक्त गुलजार एक कहानी लिख रहे थे और उन्होंने प्रड्यूसर रमेश शर्मा से उन्हें मिलने को कहा क्योंकि ये एक पॉलटिकल थ्रिलर फिल्म थी।

शशि को प्रड्यूसर ने साफ-साफ कह दिया कि फिल्म का बजट ज्यादा नहीं है, आपको पैसा नहीं दे पाऊंगा। आज के दौर में ये जानना काफी दिलचस्प होगा कि 1986 में रिलीज हुई इस फिल्म का बजट महज 35 लाख था और शशि कपूर ने एक पॉलटिकल थ्रिलर में काम करने की चाहत में केवल एक लाख रुपए में इसमें काम करना स्वीकार कर लिया गया था, बाद में फिल्म में पांच परसेंट का शेयर भी मांगा था, जो शायद मिला नहीं। फिल्म मुश्किलों से भरी थी, बीच शूटिंग में उनकी बीवी जेनिफर की मौत हो गई। कई महीनों तक उनके इलाज के लिए शशि कपूर को उनके लिए लंदन में रहना पड़ा, तब तक फिल्म अटकी रही।

शुरुआत में पहले फिल्म दिल्ली में शूट हो रही थी, लेकिन फिर दिल्ली से लोकेशन मुंबई में शिफ्ट करनी पड़ी। दरअसल इंदिरा गांधी की मौत के बाद दिल्ली में सिख दंगों ने कहर ढा दिया था, दंगों के चक्कर में फिल्म लेट भी हो गई थी और मुंबई भी शिफ्ट करनी पड़ गई। इतना ही नहीं फिल्म की रिलीज से पहले ही उस पर दो कोर्ट केस लाद दिए गए। एक केस फिल्म के उस डायलॉग को लेकर किया गया जिसमें शशि कपूर अपनी लॉयर बीवी शर्मिला टैगोर से कहते हैं कि सारे लॉयर लायर(झूठे) होते हैं। दूसरा केस इस बात पर किया गया कि इस फिल्म में एक नेता को दंगे भड़काते दिखाया गया था। किसी नेता के समर्थक ने ये केस कर दिया था।

इन्हीं केसों के चलते ही आखिरी मिनट पर फिल्म को दूरदर्शन ने भी रिलीज करने से मना कर दिया था। इधर जैसे तैसे फिल्म रिलीज हुई तो फिल्म पायरेसी माफिया के चंगुल में फंस गई, हालांकि इसके चलते फिल्म को चर्चा जरूर मिल गई। ये अलग बात है कि ना तो शशि ने कुछ कमाया और ना निर्माता ने, लेकिन शशि कपूर ने कमाया तो बस अपना पहला नेशनल फिल्म अवॉर्ड। हालांकि इससे पहले शशि को अपनी फिल्म जुनून के लिए नेशनल अवॉर्ड मिला था, लेकिन एक्टिंग के नहीं बल्कि बेस्ट प्रड्यूसर का अवॉर्ड मिला था।

फिल्म में शशि कपूर का रोल न्यू दिल्ली टाइम्स के संपादक विकास पांडे का होता है, यूपी के गाजीपुर में एक स्थानीय एमएलए की हत्या के केस की जांच करते वक्त विकास पांडे एक दूसरे विधायक ओम पुरी के पीछे पड़ जाते हैं, जो कई तरह के गलत धंधों में लिप्त था। उसके हाथ में कई विधायक थे, जो लगातार सीएम की कुर्सी हिलाने के धमकी देता था। फिल्म का सस्पेंस काफी गजब का था, आखिर में पता चलता है कि जिसे निर्दोष समझकर शशि का किरदार मदद कर रहा था, सारी साजिश उसी की थी और वो उस सम्पादक/पत्रकार का इस्तेमाल कर रहा था। ये फिल्म आज के पत्रकारों-सम्पादकों के लिए भी एक मैसेज की तरह है कि कहीं आप भी तो जोश, जुनून और भरोसे में आकर इस्तेमाल तो नहीं हो रहे। 


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