SC में उठा मुद्दा, अखबार-मीडिया संगठन बिना जांचे प्रकाशित कर रहे ऑडियो क्लिप

SC में उठा मुद्दा, अखबार-मीडिया संगठन बिना जांचे प्रकाशित कर रहे ऑडियो क्लिप

Friday, 06 October, 2017

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।

सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधीशों और अदालती कार्यवाहियों समेत लगभग हरेक मुद्दे को लेकर सोशल मीडिया पर किए जाने वाले ट्रोलिंगकठोर टिप्पणी और आक्रामक प्रतिक्रिया की बढ़ती प्रवृत्ति को लेकर चिंता जताई है। आने वाले समय में अब उन लोगों बक्शा नहीं जाएगा जो सोशल मीडिया पर इस तरह की हरकते करते हैं, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ जल्द ही इसके लिए कायदे-कानून भी बना सकती है।

वहीं शीर्ष अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता फली एस नरीमन और हरीश साल्वे के उन सुझावों पर भी सहमति जतायी कि सोशल मीडिया पर कुछ घटनाओं का नियमन किए जाने की आवश्यकता है। ये दोनों उत्तर प्रदेश में एक हाईवे पर सामूहिक बलात्कार के मामले में उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री आजम खान के बयान से संबंधित मामले में शीर्ष अदालत की सहायता कर रहे हैं।

साल्वे ने कहा कि ऐसा कुछ भी जो न्यायाधीशों और दलील रख रहे वकीलों के बीच विचारों के मुक्त आदान-प्रदान को बाधित करता हैउस पर रोक लगाए जाने की आवश्यकता है।

वहीं प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रान्यायमूर्ति एएम खानविल्कर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड की पीठ ने भी कहा कि सोशल मीडिया मंचों का दुरुपयोग हो रहा है और लोग अदालत की कार्यवाही के बारे में भी गलत सूचना फैला रहे हैं।

पीठ ने यह भी कहापहले सिर्फ राज्य निजता के अधिकार का उल्लंघन कर सकता था। अब इस तरह की बातें निजी पक्षों से भी हो रही हैं। साल्वे ने कहा कि कोई अखबार या मीडिया संगठन कोई ऑडियो क्लिप पाता है और इसकी प्रामाणिकता की कोई जिम्मेदारी लिए बिना इसका प्रकाशन करता है, तो क्या यह निजता का उल्लंघन नहीं है।

पीठ ने कहा कि निजी भागीदारों की घुसपैठ की वजह से ‘माई हाउस इज माई कैसल’ की अवधारणा तेजी से धुंधली पड़ रही है। नरीमन ने तब कहा कि भारतीय दीवानी कानून त्रुटिपूर्ण हैं और इस तरह की घटनाओं से निपटने में सक्षम नहीं हैं।

इसके बाद, साल्वे ने कहा कि किसी तरह के नियमन की अविलंब आवश्यकता है। पीठ ने सुझावों पर सहमति जतायी। इस बीचशीर्ष अदालत ने उन सवालों को संविधान पीठ के पास भेजा कि क्या कोई सार्वजनिक पदाधिकारी या मंत्री जांच के अधीन किसी संवेदनशील मामले पर अपनी राय जाहिर करने के दौरान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दावा कर सकता है।



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